मंगलाचरण
यह खंड मंगलाचरण के पाठ के लिए समर्पित है।
कीर्तन और माधवदास-बेनीदास वार्ता का प्रारम्भ
सत्र का प्रारम्भ कीर्तन से होता है, जिसमें श्रीवल्लभ के चरणों में प्रीत बाँधने की महिमा गाई जाती है। इसके उपरांत, माधवदास और बेनीदास की वार्ता का प्रारम्भ होता है। माधवदास ने बेनीदास से श्रीनवनीतप्रियाजी के लिए माला खरीदने को कहा, परन्तु बेनीदास ने यह कहकर मना किया कि सभी वस्तुएँ श्रीठाकुरजी की ही हैं। इस पर माधवदास ने अपना द्रव्य बाँटकर अलग होने का निर्णय लिया ताकि वे श्रीनवनीतप्रियाजी के लिए माला खरीद सकें।
वार्ता से प्राप्त सीख और पारिभाषिक शब्दों की व्याख्या
माधवदास के दक्षिण माला लेने जाने के मार्ग में श्रीनवनीतप्रियाजी ने दर्शन देकर नाव डुबोने की बात कही, जो माधवदास की परीक्षा थी। माधवदास ने इस पर उत्तर दिया कि सेवक का धर्म है उद्यम करना और बैठे न रहना। वक्ता ने इस प्रसंग से यह सीख दी कि हमें ठाकुरजी को छोड़कर नहीं जाना चाहिए, परन्तु यदि ठाकुरजी की सेवा के लिए उत्तम वस्तु की प्राप्ति हेतु जाना पड़े, तो वह भगवत्प्रेरणा से होता है। इसके बाद नवनीतप्रियाजी, वैष्णव, आचार्यजी, माधवदास, प्रयाग, धर्म और शास्त्र जैसे पारिभाषिक शब्दों की व्याख्या की गई। माधवदास का अर्थ 'लक्ष्मीपति के दास' बताया गया। धर्म को शास्त्र की आज्ञा स्वरूप समझाया गया।
सिद्धांत मुक्तावली और सन्यास निर्णय का पाठ
सत्र के इस भाग में श्रीवल्लभाचार्यप्रभुविरचित सिद्धांत मुक्तावली की कारिका १ से २५ तक का पाठ किया गया। इन कारिकाओं में भगवत्सेवा के स्वरूप, ब्रह्मबोधन, श्रीकृष्ण के सच्चिदानंद स्वरूप, और पुष्टि तथा मर्यादा मार्ग के भेद का वर्णन है। इसके पश्चात्, सन्यास निर्णय की कारिका १ से १३ तक का पाठ किया गया, जिसमें सन्यास के प्रकार और भक्तिमार्ग में कर्तव्यत्व का विचार प्रस्तुत किया गया। अंतिम कारिका में भक्तों के लिए त्याग को सुखदायक बताया गया।