श्रीवल्लभनन्दनम् वन्दना
इस खंड में श्रीवल्लभनन्दनम् की वन्दना प्रस्तुत की गई है, जो श्रोताओं को भगवद्भाव में लीन करती है। यह पुष्टिमार्गीय परम्परा का एक महत्वपूर्ण अंश है।
कीर्तन : चरण चिंता संतामाम
सत्र का प्रारम्भ 'चरण चिंता संतामाम' कीर्तन से होता है, जो भक्तों को भगवान् के चरणों की चिंता में निमग्न करता है। यह कीर्तन भक्तिभाव को जागृत करने में सहायक है।
कीर्तन : मीठो मदन गोपाल
इस खंड में 'मीठो मदन गोपाल' कीर्तन का गायन किया गया है। यह कीर्तन श्रीठाकुरजी के मधुर स्वरूप और लीलाओं का स्मरण कराता है, जिससे मन में प्रेमभाव की वृद्धि होती है।
भगवद्वार्ता : गदाधर दास का प्रसंग
गदाधर दास की भगवद्वार्ता का वर्णन किया गया है, जहाँ गाँव के ब्राह्मण गदाधर दास से ईर्ष्या करते थे। उन्होंने एक बंजारे को बहकाकर गदाधर दास से बैल लेने के लिए भेजा। गदाधर दास ने बंजारे को भगवत्सेवा का महत्व समझाया, जिससे उसे भगवदीय ज्ञान प्राप्त हुआ। इस प्रसंग से यह सिद्ध होता है कि वैष्णवों के संग से कुबुद्धि भी सुबुद्धि में बदल जाती है।
भगवद्वार्ता से सीख एवं पारिभाषिक शब्दों की व्याख्या
भगवद्वार्ता से प्राप्त सीख पर चर्चा की गई है, जिसमें ईर्ष्या न करने और किसी भी कार्य को बिना जांचे-परखे न करने का उपदेश दिया गया। वक्ता ने ब्राह्मण की परिभाषा में शुद्ध जन्म, शुद्ध संस्कार, शुद्ध कर्म और शुद्ध वृत्ति की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। इसके अतिरिक्त, गदाधर दास, ईर्ष्या, वैष्णव, महाप्रसाद, मध्यान और दैवी जीव जैसे महत्वपूर्ण पारिभाषिक शब्दों की विस्तृत व्याख्या की गई है।
जलभेद श्लोक ३५-४७ का पाठ एवं विवेचन
श्रीमहाप्रभुजी के जलभेद ग्रंथ के श्लोक ३५ से ४७ का पाठ किया गया है। इन श्लोकों में विभिन्न प्रकार के जीवों, उनके गुणों और भगवदीय भक्तों की विशेषताओं का वर्णन है। वक्ता ने दैवी जीव और आसुरी जीव के भेद तथा भगवान् द्वारा उन्हें भक्ति और मुक्ति प्रदान करने के स्वरूप पर चर्चा की। इन श्लोकों के माध्यम से भगवदीयता और अलौकिक ज्ञान के महत्व को समझाया गया है।
जलभेद श्लोक ४८-५५ एवं भक्तिवर्धिनी श्लोक ६-८ का पाठ एवं विवेचन
जलभेद के श्लोक ४८ से ५५ का पाठ किया गया, जिसमें भगवदीय गुणों की विशिष्टता और अजामिल जैसे भक्तों की महिमा का उल्लेख है। इसके पश्चात, श्रीगुसाईंजी कृत भक्तिवर्धिनी के श्लोक ६, ७ और ८ का पाठ एवं विवेचन हुआ। इसमें कलियुग में कर्ममार्ग की अकर्तव्यता, भक्तिमार्ग की आवश्यकता, अभिमान त्याग का महत्व और देह से होने वाली बाधाओं को साधनार्थम् भाव से दूर करने की शिक्षा दी गई है। यह विवेचन पुष्टिमार्ग के मूल सिद्धान्तों को स्पष्ट करता है।