सूत्र ३१ (पाद २, अधिकरण ८) : पूर्वपक्ष: ब्रह्म के निर्विशेषत्व की स्थापना
इस खंड में, वक्ता द्वितीय पाद के आठवें अधिकरण ‘प्रकाशदिवदवैशेष्यं’ का परिचय देते हैं, जो ब्रह्म के निर्गुण-सगुण स्वरूप के विषय में है। पूर्वपक्ष अपने तर्क को स्थिर करने के लिए विभिन्न उदाहरण देता है, जैसे सूर्य का प्रकाश उष्ण होता है और जल शीतल होता है। यदि इन पदार्थों में अस्थायी रूप से विपरीत गुण (जैसे चंद्रमा का शीतल प्रकाश या गर्म जल) दिखाई देते हैं, तो उन्हें स्वाभाविक नहीं माना जाता। इसी प्रकार, स्वर्ण का कोई स्वाभाविक आकार नहीं होता, हम उसे कोई भी रूप दे सकते हैं। इन उदाहरणों के आधार पर, पूर्वपक्ष का तर्क है कि ब्रह्म भी स्वभावतः निर्विशेष (निर्गुण/निर्धमक) है, और उसकी सगुणता या साकारता भक्तों की कामनाओं की पूर्ति मात्र है, न कि उसका मूल स्वरूप।
सूत्र ३१-३२ (पाद २, अधिकरण ८) : पूर्वपक्ष: भक्त प्रत्यक्ष की कृत्रिमता
यह खंड पूर्वपक्ष के तर्कों को जारी रखता है, जिसमें कहा गया है कि प्रत्यक्ष प्रमाण के आधार पर विरोधाभासी श्रुति वाक्यों का समाधान नहीं किया जा सकता। वक्ता पुनः तेज, जल और सुवर्ण के उदाहरणों को समझाते हैं, जहाँ प्रत्येक का एक निश्चित स्वाभाविक स्वरूप होता है (तेज उष्ण, जल शीतल, सुवर्ण आकाररहित)। यदि ब्रह्म के दर्शन विभिन्न रूपों में होते हैं (राम, कृष्ण, नरसिंह आदि), तो यह उसके मूल स्वरूप का द्योतक नहीं है, बल्कि भक्त की कामनाओं और तप आदि से उत्पन्न एक कृत्रिम या क्षणिक अभिव्यक्ति है। ब्रह्मा और इंद्र के उदाहरण दिए जाते हैं जहाँ उन्हें कभी भगवान का ज्ञान हुआ तो कभी नहीं, जो इस बात का प्रमाण है कि भक्त प्रत्यक्ष एकरूप नहीं होता और अभ्यास पर निर्भर करता है। अतः, पूर्वपक्ष का निष्कर्ष है कि भक्त प्रत्यक्ष के आधार पर परमात्मा के वास्तविक स्वरूप का निर्णय नहीं किया जा सकता, और ब्रह्म का मूल स्वरूप निर्विशेष ही है।
प्रश्नोत्तर : माया, व्यावहारिक सत्ता और अलंकार के भाव
इस खंड में प्रतिभागियों के प्रश्नों का उत्तर दिया जाता है। एक प्रश्न माया और व्यावहारिक सत्ता के संबंध में पूछा जाता है। वक्ता बताते हैं कि पूर्वपक्ष के अनुसार भगवान के स्वरूपों का दर्शन व्यावहारिक सत्ता के अंतर्गत आता है, जो पारमार्थिक सत्य की तुलना में आभासी है। वक्ता स्पष्ट करते हैं कि पुष्टिमार्ग में प्रत्येक भक्त के भाव के अनुरूप प्रभु के दर्शन की मान्यता है, जैसा कि भागवत के 'मल्लानामशनिर्नृणाम्' श्लोक में वर्णित है। वैष्णव संप्रदायों के बीच मतभेदों पर चर्चा करते हुए, वक्ता कहते हैं कि समस्या तब आती है जब एक संप्रदाय दूसरे के इष्ट स्वरूपों को मिथ्या घोषित करता है, न कि जब विभूति रूप में स्वीकार करता है। साथ ही, दक्षिण भारत की सेवा पद्धति में ठाकुरजी के चतुर्भुज स्वरूप को बालस्वरूप में अलंकृत करने के भाव और प्रकारों पर भी चर्चा की जाती है, जिसे भाव आवेश का परिणाम बताया गया है।
प्रश्नोत्तर : ब्रह्म के साकार और निराकार स्वरूप पर शंका-समाधान
इस अंतिम खंड में, पूर्वपक्ष के दो भेदों (औपाधिक और शंकराचार्य मत) तथा अनुमान प्रमाण के प्रयोग पर चर्चा की गई। वक्ता स्पष्ट करते हैं कि महाप्रभुजी अनुमान और प्रत्यक्ष में कोई बड़ा अंतर नहीं मानते, क्योंकि अनुमान प्रत्यक्ष आधारित होता है। पूर्वपक्ष के तर्कों की पुनः व्याख्या की जाती है, जिसमें ब्रह्म के निर्विशेष स्वरूप को ही मूल माना गया है। शंकराचार्यजी की कृष्ण-स्तुतियों और उनके निर्गुण ब्रह्म सिद्धांत के बीच कथित विरोधाभास पर भी चर्चा होती है। वक्ता बताते हैं कि शंकराचार्यजी का सगुण उपासना का विधान चित्त की एकाग्रता के लिए एक 'स्टेपिंग स्टोन' है। अंत में, पुष्टिमार्ग के सिद्धांत को स्पष्ट किया गया है कि साकारता ही ब्रह्म का प्राथमिक स्वरूप है, और निराकारता उसकी सहायक है, जहाँ आनंदाकारता ही साकारता है, और निराकारता कभी भी साकारता पर हावी नहीं हो सकती।