सूत्र २३ (पाद २, अधिकरण ७) : पूर्वपक्ष: ब्रह्म की अव्यक्तता
सत्र का प्रारंभ द्वितीय पाद के छठे अधिकरण के समापन के उल्लेख से होता है, जहाँ श्रीमहाप्रभुजी ने विरुद्धधर्माश्रयता का निरूपण किया था। अब सातवें अधिकरण में ब्रह्म के अंदर गुणों का समन्वय अर्थ बल के आधार पर विचार किया जा रहा है। श्रीपुरुषोत्तमजी के अनुसार, यह अधिकरण 'अव्यक्तम आह ही' सूत्र से शुरू होता है। इसमें ब्रह्म को अव्यक्त बताने वाले वाक्यों को उद्धृत कर पूर्व पक्ष प्रस्तुत किया गया कि ब्रह्म प्रत्यक्ष और श्रुति दोनों से ही अव्यक्त सिद्ध होते हैं, और सगुण-साकार निरूपण औपचारिक है। विरुद्ध वाक्यों की प्रामाणिकता की समस्या पर शंकराचार्यजी की नीति पर भी विचार किया गया।
प्रश्नोत्तर : प्रत्यक्ष प्रमाण एवं शब्द/अर्थ बल
इस खंड में 'अव्यक्त बोधकानी तू स्वार्थ प्रतिपादकानी' की व्याख्या और सूत्र २३ के पूर्व पक्ष स्वरूप पर जिज्ञासा की गई। प्रत्यक्ष प्रमाण की भूमिका और शंकराचार्यजी के मत में व्यावहारिक सत्ता की सिद्धि में उसके महत्व पर विस्तार से चर्चा हुई। यह समझाया गया कि शंकराचार्यजी के अनुसार प्रत्यक्ष स्वयं मिथ्या है, परंतु व्यावहारिक सत्ता को सिद्ध करने के लिए उसे स्वीकार करना पड़ता है। शब्द बल और अर्थ बल के बीच के अंतर को स्पष्ट किया गया, जहाँ शब्द बल शास्त्र के वचनों का शाब्दिक अर्थ है, और अर्थ बल उन वचनों के तात्पर्य या नीति निर्धारण से संबंधित है। न्यायिकों के प्रत्यक्ष विरोधी शब्द के प्रामाण्य अस्वीकृति और पुष्टिमार्ग के मतभेद पर भी चर्चा हुई।
प्रश्नोत्तर : पुष्टिमार्गीय शब्द प्रामाण्य एवं अवस्था भेद
न्यायिकों के लौकिक-अलौकिक शब्द विभाजन पर श्रीवल्लभ मत के दृष्टिकोण की व्याख्या की गई, जहाँ ब्रह्मज्ञान से पूर्व श्रीमहाप्रभुजी भी इस प्रक्रिया को मानते हैं, पर ब्रह्मज्ञान संपन्न होने पर शब्द मात्र प्रमाण होता है क्योंकि दृष्टा के लिए कोई भेद नहीं बचता। श्रीमहाप्रभुजी ने अवस्था भेद से इसका समन्वय किया है, जबकि नैयायिक द्वैतवादी होने के कारण विषय भेद से शब्द भेद का निरूपण करते हैं। लौकिक और अलौकिक प्रत्यक्ष के भेद पर भी चर्चा हुई, और बताया गया कि पुष्टिमार्ग वस्तुतः ऐसा कोई भेद नहीं मानता। इस खंड में विभिन्न दार्शनिक मतों और पुष्टिमार्ग के विशिष्ट सिद्धांतों की तुलनात्मक विवेचना की गई।
सूत्र २४ (पाद २, अधिकरण ७) : समाधान: संराधना द्वारा ब्रह्म का व्यक्तत्व
सत्र के अंतिम खंड में 'अपि संरादने प्रत्यक्ष अनुमानाभ्याम्' सूत्र के माध्यम से समाधान प्रस्तुत किया गया। 'अपि' शब्द द्वारा पूर्व पक्ष की निंदा करते हुए, श्रीमहाप्रभुजी ने बताया कि संराधना (विधिवत् सेवा) से भगवान प्रसन्न होकर स्वेच्छा से भक्तों को दर्शन देते हैं। श्रद्धा, भक्ति और ध्यान योग से ब्रह्म को प्राप्त किया जा सकता है, जैसा कि भगवद्गीता और अन्य श्रुतियों-स्मृतियों में वर्णित है। सूरदासजी, कुंभनदासजी और ध्रुवजी जैसे संराधकों के स्वानुभव इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। ब्रह्म सगुण और निर्गुण दोनों रूपों में व्यक्त हो सकते हैं, और उनके दोनों ही रूप प्रत्यक्ष सिद्ध हैं। इस प्रकार, इस अधिकरण में ब्रह्म के विरुद्धधर्माश्रयत्व का समाधान किया गया कि ब्रह्म में उभयविध रूप सहज ही संभव हैं।