अधिकरण ८ : ब्रह्म की निर्गुणता पर पूर्वपक्ष
सत्र का आरम्भ ब्रह्मसूत्राणुभाष्य के द्वितीय पाद अंतर्गत आठवें अधिकरण के साथ होता है, जहाँ ब्रह्म की निर्गुणता और सगुणता पर विचार किया जा रहा है। पूर्वपक्षी अपने मत को प्रस्तुत करता है कि ब्रह्म का स्वरूप निर्गुण ही है, और भक्त कामनाओं की पूर्ति के लिए धारण किए गए रूपों को ब्रह्म का स्वाभाविक स्वरूप नहीं मानना चाहिए। इस अधिकरण में पूर्वपक्षी दो सूत्रों के माध्यम से अपनी बात सिद्ध करता है कि भक्त के अभ्यास के कारण भगवान अनंत रूप से आविर्भूत होते हैं, और निमित्त भेद के कारण स्वरूप में परिवर्तन आता है। ये रूप ब्रह्म का शरीर मात्र हैं, मूल स्वरूप नहीं।
प्रश्नोत्तर : शंकर मत में माया और ब्रह्म के शरीर का स्वरूप
एक सहभागी प्रश्न करता है कि पूर्वपक्षी किस मत का है, विशेषतः शंकर मत में भगवत् शरीर को भक्त भाव अनुसार मानने की बात। वक्ता स्पष्ट करते हैं कि शंकर मत में भी भगवान शरीर धारण करते हैं, परन्तु वह शरीर माया द्वारा ग्रहित होता है, जिसे उपासना कल्पित रूप माना जाता है। वक्ता बताते हैं कि शंकर मत के अनुसार ब्रह्म स्वयं माया को जगत रचना के लिए आमंत्रित करते हैं। इस पर आपत्ति आती है कि यदि ब्रह्म माया को बुलाते हैं, तो उनमें सगुणत्व का दोष आता है क्योंकि शक्तिमान होना एक गुणधर्म है। अद्वैत सिद्धि के लिए शंकर मत में माया को अनादि तो माना जाता है, परन्तु अनंत नहीं, ताकि अंततः केवल ब्रह्म ही सत्य रह जाए।
प्रश्नोत्तर : भाव-अभाव प्रतियोगी न्याय और ब्रह्म पर इसके प्रभाव
सहभागी पूछता है कि न्याय मत में भाव-अभाव प्रतियोगी सिद्धांत ब्रह्म पर कैसे लागू होता है। वक्ता बताते हैं कि न्याय के अनुसार हर 'होने' वाली वस्तु अपने 'न होने' की संभावना को समाहित करती है, और द्रव्य में गुण विभाज्य होते हैं। यदि यह सिद्धांत ब्रह्म पर लागू किया जाए, तो ब्रह्म भी विभाज्य सिद्ध होता है। महाप्रभुजी प्राकृत और अप्राकृत को मिश्रित न करने पर जोर देते हैं। प्राकृत नियमों को अप्राकृत ब्रह्म और उनके गुणों पर लागू नहीं करना चाहिए, जिससे ब्रह्म के सगुणत्व पर कोई आपत्ति न आए। शंकराचार्यजी ब्रह्म को निर्गुण सिद्ध करने के लिए इस तर्क पर बहुत बल देते हैं।
प्रश्नोत्तर : रामानुज, मध्वाचार्य मत में अर्चावतार
सहभागी रामानुजाचार्य और मध्वाचार्य के मतों में सेव्य विग्रह (अर्चावतार) के स्वरूप पर प्रश्न करते हैं। वक्ता स्पष्ट करते हैं कि इन मतों में भी अर्चावतार को मूल रूप नहीं माना जाता, बल्कि उपासनार्थ माना जाता है, क्योंकि वे प्राकृत द्रव्य से बने होते हैं। मध्वाचार्यजी के मत में शक्ति और शक्तिमान में भेद होता है, इसलिए शक्तियों का उपयोग करके प्रकट हुए स्वरूप भिन्न होते हैं।
प्रश्नोत्तर : प्रस्थान विषयक चर्चा एवं समापन
वक्ता 'प्रस्थानत्रय' के सिद्धांत पर भी चर्चा करते हैं, जो शंकराचार्यजी के मत से प्रचलित हुआ है। महाप्रभुजी या अन्य वैष्णव आचार्य किसी विशेष 'प्रस्थान' प्रणाली को स्वीकार नहीं करते, बल्कि सभी शास्त्र ग्रंथों को प्रमाण मानते हैं, और भागवत को वैष्णवों ने समान कैलिबर का शास्त्र माना है। सत्र का समापन पूर्वपक्ष के दो सूत्रों (२५ और २६) के विश्लेषण के साथ होता है। वक्ता अगले सत्र में सूत्र २७ 'उभयपदेशात्त्वहि कुण्डलवत्' से महाप्रभुजी के सिद्धांत पक्ष को प्रस्तुत करने की जानकारी देते हैं।