मंगलाचरण एवं लालन कीर्तन
सत्र का प्रारम्भ मंगलाचरण से होता है, जिसके उपरान्त लालन कीर्तन का गायन किया गया। यह कीर्तन प्रभु के जन्मोत्सव की बधाई का वर्णन करता है, जहाँ सभी ग्वाल-ग्वालिनें आनंदमग्न होकर बधाई दे रही हैं। ताल, मृदंग, और बाँसुरी जैसे वाद्य बज रहे हैं, और घर-घर में मिठाई लुटाई जा रही है। इस उल्लासमय वातावरण में परमानंददासजी ने कंस के भय की समाप्ति और ब्रज में व्याप्त हर्ष का चित्रण किया है।
भगवद्वार्ता: श्रीगदाधरदासजी का प्रसङ्ग
इस भाग में श्रीगदाधरदासजी की एक भगवद्वार्ता का वर्णन किया गया है। उन्होंने वैष्णवों को महाप्रसाद हेतु बुलाया था, किन्तु साग की कमी थी। तब श्रीमाधवदासजी-बेणीदासजी ने अपने सेवाभाव से बथुआ का साग लाकर यह कमी पूरी की। श्रीठाकुरजी ने वह साग आरोग्य किया, जिससे श्रीगदाधरदासजी प्रसन्न हुए और श्रीमाधवदासजी-बेणीदासजी को आशीर्वाद दिया कि उनकी हरिभक्ति दृढ़ होगी। इस प्रसङ्ग से उत्तम वस्तु श्रीठाकुरजी को अर्पण करने और वैष्णव सम्मान के महत्त्व पर प्रकाश डाला गया।
भक्ति का स्वरूप एवं महिमा
यहाँ भक्ति की परिभाषा और महिमा पर चर्चा की गई। वक्ता ने स्पष्ट किया कि हरिभक्ति का अर्थ है ज्ञानपूर्वक, अत्यंत स्नेह से श्रीठाकुरजी की सेवा करना। यह परिभाषा नारद पंचरात्र ग्रंथ में दी गई है। 'हरि' शब्द का अर्थ बताते हुए कहा गया कि हरि वह हैं जो दुखों का हरण करते हैं। भक्तिवर्धिनी के कुछ श्लोकों का पाठ भी किया गया, जिसमें भक्ति की वृद्धि और उसके विभिन्न अंगों का उल्लेख है, जैसे प्रेम, आसक्ति, और विषय-त्याग।
उच्चार शुद्धि अभ्यास
सत्र का अंतिम खंड उच्चार शुद्धि के अभ्यास के लिए समर्पित था। इसमें नारद पंचरात्र के श्लोकों के विभिन्न खंडों, जैसे 'अभिमानान नियोगाच तद धर्म च विरोधतः गृह दे बाधकत्व साधनार्थम तथा यदि', का सस्वर उच्चारण किया गया। प्रतिभागियों ने शुद्ध और स्पष्ट रूप से श्लोकों को दोहराया, जिससे उनके संस्कृत उच्चारण में सुधार हो सके। इस अभ्यास का उद्देश्य शास्त्रीय पदों के सही पाठ को सुनिश्चित करना है।