सूत्र १ (पाद २, अधिकरण १०) : ब्रह्म की सेतु रूपता पर संशय का पूर्व पक्ष
सत्र का प्रारंभ तृतीय अध्याय के द्वितीय पाद के नवें अधिकरण की समाप्ति के स्मरण से हुआ। वक्ता ने दसवें अधिकरण की प्रस्तावना की, जिसमें 'परमतः सेतुन मान' नामक प्रथम सूत्र का विवेचन आरंभ किया गया। इस सूत्र के आधार पर पूर्व पक्ष प्रस्तुत किया गया कि श्रुति में ब्रह्म को 'सेतु' रूप कहा गया है। 'सेतु' का अर्थ है साधन, अतः यदि ब्रह्म साधन रूप है, तो उसकी परत्वता (उत्तमता व फल रूपता) सिद्ध नहीं होती, क्योंकि सेतु का उपयोग गंतव्य तक पहुँचने के लिए किया जाता है, स्वयं सेतु फल नहीं होता। यह तर्क ब्रह्म के स्वरूप में परिछिन्नता का आक्षेप उत्पन्न करता है और उसके अन्य धर्मों के साथ विरोध दर्शाता है। इसी पृष्ठभूमि में, यह संशय उभरता है कि गेय ब्रह्म से कोई उत्कृष्ट फल स्वरूप है या नहीं, जैसा कि अक्षर ब्रह्म और परब्रह्म में भेद की कल्पना की जाती है।
प्रश्नोत्तर : अक्षर ब्रह्म व परब्रह्म में भेद पर पूर्व पक्ष
प्रश्नकाल में, नीलेश भाई के प्रश्न के उत्तर में वक्ता ने पूर्व पक्षी की मुख्य आपत्ति को विस्तार से समझाया। पूर्व पक्षी तर्क देता है कि यदि ब्रह्म को 'सेतु' रूप में एक साधन माना जाता है, तो फल रूप ब्रह्म स्वाभाविक रूप से उससे भिन्न और उत्कृष्ट हो जाता है। इस स्थिति में, शंकराचार्य जी के सगुण ब्रह्म और निर्गुण ब्रह्म के भेद तथा पुष्टिमार्ग में अक्षर ब्रह्म और परब्रह्म के भेद में कोई मूलभूत अंतर नहीं रह जाता। वक्ता ने स्पष्ट किया कि अक्षर ब्रह्म को 'गणितानंद' कहने पर परब्रह्म के गुणधर्मों में वृद्धि या रास की आपत्ति आती है, जो अप्राकृत धर्मों में संभव नहीं माना जाता। यह शंकराचार्य के मत के समान ही ब्रह्म को विभाजित करने जैसा प्रतीत होता है, जिससे पूर्व स्थापित सिद्धांतों पर संशय आता है।
प्रश्नोत्तर : कार्य भेद और स्वरूप भेद का स्पष्टीकरण
भावना बहन ने 'गेय ब्रह्म से फल रूप उत्कृष्ट है या नहीं' संशय पर पुनः प्रश्न किया। वक्ता ने विस्तार से समझाया कि श्रुति ब्रह्म के 1/4th अंश का निरूपण करती है, जो हमारी समझ का साधन मात्र है, जबकि 3/4th अंश अज्ञेय और फल स्वरूप है। उन्होंने भूताकाश और हृदयस्थ आकाश के दृष्टांत से ब्रह्म की व्यापकता को समझने की हमारी सीमित बुद्धि का वर्णन किया। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि पुष्टिमार्ग में अक्षर ब्रह्म और नारायण में स्वरूप भेद नहीं, अपितु केवल कार्य भेद है। 'तिरोहित इव' पद का प्रयोग वास्तविक तिरोधान न होकर केवल तिरोधान जैसा प्रतीत होना दर्शाता है, जिससे स्वरूप की अविभाज्यता बनी रहती है। यह स्पष्टीकरण ब्रह्म के विभिन्न रूपों में होने पर भी उसके मूल स्वरूप की एकरूपता को दर्शाता है।
अधिकरण का प्रयोजन : शब्द बल और अर्थ बल का विचार
वक्ता ने इस नए अधिकरण के प्रयोजन पर प्रकाश डाला, यह समझाते हुए कि पूर्व में ब्रह्म के समन्वय और अविरोध का निर्णय हो चुका है, फिर भी इस विचार की आवश्यकता क्यों है। उन्होंने बताया कि अब तक के अधिकरणों में मुख्य रूप से शब्द बल पर विचार किया गया था, यानी वेद वाक्यों के शाब्दिक अर्थ के आधार पर ब्रह्म का निरूपण। परंतु, यह अधिकरण अर्थ बल पर विचार करेगा, जिसका अर्थ है कि वेद वाक्य किस प्रकार ब्रह्म रूपी प्रमेय का निरूपण कर रहे हैं और ब्रह्म तत्व की प्रतिपत्ति में तत्पर हैं। 'पुष्प' शब्द के उदाहरण से शब्द बल (जो खिलता है) और अर्थ बल (किसी व्यक्ति का नाम) के अंतर को समझाया गया। इस अधिकरण का लक्ष्य धर्मान्तर संबंधी संशय का निवारण करना है, जिसमें ब्रह्म को फल, साधन, प्रमेय और प्रमाण के रूप में उसकी अविभाज्य रूपता पर विचार किया जाएगा।
पूर्व पक्ष के हेतुओं की बाधकता : ब्रह्म की परिछिन्नता पर तर्क
वक्ता ने पूर्व पक्षी के मत से प्रस्तुत विभिन्न हेतुओं की बाधकता का निरूपण किया। सर्वप्रथम, फल हेतु पर विचार करते हुए समझाया गया कि ब्रह्म को 'सेतु' कहने का अर्थ उसका साधन रूप होना है, जो एक अवांतर फल हो सकता है, परम फल नहीं। 'उन्मा' के व्यपदेश से स्वरूप निरूपण को भी ब्रह्म की परिछिन्नता का द्योतक बताया गया; जैसे दहर प्रसंग में भूताकाश और हृदयस्थ आकाश का उदाहरण हमारी सीमित समझ के लिए ही प्रयुक्त होता है। इसी प्रकार, पुरुष सूक्त में चतुष्पाद ब्रह्म का वर्णन भी मनुष्य शरीर के दृष्टांत से ब्रह्म के सीमित और परिछिन्न स्वरूप को समझने का साधन मात्र है। संबंध व्यपदेश (आधार-आधेय भाव) और भेद व्यपदेश (जैसे सूर्य और नेत्र में पुरुष का धर्मात देश) से भी ब्रह्म की परिछिन्नता सिद्ध होती है, जिससे पूर्व पक्षी यह निष्कर्ष निकालता है कि एक ब्रह्म परिछिन्न होता है और दूसरा अपरिछिन्न होता है, और वे दोनों भिन्न-भिन्न तत्व हैं।