कीर्तन : 'मीठो मदन गोपाल'
सत्र का प्रारम्भ 'मीठो मदन गोपाल' पद के मधुर कीर्तन के साथ हुआ। इस कीर्तन के माध्यम से श्रीठाकुरजी की अनुपम छवि, उनके सुंदर नैनों और गुमुदवन में निवास करने की लीलाओं का भावपूर्ण गुणगान किया गया। वक्ता ने इस कीर्तन द्वारा भावभक्ति के महत्त्व को अभिव्यक्त किया।
भगवद्वार्ता : गदाधर दास प्रसंग
गदाधर दास और बंजारे के तीसरे प्रसंग का वर्णन किया गया। एक बंजारे को बैल खरीदने थे और गाँव के ब्राह्मणों ने ईर्ष्यावश उसे गदाधर दास के पास भेजा, यह जानते हुए कि उनके पास बैल नहीं हैं। गदाधर दास ने बंजारे से ₹100 लेकर सामग्री मंगाई, भोग धरा और मध्याह्न के समय बंजारे को समझाया कि ये सभी गुरुजी के बैल (अर्थात् श्रीठाकुरजी के सेवक) हैं। इस प्रसंग से बंजारे को भगवदीय ज्ञान प्राप्त हुआ। वक्ता ने इस वार्ता से ईर्ष्या न करने, बिना जांच के कार्य न करने, वैष्णव संग की उत्तमता तथा कुबुद्धि के सुबुद्धि बनने की सीख दी।
पारिभाषिक शब्दावली
सत्र में 'ब्राह्मण', 'गदाधर दास', 'ईर्ष्या', 'वैष्णव', 'महाप्रसाद', 'मध्यान' और 'देवी जीव' जैसे महत्त्वपूर्ण पारिभाषिक शब्दों की व्याख्या की गई। ब्राह्मण की परिभाषा में शुद्ध जन्म, शुद्ध संस्कार और शुद्ध कर्म की अनिवार्यता बताई गई। महाप्रसाद को भोग स्वीकार करने वाला बताया गया जिसे बेचा या खरीदा नहीं जा सकता। मध्यान का अर्थ प्रहर के संदर्भ में समझाते हुए दिन और रात के चार-चार प्रहरों का उल्लेख किया गया। देवी जीव के दो प्रकार—दैवी और आसुरी—पर प्रकाश डाला गया।
जलभेद : श्लोक ३५-५५
श्रीआचार्यचरणकृत जलभेद ग्रन्थ के श्लोक ३५ से ५५ का पाठ किया गया। यह भाग भगवदीय भक्तों के विभिन्न स्वरूपों और उनकी प्रेमलक्षणा भक्ति के भेदों का सूक्ष्म विवेचन प्रस्तुत करता है, जहाँ प्रत्येक भक्त की निजी स्थिति और भाव की विशिष्टता दर्शायी गई है। इन श्लोकों में जल के भेदों के माध्यम से जीव भेद और गुण भेद को समझाया गया है, जो हरिगुणों में अलौकिक ज्ञान के समावेश को दर्शाते हैं।
भक्तिवर्धिनी : श्लोक ६-९
श्रीआचार्यचरणकृत भक्तिवर्धिनी ग्रन्थ के श्लोक ६ से ९ का पाठ किया गया। इन श्लोकों में कलियुग में कर्ममार्ग की अपेक्षा भक्तिमार्ग के कर्तव्यत्व पर बल दिया गया है। भगवान् में अभिमान रहित संग तथा देह के बाधकत्व को दूर करने के साधनों पर विचार किया गया है, जो भक्तिमार्ग की स्थापना और पुष्टि के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।