मंगलाचरण एवं कीर्तन — कुसुमन भात बनाई
सत्र का आरम्भ मंगलाचरण पाठ से हुआ। इसके उपरांत एक भक्तिमय कीर्तन प्रस्तुत किया गया। कीर्तन 'कुसुमन भात बनाई' शीर्षक से था, जिसमें नवल किशोर मनोहर की अनुपम मूर्ति और श्रीराधाजी के सुखदाई स्वरूप का वर्णन है। यह कीर्तन ढिंग राधा सुखदाई और नैनी नैनी बूंद सुहाई के भाव को प्रकट करता है, जिसमें दादुर, मोर और पपैया के बोले जाने का भी उल्लेख है।
पुरुषोत्तम दास की वार्ता का प्रारम्भ — दीक्षा और विरोध
वक्ता भाव प्रकाश की दूसरी पंक्ति से श्री आचार्य महाप्रभुजी के सेवक पुरुषोत्तम दास और उनकी स्त्री की वार्ता का प्रारम्भ करते हैं। उन्होंने श्री आचार्य महाप्रभुजी से शरण ली और विनती की, 'महाराज हमको कृपा कृपा करी के शरण लीजिए मेरे घर पधारिए'। महाप्रभुजी ने उन्हें श्री गोसाईं जी के पास नाम लेने को कहा, परन्तु पुरुषोत्तम दास ने शरीर के भरोसे के अभाव में तत्काल आप से ही सेवक करने की विनती की। श्री आचार्य महाप्रभुजी ने पुरुषोत्तम दास और उनकी स्त्री को नाम निवेदन कराया और भगवद्सेवा करने की आज्ञा दी। साथ ही यह भी कहा कि उनकी माता आसुरी जीव होने के कारण कलेश करेंगी। पुरुषोत्तम दास ने माता को बिना बताए तीन दिन तक दूध पीकर माला छिपाई।
वार्ता का सार — कंठी-तिलक का महत्व
पुरुषोत्तम दास और उनकी पत्नी ने माता तथा अन्य संबंधियों के घोर विरोध के बावजूद अपनी कंठी नहीं उतारी, यह उनकी वैष्णव धर्म के प्रति अटूट निष्ठा का प्रमाण था। माता और संबंधियों ने उन्हें माला उतारने को कहा, 'नहीं तो दो मरेंगे', और 'याही छिन माला दो उतारो नहीं तो दो की हत्या ले की'। परन्तु पुरुषोत्तम दास ने दृढ़ता से कहा, 'यह माला हमारे सिर के साथ है, माथो जाए तो चिंता नहीं परंतु माला तो ना छोड़ेंगे।' उन्होंने यह भी कहा कि यदि माता वैष्णव नहीं होंगी, तो वे उनके हाथ का खानपान नहीं करेंगे। इस निष्ठा के कारण उनकी माताओं ने कुएँ में कूदकर देह त्याग दी। क्लेश मिटने के बाद पुरुषोत्तम दास ने लौकिक संस्कार किए और श्री आचार्य महाप्रभुजी से ठाकुरजी की सेवा पधराने की विनती की, जो उन्हें प्राप्त हुई।
स्कन्द पुराण में कंठी का माहात्म्य
वक्ता स्कन्द पुराण में वर्णित श्लोकों का हवाला देते हैं। पहला श्लोक 'तुलसी का संभूता कंठ गना सुस्कता गुरु पता तू या माला न त्याज्या ता कदाचमा' बताता है कि तुलसी के काष्ठ से निर्मित, सुसंस्कृत और गुरु द्वारा प्रदत्त माला का किसी भी परिस्थिति में त्याग नहीं करना चाहिए, यहाँ तक कि मृत्यु का भय होने पर भी नहीं। दूसरा श्लोक 'तुलसी काठ मालाु प्रेत राजस दूतका दृष्ट्वा नति दूर वाते पटला था' कहता है कि यमराज के दूत तुलसी कंठी धारण करने वाले को देखकर वैसे ही दूर भागते हैं, जैसे हवा से पत्तों का समूह उड़ जाता है। परन्तु वक्ता स्पष्ट करते हैं कि यह केवल कंठी धारण करने से नहीं होता, बल्कि ठाकुरजी में आसक्ति, नामस्मरण और भगवत्स्वरूप का अनुसंधान भी इसके साथ जुड़ा हुआ है। तिलक और कंठी वैष्णव के चिन्ह और आभूषण हैं, यह उनकी पहचान है, जैसे स्कूल का आइडेंटी कार्ड। इनका त्याग नहीं करना चाहिए, बल्कि वैष्णव धर्म का पालन निष्ठा से करना चाहिए। असत्संग से बचना चाहिए, भले ही वह परिवार में हो, क्योंकि असत्संग से ठाकुरजी दूर हो जाते हैं। गुरु को परिस्थिति और समय के अनुसार शिष्य की परीक्षा लेनी चाहिए और आज्ञा देनी चाहिए, ताकि भगवत अपराध न हो।