मंगलाचरण
यह खंड सत्र के आरंभ में मंगलाचरण के पाठ को समर्पित है। वक्ता द्वारा मंगलाचरण का पाठ किया गया, जिससे सत्र का आध्यात्मिक वातावरण तैयार होता है। इस भाग में किसी विशिष्ट ग्रन्थ या श्लोक पर चर्चा नहीं की गई है, यह केवल प्रारंभिक प्रार्थना है।
मुकुंद दास की भगवद्-ज्ञान की जिज्ञासा
इस खंड में मुकुंद दास और एक पंडित के बीच भगवद्-ज्ञान को लेकर हुई वार्ता का वर्णन है। पंडित जी उज्जैन के ब्राह्मण थे, जिन्होंने मुकुंद दास से भगवद् गीता के एक श्लोक की व्याख्या करने की चुनौती स्वीकार की। मुकुंद दास ने आग्रह किया कि पंडित जी बिना कथा सुने भगवद् गीता के मूल अंश की व्याख्या करें। इस प्रसंग में भगवतजी की महानता और भक्त के माध्यम से भगवान की शक्ति के प्रकटीकरण पर बल दिया गया। वक्ता ने बताया कि अहंकार भक्त के सामने टिक नहीं सकता, क्योंकि भक्त पर भगवान की कृपा होती है।
भगवतजी का स्वरूप और भक्ति की महानता
वक्ता ने स्पष्ट किया कि भगवत, भगवान का नाम और स्वरूप है। भगवतजी किसी प्रतिस्पर्धा का विषय नहीं हैं, क्योंकि वे स्वयं भगवत्स्वरूप हैं। उनकी महानता वही जान सकता है जिसे ठाकुरजी ने चुना हो या जो उनके कृपापात्र हों। पंडित जी प्रतिस्पर्धी भावना से आए थे, इसलिए वे भगवतजी के वास्तविक स्वरूप को नहीं समझ पाए। यह दर्शाता है कि भगवान की कृपा से भक्त में कितनी शक्ति आती है, जिससे प्रभु की इच्छा से उसकी महानता प्रकट होती है। अतः भक्त को प्रतिस्पर्धा की भावना से दूर रहना चाहिए।
पारिभाषिक शब्दों का विवेचन — आचार्यजी, ठाकुरजी, ग्रंथ, पंडित, गोसाईंजी, ब्राह्मण, भगवद, जीव, वैष्णव, लीला, सुबोधिनी, अवंतिका, भगवदीय, सन्यास
इस खंड में वक्ता ने विभिन्न पुष्टिमार्गीय पारिभाषिक शब्दों की विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत की। 'आचार्यजी' का अर्थ शास्त्रों का पठन और आचरण करने वाला बताया गया। 'ठाकुरजी' को स्वामी, 'ग्रंथ' को किसी विषय की संपूर्ण जानकारी का संग्रह, और 'पंडित' को पांडा शब्द से व्युत्पन्न बुद्धिमान व्यक्ति समझाया गया। 'गोसाईंजी' को गोस्वामीजी का संक्षिप्त रूप और गायों के स्वामी तथा वेदों के स्वामी के अर्थ में प्रस्तुत किया गया। 'ब्राह्मण' की परिभाषा जन्म से मृत्यु तक के संस्कारों और सहज प्रवृत्ति से की गई। 'भगवत' को पुराण महापुराण और श्रीकृष्ण का अंतिम पुराण बताया गया। 'जीव' को सच्चिदानंद धर्म वाला और सुख-दुःख का अनुभव करने वाला कहा गया। 'वैष्णव' को विष्णु के अनन्य भक्त और 'लीला' को आनंदपूर्ण तथा प्रयोजनरहित मनोरंजन के रूप में परिभाषित किया गया। 'सुबोधिनी' को भगवतजी पर लिखी गई परिभाषा और आलोचना कहा गया। अवंतिका को उज्जैन शहर के रूप में पहचाना गया, जो मोक्षदायी तीर्थों में से एक है। 'भगवदीय' उन लोगों को कहा गया जो ईश्वर में हैं या ईश्वर द्वारा अपने वश में किए गए हैं। अंत में 'सन्यास' शब्द पर संक्षिप्त चर्चा हुई।
श्री श्री गोकुलेशष्टकम का पाठ
सत्र के अंतिम भाग में वक्ता ने श्री श्री गोकुलेशष्टकम का पाठ किया। यह पाठ श्री गोकुलेश प्रभु की स्तुति में है, जिसमें उनके स्वरूप, लीलाओं और भक्तों के प्रति उनकी कृपा का वर्णन किया गया है। यह अष्टकम पुष्टिमार्ग में विशेष महत्व रखता है और प्रभु के गुणों का गायन करता है। पाठ के माध्यम से प्रभु के विभिन्न नामों और रूपों का स्मरण किया गया।