मंगलाचरण
यह खंड मंगलाचरण के लिए आरक्षित है, जिसके दौरान सत्संग का प्रारंभिक आह्वान और प्रार्थना की जाती है। इस खंड की विषय-वस्तु की चर्चा यहाँ नहीं की गई है।
तृतीय अध्याय के द्वितीय पाद का नौवा अधिकरण
वक्ता ने बताया कि पिछले सत्र में तृतीय अध्याय के द्वितीय पाद का नौवा अधिकरण संपन्न हो चुका है। इस अधिकरण में श्रीपुरुषोत्तमजी ने ब्रह्म की सगुणता और निर्गुणता दोनों पक्षों को श्रीमहाप्रभुजी के भाष्य के द्वारा स्थापित किया। पाँचवें से नौवें अधिकरणों के माध्यम से श्रुति की बोधकता और ब्रह्म के स्वरूप निरूपण की स्पष्टता को समझा गया है। इन पाँच अधिकरणों का विषय समान होने के कारण इनकी संगति ब्रह्म के स्वरूप बोध से संबंधित है।
दशम अधिकरण का प्रारंभ — सेतु रूप ब्रह्म पर संशय
दसवें अधिकरण, जिसमें सात सूत्र हैं, का प्रारंभ होता है। इस अधिकरण में 'परमतः सेतुन मान' सूत्र के आधार पर यह प्रश्न उठाया जाता है कि श्रुति में ब्रह्म को सेतु रूप क्यों कहा गया है। यदि ब्रह्म सेतु रूप है, अर्थात् साधन रूप है, तो ब्रह्म की परत्वता, फल-रूपता या श्रेष्ठता सिद्ध नहीं होती, क्योंकि सेतु तो साधन मात्र होता है। पूर्वपक्षी यह आशंका व्यक्त करता है कि देश, काल, वस्तु और स्वरूप से रहित ब्रह्म को साधन रूप कहना उचित नहीं है, और श्रुति का मूल तात्पर्य ब्रह्म की परता किसी और प्रकार से बताना हो सकता है। यह सूत्र ब्रह्म की सेतु रूपता के संबंध में संशय उत्पन्न करता है।
सूत्र १० (३/२/१०) का पूर्वपक्ष
सूत्र 'परमतः सेतुन मान संबंध भेद व्यपदेशभ्यह' पर विचार करते हुए, वक्ता ने स्पष्ट किया कि धर्मी और धर्म के विरोध का परिहार पूर्व के पाँच अधिकरणों में किया जा चुका है। अब धर्मान्तर विरोध के परिहार के लिए इस अधिकरण का प्रारंभ किया गया है। संशय यह है कि क्या गेय ब्रह्म से भी कोई अन्य उत्कृष्ट फल-स्वरूप है। पूर्वपक्षी 'अक्षरात परत पर पुरुष परम किंचित सा काष्ठा सा परागति' जैसे वैदिक वचनों का हवाला देते हुए कहता है कि ब्रह्म को सेतु रूप कहने से उसकी निचली कक्षा सिद्ध होती है, जबकि परम तत्व रूप ब्रह्म ऊपर की कक्षा का है, जैसे अक्षर ब्रह्म और परब्रह्म में भेद किया जाता है। यह संशय उपस्थित करता है कि यदि ब्रह्म को सेतु रूप कहा जाएगा तो ब्रह्म की साधन रूपता हो जाती है, फल रूपता नहीं रहती।
प्रश्नोत्तर — ब्रह्म की साधन रूपता और सगुण-निर्गुण भेद
प्रश्नोत्तर के दौरान, वक्ता ने समझाया कि पूर्वपक्षी का तर्क है कि ब्रह्म को सेतु रूप कहने से उसकी साधन रूपता सिद्ध होती है, जिसका अर्थ है कि साधन रूप ब्रह्म और फल रूप ब्रह्म अलग-अलग हैं। यदि इस बात को स्वीकार किया जाता है, तो शंकराचार्यजी द्वारा ब्रह्म को सगुण और निर्गुण कहने का विरोध हमारी अपनी अक्षर ब्रह्म और परब्रह्म की कोटि भेद की अवधारणा के समान हो जाता है। पूर्वपक्षी यह कहना चाहता है कि यदि पुष्टिमार्ग भी अक्षर ब्रह्म को परब्रह्म से भिन्न मानता है, तो सगुण ब्रह्म और निर्गुण ब्रह्म के मध्य भेद करने में क्या आपत्ति है। वक्ता ने स्पष्ट किया कि श्रीमहाप्रभुजी का सिद्धांत इस विरोध को अस्वीकार करता है, लेकिन पूर्वपक्षी का तर्क है कि यदि ब्रह्म के गुण ब्रह्मात्मक हैं, तो उनमें वृद्धि या ह्रास कैसे हो सकता है, क्योंकि यह प्राकृत धर्मों का लक्षण है।
प्रश्नोत्तर — अक्षर ब्रह्म में गणितानंद और कार्य भेद
एक प्रतिभागी ने 'गणितानंदकम्' शब्द के संबंध में संशय व्यक्त किया। वक्ता ने स्पष्ट किया कि कुछ व्याख्याओं में 'गणितानंदकम्' में 'कम्' प्रत्यय निषेधार्थक होता है, जिसका अर्थ है कि अक्षर ब्रह्म 'गणितानंद' नहीं है। उन्होंने श्याम काकाजी के मत का भी उल्लेख किया। यह भी स्पष्ट किया गया कि अक्षर ब्रह्म और नारायण में स्वरूप भेद नहीं, बल्कि कार्य भेद है। वक्ता ने उदाहरण दिया कि जैसे कोई व्यक्ति घर में है और ऑफिस जाती है, तो स्वरूप वही रहता है, केवल कार्य में भेद होता है। प्रकृति के बाद सृष्टि में भेद प्रकट होता है, जबकि कारण कोटि में अभेद रहता है। यह चर्चा ब्रह्म के विभिन्न स्वरूपों के बीच भेदाभेद के सिद्धांत को समझने में सहायता करती है।
नए अधिकरण का प्रयोजन — अर्थ बल का विचार
वक्ता ने बताया कि समन्वय, ऐक्य और अविरोध का निर्णय पहले हो चुका है, तो इस नए अधिकरण का क्या प्रयोजन है। उन्होंने कहा कि पहले शब्द बल पर विचार किया गया था, अब अर्थ बल पर विचार किया जाएगा। शब्द बल और अर्थ बल में सूक्ष्म अंतर समझाते हुए, उन्होंने उदाहरण दिया कि 'पुष्प' शब्द का अर्थ सामान्य फूल हो सकता है (शब्द बल), या किसी व्यक्ति का नाम भी (अर्थ बल) हो सकता है। यह अधिकरण ब्रह्म को प्रमाण, प्रमेय, साधन और फल के रूप में समझने पर ध्यान केंद्रित करेगा, यह स्थापित करते हुए कि ब्रह्म की साधन रूपता उसकी फल रूपता को न्यून नहीं करती। महाप्रभुजी का सिद्धांत कि ब्रह्म ही प्रमाण, प्रमेय, साधन और फल है, इस बात पर जोर देता है कि ब्रह्म के विभिन्न स्वरूपों में कोई कोटिभेद नहीं होता।
पूर्वपक्ष के हेतुओं की बाधकता — फल स्वरूप निरूपण
वक्ता ने पूर्वपक्षी के मत से हेतुओं की बाधकता बतलाई। पूर्वपक्षी सर्वप्रथम फल हेतु पर विचार करते हुए कहता है कि जब श्रुति ब्रह्म को सेतु रूप कहती है, तो यह ब्रह्म के स्वरूप का निरूपण है। 'दहर उत्तरेभ्य' सूत्र में ब्रह्म की सिद्धि की गई है। श्रुति के संदर्भ में, 'यह आत्मा अनुविध्य व्रजति' से 'सर्वेशु लोकेशु कामचारो भवती' तक, काम का उपादन करके ज्ञान प्रशंसा के लिए अज्ञात व्यवधान बतलाकर, ज्ञान के बाद संसार संबंध का अभाव होता है, और इसी निमित्त सेतु का वर्णन किया गया है। पाप सागर से पार होने के लिए सेतु का आश्रय कहा गया है। संसार और फल के मध्य में सेतु की स्थिति बताई गई है। इससे यह ज्ञात होता है कि फल रूप वस्तु कुछ अन्य है, और सेतु केवल अवांतर फल है। 'एतम आनंदमयम आत्मानम' का उदाहरण भी प्रस्तुत किया गया, जहाँ आत्मा में आनंद के व्यपदेश का निरूपण है।
पूर्वपक्ष — उन्मा, संबंध और भेद व्यपदेश से स्वरूप निरूपण
पूर्वपक्षी उन्मा (अनुमान, ध्यान, ज्ञान) के व्यपदेश से भी ब्रह्म के स्वरूप निरूपण की बात करता है। दहर प्रसंग में 'जितना यह भूताकाश है, उतना ही यह हृदयस्थ आकाश है' जैसे वचन ब्रह्म की परिच्छिन्नता के द्योतक हैं। दृष्टांत और दाष्टांत भाव ज्ञान का साधन है, जैसे जगत में व्याप्त आकाश का ज्ञान साधन है। पुरुष सूक्त में चतुष्पाद ब्रह्म का निरूपण भी मानवीय समझ के अनुरूप दृष्टांत के रूप में ही है, जो ब्रह्म के सीमित स्वरूप का वर्णन करता है। पूर्वपक्षी कहता है कि ये सभी स्वरूप निरूपक वचन ब्रह्म की परिच्छिन्नता को दर्शाते हैं। संबंध व्यपदेश से भी निरूपण होता है, जहाँ 'उभावस्मिन' जैसे वाक्य आधार-आधेय संबंध से प्रमेय की परिच्छिन्नता और 'प्राज्ञेन आत्मना सम संपरिषक्त' से वस्तु परिच्छेद का निरूपण करते हैं। अंततः, भेद व्यपदेश से भी ब्रह्म का निरूपण होता है, जैसे सूर्य और नेत्र में दिखने वाले पुरुष का परस्पर धर्मात देश दिखलाया गया है, जिससे उनकी भिन्नता सिद्ध होती है। इन सभी तर्कों से पूर्वपक्षी यह निष्कर्ष निकालता है कि श्रुति एक परिच्छिन्न ब्रह्म और एक अपरिच्छिन्न ब्रह्म का वर्णन करती है, जो अलग-अलग हैं।