॥ ब्रह्मसूत्राणुभाष्य-३ ॥

श्रीवल्लभाचार्य विद्यापीठ, हालोल — नित्य पुष्टिस्वाध्याय
📅 09 July 2026
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परिचय एवं सन्दर्भ

यह सत्र ब्रह्मसूत्राणुभाष्य के तृतीय पाद में विवेचित अधिकरण के पूर्व पक्ष पर आधारित है। वक्ता ने शंकराचार्य जी के मत को पूर्व पक्ष के रूप में प्रस्तुत किया, जिसमें ब्रह्म के गुणधर्मों में तारतम्य और सगुण-निर्गुण स्वरूपों में भेद की बात कही गई है। इस पूर्व पक्ष में ब्रह्म की साधन रूपता, प्रमेय रूपता, प्रमाण रूपता तथा फल रूपता के भेदों पर विस्तृत विचार प्रस्तुत किया गया है।

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१
ब्रह्म के गुणधर्मों में तारतम्य का पूर्व पक्ष
००:०० – ०४:०० — ब्रह्म के गुणधर्मों में तारतम्य का पूर्व पक्ष
ब्रह्म के गुणधर्मों में तारतम्य का पूर्व पक्ष
सत्र का प्रारंभ ब्रह्मसूत्राणुभाष्य के तृतीय पाद में चल रहे अधिकरण के पूर्व पक्ष के विचार से होता है। इसमें शंकराचार्य जी की मुख्य युक्ति प्रस्तुत की गई कि यदि ब्रह्म के गुणधर्मों में तारतम्य (उच्च-नीच भाव) स्वीकार किया जाए, जैसे आनंद गुण धर्म का होना या न होना, या अधिक-कम होना, तो ब्रह्म के सगुण और निर्गुण स्वरूपों को भिन्न मानना स्वाभाविक है। ब्रह्म को सेतु या साधन रूप कहने पर भी उसके मूल स्वरूप और साधन रूप स्वरूप में अंतर का विचारणीय प्रश्न उठता है। विभिन्न श्रुति वचनों के आधार पर ब्रह्म के स्वरूप में संशय उत्पन्न होता है, क्योंकि उसे प्रमाण, प्रमेय, साधन और फल रूप से अलग-अलग निरूपित किया गया है।
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शंकराचार्य जी के चार पूर्व पक्षीय तर्क
०४:०० – १२:५० — शंकराचार्य जी के चार पूर्व पक्षीय तर्क
शंकराचार्य जी के चार पूर्व पक्षीय तर्क
शंकराचार्य जी ने ब्रह्म के स्वरूप के संबंध में चार मुख्य तर्क प्रस्तुत किए हैं। पहला, शास्त्र में साधन और फल को भिन्न-भिन्न कहा गया है, अतः ब्रह्म के साधन रूप और फल रूप निरूपणों को अलग-अलग समझना चाहिए। दूसरा, ब्रह्म प्रमेय रूप नहीं हो सकता क्योंकि वह ज्ञेय नहीं है; भूताकाश और पुरुष सूक्त के उदाहरण यह सिद्ध करते हैं कि ब्रह्म का मूल स्वरूप गेय नहीं है, बल्कि औपाधिक स्वरूप ही ज्ञेय होता है। तीसरा, ब्रह्म के प्रमाण और प्रमेय रूपों में भी भेद है, क्योंकि हमारी ज्ञान, इच्छा और प्रयत्न की परिधि में आने वाला ब्रह्म का स्वरूप उसके मूल स्वरूप से भिन्न है। चौथा, फल की दृष्टि से भी शास्त्र ने ब्रह्म का अतिदेश किया है, जिससे यह सिद्ध होता है कि अनुभवगम्य फल भी मूल तत्व से व्यतिरिक्त होता है।
३
आचार्यों द्वारा ब्रह्म के तारतम्य का स्वीकार
१२:५० – २१:३८ — आचार्यों द्वारा ब्रह्म के तारतम्य का स्वीकार
आचार्यों द्वारा ब्रह्म के तारतम्य का स्वीकार
पूर्व पक्षी यह तर्क प्रस्तुत करता है कि शास्त्र में ब्रह्म के स्वरूप का निरूपण तारतम्य से होता है, न कि एकरूपता से। शंकराचार्य जी जहाँ ब्रह्म के निषेध वृत्ति से निरूपण को मूल और गुणों के विधान को सगुण ब्रह्म का निरूपण मानते हैं, वहीं श्रीमहाप्रभुजी भी ज्ञान मार्गियों के लय को अक्षर ब्रह्म का निरूपण और भक्ति तथा कृपा से प्राप्त स्वरूप को परब्रह्म का निरूपण आज्ञा करते हैं। रामानुजाचार्य जी और मधवाचार्य जी के मतों में भी ब्रह्म के स्वरूप में तारतम्य दृष्टिगोचर होता है। रामानुजाचार्य जी नारायण को परब्रह्म और अर्चावतार को उनसे भिन्न मानते हैं। इस प्रकार, सभी आचार्य ब्रह्म के स्वरूप में किसी न किसी प्रकार के तारतम्य का स्वीकार करते हैं, अतः शंकराचार्य जी के मत को केवल मिथ्या कहने के आधार पर झूठा नहीं कहा जा सकता।
४
प्रमेय, उन्मान और साधन रूप ब्रह्म के परिच्छिन्नत्व पर प्रश्नोत्तर
२१:३८ – ३८:१७ — प्रमेय, उन्मान और साधन रूप ब्रह्म के परिच्छिन्नत्व पर प्रश्नोत्तर
प्रमेय, उन्मान और साधन रूप ब्रह्म के परिच्छिन्नत्व पर प्रश्नोत्तर
एक प्रतिभागी ने प्रमेय रूप ब्रह्म और उन्मान (अनुमान) से ब्रह्म के स्वरूप निरूपण पर स्पष्टीकरण मांगा। वक्ता ने समझाया कि प्रमेय निरूपण में आधार और आधेय का भेद बताया गया है, जैसे अक्षर ब्रह्म वैकुंठ रूप धाम है और परब्रह्म धामी हैं। उन्मान के संदर्भ में, जैसे भूताकाश की उपमा ब्रह्म की व्यापकता समझाने के लिए दी जाती है, वह ब्रह्म का परिच्छिन्न स्वरूप ही दर्शाती है। पुरुष सूक्त में ब्रह्म को 'हजारों सिर, आँखें और नेत्रों वाला' कहने का अर्थ भी लौकिक उदाहरण द्वारा उसके अगम स्वरूप का अनुमान कराना मात्र है, क्योंकि ब्रह्म के अंग नहीं होते। अर्चावतार का उदाहरण देकर समझाया गया कि वह मूल नारायण नहीं होते, जिससे स्वरूप में तारतम्य सिद्ध होता है। शास्त्र इस तरह से हमें ब्रह्म के परिच्छिन्न रूप का ज्ञान कराता है।
५
ब्रह्मज्ञान की सीमितता एवं पुष्टिभक्ति मार्ग का तृतीय भेद
३८:१७ – ५९:५६ — ब्रह्मज्ञान की सीमितता एवं पुष्टिभक्ति मार्ग का तृतीय भेद
ब्रह्मज्ञान की सीमितता एवं पुष्टिभक्ति मार्ग का तृतीय भेद
वक्ता ने स्पष्ट किया कि प्रमाण, प्रमेय, साधन और फल बुद्धि - ये सभी एक प्रकार के परिच्छेद हैं, क्योंकि शास्त्र स्वयं ब्रह्म की सेतु रूपता को फल नहीं मानता। जिस प्रकार आकाश की व्यापकता का हम अनुभव नहीं कर सकते, उसी प्रकार ब्रह्म की व्यापकता का साधन काल में केवल अंदाजा ही लगाया जा सकता है। श्रवण, मनन, निदिध्यासन में ब्रह्म परिच्छिन्न ही ज्ञात होता है। शंकराचार्य जी के अनुसार, हम स्वयं ब्रह्म हैं और माया के आवरण से हमें यह ज्ञात नहीं होता। रामानुजाचार्य जी और मधवाचार्य जी मानते हैं कि अभी का ज्ञान आंशिक है, मूल अनुभूति वैकुंठ लोक में होगी। श्रीमहाप्रभुजी 'एवं भेद पुरस्कृत त्रिविधो भक्ति मार्ग:' कहकर तीन भक्ति मार्गों का निरूपण करते हैं – तामस, राजस और सात्विक, जो भेद की मात्रा पर आधारित हैं। असमाकम तो निर्गुण कहकर वे अपना चौथा स्टैंड प्रस्तुत करते हैं।
६
प्रमाण, प्रमेय, साधन और फल रूप ब्रह्म का पुष्टिमार्गीय दृष्टिकोण
५९:५६ – १:०९:०० — प्रमाण, प्रमेय, साधन और फल रूप ब्रह्म का पुष्टिमार्गीय दृष्टिकोण
प्रमाण, प्रमेय, साधन और फल रूप ब्रह्म का पुष्टिमार्गीय दृष्टिकोण
पुष्टिमार्गीय दृष्टिकोण से, ब्रह्म की प्रमाण रूपता नाम सृष्टि के रूप में है, जहाँ वेदादि शास्त्र स्वयं भगवान का ही रूप हैं। प्रमेय रूप में भगवान स्वयं अपने स्वरूप और गुणों को हमारे सामने प्रकट करते हैं, जिसमें कोई न्यूनता नहीं होती। साधन रूप में ब्रह्म साधनगम्य नहीं हैं, बल्कि उनकी साधन रूपता निसाधनता का बोध कराने के लिए है। फल रूपता ब्रह्म की निश्चित रूप से होती है। वक्ता ने इस बात पर जोर दिया कि पुष्टिमार्ग भेद सहिष्णु अभेद का सिद्धांत स्वीकार करता है, जहाँ अभेद के ब्रैकेट में ही भेद प्रकट होता है। यह तर्क ब्रह्म के प्रमाण, प्रमेय, साधन और फल स्वरूपों की लीलात्मकता को स्पष्ट करता है। सत्र का समापन इस घोषणा के साथ हुआ कि अगला सूत्र विस्तृत होने के कारण सोमवार को लिया जाएगा।
📖 सार
📌 सार
• ब्रह्मसूत्राणुभाष्य के तृतीय पाद के अधिकरण का पूर्व पक्ष प्रस्तुत किया गया, जिसमें ब्रह्म के सगुण-निर्गुण स्वरूपों में तारतम्य पर विचार किया गया।
• शंकराचार्य जी के चार प्रमुख तर्कों का सारांश दिया गया, जिसमें ब्रह्म को साधन, फल, प्रमेय और प्रमाण रूपों में भिन्न मानने की बात कही गई।
• ब्रह्म का मूल स्वरूप गेय नहीं है, अपितु औपाधिक स्वरूप ही ज्ञेय होता है, यह भूताकाश और पुरुष सूक्त के उदाहरणों से समझाया गया।
• सभी प्रमुख आचार्यों जैसे श्रीमहाप्रभुजी, रामानुजाचार्य जी, मधवाचार्य जी द्वारा ब्रह्म के स्वरूप में तारतम्य स्वीकार किया जाता है, यह बात पूर्व पक्ष के समर्थन में रखी गई।
• पुष्टिमार्ग के अनुसार, ब्रह्म की प्रमाण, प्रमेय, साधन और फल रूपता का स्वरूप भेद सहिष्णु अभेद के सिद्धांत के अंतर्गत समझाया गया।