दिनकर सेठ की कथा का आरम्भ
प्रयाग में रहने वाले क्षत्रिय दिनकर सेठ की कथा का आरम्भ होता है। वे संसार से विरक्त होकर केवल भगवत्कथा सुनना चाहते थे। परिवार की सौ कहानियों की बजाय उन्हें भगवत्कथा अधिक प्रिय थी। उनके विवाह के समय भी उनका मन लौकिक कार्यों में नहीं लगा। उन्होंने अपनी माता से गहनों और कपड़ों के बजाय भगवत्कथा सुनने की इच्छा व्यक्त की।
श्री आचार्यजी का दिनकर सेठ पर अनुग्रह एवं सत्संग महिमा
दिनकर सेठ की भगवत्कथा श्रवण की उत्कट अभिलाषा के कारण उनकी भेंट कृष्णदास मेघना से हुई, जिन्होंने उन्हें श्री आचार्यजी के पास ले जाकर दशमस्कन्ध के भ्रमरगीत व्याख्यान का अवसर प्रदान किया। दिनकर सेठ यह कथा सुनकर भावविभोर हो जाते और उनके नेत्रों से अश्रु प्रवाहित होते। वक्ता ने इस प्रसंग से वैष्णव संगति और उनके प्रति द्वेष न करने के महत्त्व को समझाया। वैष्णवों को सदैव श्रेष्ठ मानना चाहिए और उनमें दोष नहीं देखना चाहिए।
भ्रमरगीत व्याख्यान और मानव देह का महत्त्व
वक्ता ने दशमस्कन्ध के भ्रमरगीत प्रसंग की महिमा का वर्णन किया, जहाँ उद्धवजी के व्रज आगमन पर व्रजभक्तों का ठाकुरजी के प्रति अनन्य प्रेम व्यक्त होता है। दिनकर सेठ यह व्याख्यान सुनकर अपने दिन को व्यर्थ जाने से बचाते थे। मानव देह का महत्त्व बताते हुए कहा गया कि यह दुर्लभ शरीर भगवत्सेवा के लिए ही मिला है, जिसे व्यर्थ नहीं गँवाना चाहिए। भगवत्सेवा और कीर्तन में भक्ति से ध्यान लगाना आवश्यक है।
पुष्टिमार्गीय पारिभाषिक शब्दों का विवेचन
इस खंड में पुष्टिमार्ग के कई पारिभाषिक शब्दों की व्याख्या की गई है। 'सेवा' का अर्थ समझाया गया कि जिसके बिना नहीं रहा जा सके। 'प्रेम' के विभिन्न स्तरों (रुचि, स्नेह) पर चर्चा की गई। 'नाम दीक्षा' और 'शरण दीक्षा' के महत्त्व को स्पष्ट किया और 'अष्टाक्षर मंत्र' (श्रीकृष्णशरणं मम) का गूढ़ अर्थ समझाया गया। 'पांडा' शब्द का अर्थ विद्वत्ता और शास्त्रों के ज्ञान से जोड़ा गया, तथा 'अंतःकरण' की भी व्याख्या की गई।