सूत्र २६ — पूर्वपक्ष : भक्त-कामना-निमित्त विग्रह ब्रह्म का मूल स्वरूप नहीं
वक्ता ने बताया कि द्वितीय पाद का मुख्य विषय ब्रह्म की निर्गुणता और सगुणता का विचार है।
सप्तम अधिकरण में श्रीमहाप्रभुजी ने अपने सिद्धान्त के समर्थन में युक्तियाँ और शास्त्रवचन प्रस्तुत किए, जिनके उत्तर में अष्टम अधिकरण में पूर्वपक्षी अपनी शंका उपस्थित करता है।
पूर्वपक्षी का तर्क है कि भगवान किसी निमित्त के बिना हर क्षण नया रूप प्रकट नहीं करते, अपितु भक्त की इच्छा ही वह निमित्त है जिससे अनंत रूपों का आविर्भाव होता है।
इसलिए भगवान का प्रकट विग्रह उनका शरीर मात्र है, ब्रह्म का मूल स्वरूप नहीं — यह पूर्वपक्षी की प्रथम शंका है।
द्वितीय शंका यह है कि श्रुति और भक्त-प्रत्यक्ष से भी ब्रह्म की साकारता का निर्णय नहीं हो सकता, क्योंकि सर्वसाधारण के गोचर ऐसा कोई एक निश्चित स्वरूप नहीं है।
प्रश्नोत्तर — शंकराचार्यजी के मत में माया और ब्रह्म का सम्बन्ध
एक प्रतिभागी ने पूछा कि यह पूर्वपक्ष किस मत का है — क्या शंकराचार्यजी का ही मत यहाँ प्रस्तुत हो रहा है? वक्ता ने पुष्टि की कि हाँ, यह शंकराचार्यजी का ही मत है।
शंकराचार्यजी के मत में ब्रह्म माया को आमन्त्रित करता है ताकि वह भक्त की उपासना के निमित्त शरीर धारण कर सके, और माया ही ब्रह्म को शरीर प्रदान करती है।
वक्ता ने श्रीमहाप्रभुजी का पक्ष प्रस्तुत करते हुए कहा कि यदि माया ब्रह्म के आधीन है तो वह ब्रह्म की शक्ति है — परन्तु शक्तिमत्त्व स्वीकार करने पर ब्रह्म के अन्दर सगुणत्व की आपत्ति आती है, जो अद्वैत मत को असुविधाजनक है।
इसीलिए शंकराचार्यजी माया को अनादि परन्तु अनन्त नहीं मानते — माया का अन्ततः नाश होने से वह असत्य है, और असत्य होने से एकमेव ब्रह्म की पारमार्थिक सत्ता की अद्वैत-सिद्धि होती है।
प्राकृत नियमावली (भाव-अभाव प्रतियोगिता तथा द्रव्य में गुण का विभाग्यत्व) को अप्राकृत ब्रह्म के ऊपर लागू न करने की जो सीमारेखा श्रीमहाप्रभुजी खींचते हैं, उस पर विस्तृत विचार-विमर्श हुआ।
प्रश्नोत्तर — अर्चावतार, प्रस्थान-पद्धति और सर्वशास्त्र-प्रामाण्य
प्रतिभागियों ने रामानुजाचार्यजी और मधवाचार्यजी के मत में अर्चावतार की स्थिति के विषय में प्रश्न किया। वक्ता ने बताया कि दोनों ही मतों में अर्चावतार मूल रूप नहीं होता — वहाँ यह आवेश अवतार की प्रक्रिया के समान उपासनार्थ स्वीकृत होता है।
मधवाचार्यजी के वहाँ शक्ति और शक्तिमान में भेद होता है, अभेद नहीं, इसलिए जब भगवान अपनी शक्तियों का उपयोग करके विग्रह में प्रकट होते हैं तो वह शक्ति शक्तिमान से भिन्न होने के कारण तद्रूप से उत्पन्न होती है।
श्रीमहाप्रभुजी का स्पष्ट सिद्धान्त यह है कि भगवान का सेव्य विग्रह मूल रूप ही है, क्योंकि ब्रह्म अनन्त रूपों को धारण कर सकता है।
प्रस्थान-चतुष्टय की जो सर्वमान्य अवधारणा है वह शंकराचार्यजी के प्रस्थानत्रय-सिद्धान्त का विस्तार है; श्रीमहाप्रभुजी सहित किसी भी वैष्णव आचार्य ने किसी 'प्रस्थान' की व्यवस्था नहीं मानी — वेद, गीता, भागवत और ब्रह्मसूत्र का निर्देश केवल जिज्ञासु की बौद्धिक स्थिति को ध्यान में रखकर किया गया है।
निखिल वेद, रामायण, महाभारत और पंचरात्र — सभी शास्त्र समुच्चय श्रीमहाप्रभुजी को समान रूप से मान्य हैं, और उन सबका एकार्थ यही ब्रह्मवाद है।