मंगलाचरण एवं विषय प्रवेश
सत्र का आरम्भ मंगलाचरण और गुरु वंदना से होता है, जिसमें श्रीवल्लभ नंदनम, श्रीगुरुवे नमः, श्री रंगनाथम, गोदा, श्रीमान भूत भूम रामानुज दिवाकर जैसे वचनों का उच्चारण किया गया। इसके उपरांत, वक्ता श्री मनीष जी का परिचय दिया गया, जो स्वयं श्री संप्रदाय के अनुयायी हैं और श्रीरंगम में निवास करते हैं। वक्ता ने श्री रामानुजाचार्य जी के सिद्धांतों के संक्षिप्त निरूपण के उद्देश्य से सत्र की रूपरेखा प्रस्तुत की, जिसमें उनकी जीवनी, वैष्णव संप्रदाय में उनका योगदान, और प्रमाण-प्रमेय व्यवस्था शामिल है। सत्र के अंत में प्रश्नोत्तर के लिए समय रखने की बात भी कही गई।
श्री रामानुजाचार्य का व्यक्तित्व एवं योगदान
वक्ता ने श्री रामानुजाचार्य जी के 'पुण्यंभोज विकासाय पाप क्षया' श्लोक का अर्थ स्पष्ट करते हुए बताया कि उनके उदय से वैष्णव भक्तों का विस्तार हुआ और मायावाद जैसे अन्य सिद्धांतों का क्षय हुआ। रामानुजाचार्य जी के उदार हृदय को रेखांकित करते हुए, उनके समाज सुधार के कार्यों पर प्रकाश डाला गया, विशेषकर अंत्यज वर्ण के लोगों को मंदिरों में प्रवेश दिलाने और कैंकर्य में जोड़ने का प्रयास। उन्होंने उदाहरण दिया कि कैसे रामानुजाचार्य ने एक बालक द्वारा बालू से निर्मित भगवान के लड्डू प्रसाद के रूप में सहर्ष स्वीकार किए, जिससे भक्ति रस का प्रवाह हुआ और शरणागति मार्ग में सभी वर्णों और जातियों के लोगों को मोक्ष का अधिकार प्राप्त हुआ।
श्री वैष्णव संप्रदाय की पूर्वाचार्य परंपरा
वक्ता ने श्री रामानुजाचार्य जी के मंगलाचरण 'पाराशर्य वच सुधा' के माध्यम से समझाया कि उनके सिद्धांत स्वयं के नहीं, बल्कि पूर्वाचार्यों द्वारा सुरक्षित हैं। भगवान बोधायन, टंक, द्रविड़, गुदेव, भारुच, ब्रह्मानंदी जैसे प्राचीन ऋषियों को विशिष्ट अद्वैत मत का अनुयायी बताया गया। इसके उपरांत, श्री वैष्णव संप्रदाय की आचार्य परंपरा का निरूपण किया गया, जिसमें महालक्ष्मी से विश्वसेन और विश्वसेन से आलवारों तक की शिक्षा का उल्लेख किया गया। षटकोप आलवार (नम्माळ्वार) को 'मेघ' के समान बताया गया, जिन्होंने वेद के सार को द्रविड़ भाषा में सुगम बनाया, जिससे साधारण भक्तों को क्लेश रहित ज्ञान की प्राप्ति हुई। आलवारों की प्रगाढ़ भक्ति का भी वर्णन किया गया।
श्री रामानुजाचार्य का जन्म एवं गुरुमुख से शिक्षा
वक्ता ने श्री रामानुजाचार्य जी के प्राकट्य की कथा बताई, जिसमें भगवान के चिंतित होने पर शेषनाग का अवतार लेने का वर्णन है। उनका जन्म श्रीपेरुम्बदूर में केशव सोमयागी और कांतिमती के पुत्र के रूप में हुआ, और उनका नामकरण शैल पूर्ण स्वामी द्वारा रामानुज किया गया। उनकी शिक्षा यादव प्रकाश के अधीन हुई, जहाँ वेदान्त सूत्रों की व्याख्या पर मतभेद हुए, विशेषकर 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' और 'कप्यासं पुण्डरीकाक्षम्' श्लोकों के अर्थ को लेकर। रामानुजाचार्य जी ने ब्रह्म को सगुण और भगवान के नेत्रों को सूर्य से प्रकाशित कमल के समान बताया। यादव प्रकाश द्वारा उनके वध के प्रयास, भगवान वरदराज द्वारा रक्षण, और कांचीपूर्ण स्वामी के आदेश पर तीर्थ कैंकर्य करने का वृत्तांत भी प्रस्तुत किया गया।
श्री रामानुजाचार्य के उपदेश एवं उदारता
यमनाचार्य के शरीर त्याग के समय रामानुजाचार्य ने ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखने, आलवारों के प्रबंधों का प्रचार करने और ऋषियों की कीर्ति फैलाने का संकल्प लिया। उन्होंने गोष्ठीपूर्ण स्वामी से दीक्षा प्राप्त करने के लिए अट्ठारह बार यात्रा की, परंतु बाद में दीक्षा को सरल बना दिया। वक्ता ने भगवान वरदराज द्वारा कांचीपूर्ण स्वामी के माध्यम से रामानुजाचार्य को दिए गए छह वाक्य उपदेशों का उल्लेख किया, जिनमें परम तत्व, भेद दर्शन, शरणागति उपाय, अंतिम स्मृति के महत्व का अभाव, और मोक्ष प्राप्ति शामिल है। रामानुजाचार्य ने कश्मीर से बोधायन की वृत्ति प्राप्त कर श्रीभाष्य की रचना की। उनके उदार हृदय का प्रमाण राजा विष्णुवर्धन के माध्यम से शिव मंदिरों का जीर्णोद्धार करवाना और वैष्णवों में जातीय भेद की भावना का खंडन करना बताया गया।
श्री रामानुजाचार्य का प्रमेय एवं विशिष्टाद्वैत सिद्धांत
वक्ता ने श्री रामानुजाचार्य द्वारा दिए गए छह अंतिम उपदेशों का वर्णन किया: श्रीभाष्य का अध्ययन और प्रचार, षटकोप आलवार के प्रबंधों का अध्ययन, दिव्य देशों में निवास, भगवान और भक्तों की सेवा, 'भगवान ही उपाय हैं' का सदैव मनन, और यादवादरी में निवास। प्रमाण व्यवस्था के अंतर्गत वेद को सर्वोच्च प्रमाण, उसके बाद रामायण, महाभारत और पुराणों को स्थान दिया गया। पुराणों को सात्विक, राजसिक, तामसिक में वर्गीकृत किया गया, जिसमें विष्णु पुराण और श्रीमद्भागवत को प्रमुख सात्विक पुराण माना गया। प्रमेय व्यवस्था में चित्, अचित् और ईश्वर को तीन तत्व बताया गया, जो एक-दूसरे से भिन्न हैं। विशिष्टाद्वैत सिद्धांत को 'शरीर आत्म भाव' और 'अपथक विशेषण' के माध्यम से समझाया गया, जहाँ चित् और अचित्, ब्रह्म के शरीर होने के कारण उससे विशिष्ट होते हैं, परंतु अलग नहीं।
प्रश्नोत्तर — श्री रामानुजाचार्य का शेषावतार स्वरूप
सत्र के अंत में प्रश्नोत्तर का क्रम आरम्भ होता है। एक प्रतिभागी (कुंज) ने प्रश्न किया कि श्री रामानुजाचार्य को शेषनाग जी का अवतार क्यों माना जाता है, क्योंकि वक्ता ने कथा में भगवान की चिंता और शेषनाग जी के उद्धार के प्रयत्न का वर्णन किया था। वक्ता ने इस प्रश्न का उत्तर देते हुए स्पष्ट किया कि श्री रामानुजाचार्य को साक्षात् शेषावतार माना जाता है। उनके पिता को पुत्र प्राप्ति न होने पर चेन्नई के पार्थ सारथी भगवान के मंदिर में विनती करने पर भगवान ने स्वप्न में उन्हें बताया था कि वे स्वयं उनके पुत्र रूप में अवतरित होंगे, जिससे यह भी ज्ञात होता है कि उनमें भगवान का अंश भी विद्यमान है। आगे की चर्चा अगले सत्र में होने की बात कही गई।