मंगलाचरण
यह खंड सत्र के प्रारम्भ में किए गए मंगलाचरण को समर्पित है। इस मंगलाचरण में आराध्यदेव का स्मरण कर सत्संग की सफलता के लिए प्रार्थना की जाती है।
नारायणदास ब्रह्मचारी की वार्त्ता एवं पारिभाषिक शब्दों की व्याख्या
इस भाग में नारायणदास ब्रह्मचारी के पांचवें प्रश्न से संबंधित प्रसंग का विस्तार से विवेचन किया गया। वक्ता ने 'सेवा' शब्द का अर्थ उस क्रिया के रूप में समझाया जिससे प्राप्तकर्ता प्रसन्न होते हैं। 'ठाकुरजी' को स्वामी और स्वयं को सेवक मानकर उनकी प्रसन्नता हेतु आज्ञापालन को सेवक का धर्म बताया गया। शरीर के स्थूल एवं सूक्ष्म भेद, गोकुलचन्द्रमाजी के शीतल प्रकाश का महत्व, गोस्वामीजी का 'गो' (इन्द्रियाँ, वेद) के स्वामी के रूप में अर्थ, और नारायण का ऐश्वर्य स्वरूप के रूप में विवेचन किया गया। नारायण को सृष्टि के नियंत्रक परब्रह्म के रूप में प्रस्तुत किया गया, जो श्रीकृष्ण के स्वरूप से भिन्न होते हुए भी एक ही हैं।
श्री कृष्णाष्टकम का पाठ
यह खंड श्री कृष्णाष्टकम के भावपूर्ण पाठ को समर्पित है। इसमें श्रीगोपगोकुल विवर्धन, नन्दनन्दन, राधापते, व्रजराज, गोविन्द, यदुतामार, विश्वनाथ, गोकुलपते जैसे संबोधनों के माध्यम से श्रीकृष्ण के विविध गुणों, लीलाओं और स्वरूपों का स्मरण किया गया। अष्टकम के श्लोकों का पाठ करते हुए श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम और शरणागति का भाव व्यक्त किया गया। सत्र में अष्टकम के फल-श्रुति श्लोकों का भी पाठ किया गया।
त्याग का महत्व एवं अद्वैत दर्शन
इस भाग में 'त्याग' के आध्यात्मिक महत्व पर चर्चा की गई। वक्ता ने सत्रहवीं आयत के संदर्भ में त्याग को व्यक्तिगत उन्नति और स्वास्थ्य के लिए आवश्यक बताया। शरीर और मन से जुड़ी आसक्तियों के परित्याग की बात कही गई। चर्चा में अद्वैत दर्शन के अनुसार ब्रह्म के निरंतर अस्तित्व पर प्रकाश डाला गया, और नारायण को जगत् के नियंत्रक एवं अंतर्यामी के रूप में समझाया गया, जिनके भिन्न-भिन्न अर्थ और रूप होते हुए भी मूलतः वे परब्रह्म से अभिन्न हैं। सही ढंग से बोलने और उदाहरणों के माध्यम से बात को स्पष्ट करने की आवश्यकता पर भी बल दिया गया।