मंगलाचरण
यह खण्ड मंगलाचरण हेतु समर्पित है।
कीर्तन — "रथ बैठे पिय प्यारी राजत"
इस खण्ड में "रथ बैठे पिय प्यारी राजत" कीर्तन का गायन होता है। श्रीठाकुरजी एवं श्रीस्वामिनीजी रथ में विराजमान हैं और आस-पास युवती जन गा रहे हैं, परस्पर तालियां दे रहे हैं। ताल पखावज आदि बज रहे हैं और ब्रज सुंदरियाँ इस शोभा को निरखकर कुतूहल कर रही हैं।
हरिवंश पाठक की भगवद्वार्ता
यह खण्ड श्री आचार्यजी महाप्रभुजी के सेवक हरिवंश पाठक सारस्वत ब्राह्मण की वार्ता पर आधारित है। हरिवंश पाठक पटना में एक हाकिम से बहुत मिले थे, जिसने उनसे कुछ मांगने को कहा। डोल उत्सव के दिन निकट आने पर, श्रीठाकुरजी ने हरिवंश पाठक को डोल झुलाने को कहा। तब हरिवंश पाठक ने हाकिम से दिन में काशी पहुँचने का साधन माँगा, जिसे हाकिम ने घोड़ों और मनुष्यों के साथ पूरा किया। इस प्रकार हरिवंश पाठक डोल उत्सव में सम्मिलित हो पाए और अपना धर्म गोप रखा।
उच्चार शुद्धि — प्रमुख शब्दों की व्याख्या
वक्ता इस खण्ड में कुछ महत्वपूर्ण पुष्टिमार्गीय शब्दों की व्याख्या करते हैं। 'उत्सव' का अर्थ मन का आनंद बाहर छलकना है। 'ठाकुरजी' शब्द का प्रयोग श्रीठाकुरजी को सम्मान से बुलाने हेतु किया जाता है। 'गृहस्थ' आश्रम चार आश्रमों में से दूसरा है, जहाँ विवाह के पश्चात् घर का पालन किया जाता है। 'भगवदीय' वे हैं जिन्हें भगवान ने अंगीकार किया है। 'धर्म' वह है जो शास्त्र द्वारा आज्ञापित हो।
उच्चार शुद्धि — 'प्रवाह मर्याद भेद पुष्ट' श्लोक का अभ्यास
इस खण्ड में 'प्रवाह मर्याद भेद पुष्ट प्रवाह मर्यादा विशेषण प्रथक' से प्रारम्भ होने वाले श्लोकों का उच्चारण अभ्यास किया जाता है। वक्ता प्रतिभागियों को श्लोक पाठ में आने वाली अशुद्धियों को सुधारने का निर्देश देते हैं। विशेषतः 'प्रवाहन फलेन च', 'मोक्ष प्रवेशः', 'रूप सेवांमृष्टि', 'भगवत कार्य सिद्ध पुष्ट्या विम सर्वज्ञ', 'मच्छ फलम लोके वेदोम वेदिक पाए तू फलं पुष्टोने' आदि पंक्तियों के उच्चारण पर बल दिया जाता है।
उच्चार शुद्धि — 'विरहानुभवार्थं तु परित्याग' श्लोक का अभ्यास
इस खण्ड में 'विरहानुभवार्थं तु परित्याग प्रशस्यते स्वीय बंध निवृत्त्यर्थम् वेशोत्र नचान्यता' इस श्लोक के शुद्ध उच्चारण का गहन अभ्यास कराया जाता है। प्रतिभागियों द्वारा इस श्लोक का बार-बार पाठ किया जाता है, और वक्ता सही स्वर एवं गति का मार्गदर्शन करते हैं। इस श्लोक का शुद्ध पाठ पुष्टिमार्गीय साधना के लिए आवश्यक है।
उच्चार शुद्धि — 'कौडिन्यो गोपिका प्रोक्ता' श्लोक का अभ्यास
सत्र के इस अंतिम खण्ड में 'कौडिन्यो गोपिका प्रोक्ता गुरवः साधनं च तद' इस श्लोक के शुद्ध उच्चारण का अभ्यास किया जाता है। वक्ता प्रतिभागियों को इस पंक्ति का सही ढंग से पाठ करने का निर्देश देते हैं और सत्र का समापन करते हैं।