मंगलाचरण
सत्र का प्रारम्भ परम्परानुसार मंगलाचरण के साथ हुआ।
बधाई कीर्तन
सत्र में 'बधाई' कीर्तन का गायन किया गया, जिसमें नंदगाँव में श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव की मंगलमयी बधाई का भाव व्यक्त होता है। भक्त जन अपने आराध्य के प्राकट्य पर आनंदित होते हुए बधाई देते हैं।
प्रभुदासजी की वार्ता
इस खंड में प्रभुदासजी की एक मार्मिक वार्ता का वर्णन किया गया, जिसमें वे अपनी बिगड़ी हुई रसोई को ठाकुरजी को समर्पित करने में संकोच करते हैं। जब ठाकुरजी स्वयं श्रीआचार्यजी से भोग न धरने की बात कहते हैं, तब आचार्यजी प्रभुदासजी को सावधानी से सेवा करने और भोग समर्पित किए बिना महाप्रसाद न लेने का उपदेश देते हैं।
समर्पण और सेवा का महत्त्व
वक्ता ने भगवद्सेवा में अपने हाथ से सेवा करने पर ज़ोर दिया और समझाया कि हमारी सभी क्रियाएँ भगवदर्थ होनी चाहिए। उन्होंने 'सिद्धांत रहस्य' और 'सिद्धांत मुक्तावली' के आधार पर सर्व वस्तु समर्पणम और निवेदित वस्तु के उपयोग के सिद्धांत को स्पष्ट किया।
श्रीगोपीजनवल्लभाष्टकम् का उच्चार शुद्धि अभ्यास
इस भाग में श्रीगोपीजनवल्लभाष्टकम् के कुछ श्लोकों का उच्चार शुद्धि अभ्यास किया गया। प्रतिभागियों ने श्लोक पाठ किया और वक्ता ने उनके उच्चारण में सुधार करवाया। विशेष रूप से 'सरोज नेत्राय', 'मृगेंद्र हस्ताय', 'नमोस्तु गोपीजनवल्लभाय' जैसे पदों पर ध्यान दिया गया।
निरोधलक्षणम् श्लोक १०-११ का उच्चार शुद्धि अभ्यास
सत्र के अंतिम चरण में निरोधलक्षणम् के श्लोक 'दुःखं चेद्यशोदाया...' (श्लोक ११) और 'महतां कृपया यावद्...' (श्लोक १०) का उच्चार शुद्धि अभ्यास करवाया गया। वक्ता ने शब्दों के सही उच्चारण, जैसे 'महताम कृपया' (महतां कृपया) और 'दयशति' (दयते यदि) पर विशेष बल दिया, ताकि भक्त शुद्ध रूप से भगवद् ग्रन्थों का पाठ कर सकें।