मंगलाचरण
यह खंड मंगलाचरण के साथ सत्र के आरम्भ को दर्शाता है।
[मंगलाचरण का पाठ अथवा गायन होता है।]
कीर्तन गायन
सत्र की शुरुआत श्रीठाकुरजी के मधुर कीर्तन गायन से होती है। 'अयोध्या रे कारी बदरिया' और अन्य पदों का गायन किया जाता है। यह कीर्तन 'दादीजी' द्वारा रचित है, जिसका भावपूर्ण प्रस्तुतीकरण होता है। कीर्तन के माध्यम से भक्तिरस का अनुभव कराया जाता है, जो पुष्टिमार्ग कीर्तन परंपरा का एक अभिन्न अंग है।
दादीजी द्वारा रचित कीर्तन पर चर्चा
वक्ता इस कीर्तन के गायक की सराहना करते हैं और बताते हैं कि यह कीर्तन 'दादीजी' द्वारा रचित है। इस प्रकार, सत्र कीर्तन परंपरा और उसके रचनाकारों के महत्व पर प्रकाश डालता है। वक्ता बताते हैं कि आज 'दिनकरदास मुकुंद' के अवसर पर यह प्रस्तुति दी गई है, या प्रभुदास के अवसर पर चर्चा की जाएगी।
श्रीआचार्यजी और कृष्ण चैतन्य वार्ता
एक वार्ता प्रस्तुत की जाती है, जिसमें श्रीआचार्यजी महाप्रभु के मथुरा आगमन और विश्रांत घाट पर उनके विश्राम का प्रसंग वर्णित है। दामोदरदास रसानी, कृष्णदास मेघन, प्रभुदास और अन्य वैष्णव भोजन बना रहे थे। कृष्ण चैतन्य श्रीआचार्यजी के दर्शन के लिए आए, लेकिन लौटना उनके लिए कठिन था। श्रीआचार्यजी ने कृष्ण चैतन्य की स्थिति पर प्रश्न किया और उनके माध्यम से सनातन गोस्वामी को पुष्टिमार्ग की सिद्धि का रहस्य समझाया।
पुष्टिमार्ग के पारिभाषिक शब्द — पुष्टि
वक्ता 'पुष्टि' शब्द के अर्थ का विवेचन करते हैं। पुष्टि का अर्थ है पुष्ट करना, बलवान करना, मजबूत करना। पुष्टिमार्ग को पुष्टि नाम क्यों दिया गया है, इस पर चर्चा की जाती है। यदि सेवक इतना दुर्बल है, तो फिर पुष्टि कैसे हुई? महाप्रभुजी की रहस्यमयी वार्ता के माध्यम से इस प्रश्न का उत्तर दिया जाता है कि पुष्टिमार्ग भगवत्कृपा का मार्ग है।
पुष्टिमार्ग के पारिभाषिक शब्द — आचार्यजी और सेवा
'आचार्यजी' शब्द का अर्थ समझाया जाता है: जो शास्त्रों का अध्ययन कर उन्हें व्यवहार में लाए और दूसरों को शिक्षा दे, वे आचार्यजी कहलाते हैं। 'श्रीठाकुरजी' का अर्थ भगवान और स्वामी से है। 'सेवा' की परिभाषा बताते हुए वक्ता कहते हैं कि सेवा स्वयं के शरीर और धन से की जानी चाहिए, क्योंकि पराया धन या शरीर भगवान की सेवा के लिए उपयुक्त नहीं। सेवा का मन से भी संबंध है, जब मन सेवा भाव से संगठित होता है।
पुष्टिमार्ग के पारिभाषिक शब्द — मथुरा, संध्यावंदन, अर्ग्या
'मथुरा' शब्द की व्याख्या करते हुए इसे मधुवन, कंस की राजधानी और श्रीकृष्ण की जन्मभूमि बताया जाता है। 'रामायण' के अनुसार, शत्रुघ्न ने मधु नामक राक्षस का वध कर इसे बसाया था। 'संध्यावंदन' का अर्थ त्रिकाल (सुबह, दोपहर, शाम) की उपासना है, जिसमें देवताओं, ऋषियों और परब्रह्म की पूजा होती है। 'अर्ग्या' जल अर्पित करने की क्रिया है, जिसका विशिष्ट विधान होता है।
पुष्टिमार्ग के पारिभाषिक शब्द — वैष्णव, दंडवत प्रणाम, व्रज
'वैष्णव' शब्द की व्याख्या की जाती है, जो भगवान के अनन्य भक्त होते हैं। 'दंडवत प्रणाम' का अर्थ जमीन पर दण्ड की तरह लेटकर झुकना है, जिसे साष्टांग प्रणाम भी कहते हैं। 'व्रज' शब्द का अर्थ बताया जाता है — जहाँ गायों को चरागाह में ले जाया जाता है, जो गतिशील और बार-बार होने वाले घाव के समान है। इसे गोकुल भी कहा जाता है, वह स्थान जहाँ भगवान रहते हैं।
पुष्टि मार्ग में भगवत्कृपा और चुनाव
पुष्टि का अर्थ है केवल ईश्वर की कृपा। जो जीव ईश्वर की कृपा से जन्म लेता है, वह पुष्टिजीव है। पुष्टि का मार्ग भगवत्कृपा से है। निर्गुण भक्ति की सिद्धि के लिए विशेष पुष्टि की आवश्यकता होती है, जहाँ प्रभु स्वयं जीव का चुनाव करते हैं। यदि कोई इस चुनाव का पालन नहीं करता, तो उसे फल भी उसी प्रकार का मिलता है। महाप्रभुजी का आशय है कि भगवत्कृपा सदैव बनी रहती है, भले ही जीव उसे स्वीकार न करे।
श्लोक उच्चार शुद्धि
सत्र के अंत में एक श्लोक के शुद्ध उच्चारण का अभ्यास किया जाता है। वक्ता बताते हैं कि 'पहला श्लोक समाप्त हो गया है'। श्लोक के विभिन्न पदों, जैसे 'गोकुले गोपिकानां', 'व्रजवासनम', 'यत सुखम', और 'किम विदस्यति' पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। वक्ता शब्दों को अलग-अलग करके और फिर मिलाकर उच्चारण करने का निर्देश देते हैं, ताकि प्रत्येक शब्द का स्पष्ट और सही उच्चारण हो सके।