सूत्र ३२ (पाद ३, अधिकरण ८) : पूर्वपक्ष का निराकरण
पिछले सत्र में सूत्र ३१ के अंतर्गत उपस्थित हुए पूर्वपक्ष का विवेचन किया गया था, जिसमें परम ब्रह्म की सेतु रूपता के वर्णन से यह प्रश्न उठा कि ब्रह्म का स्वरूप साधन रूप है या फल रूप है, अथवा ये ब्रह्म की दो भिन्न अवस्थाएं हैं या भिन्न स्वरूप। श्रीमहाप्रभुजी अब सूत्र ३२ से इस पूर्वपक्ष का निराकरण कर रहे हैं। पुरुषोत्तमजी के अनुसार, सेतु शब्द का उपयोग ब्रह्म की संसार सागर से पार लगाने की क्षमता के सामान्य भाव को व्यक्त करने के लिए है। ब्रह्म की निर्लेपता को आकाशत्व के रूप में दर्शाया गया है, यह गौण व्यपदेश ब्रह्म की निर्लेपता को समझाने के लिए है।
सूत्र ३३ (पाद ३, अधिकरण ८) : उपासनार्थ गुणधर्मों का निरूपण
सूत्र ३३ 'यथा भूत आदि पाद्वत उपासनीयम' का तात्पर्य है कि ब्रह्म के चरण स्थानीय होने के रूप में सभी का उपासन किया जाता है। ब्रह्म के कुछ धर्मों का लौकिक पदार्थों (जैसे आकाश की निर्लेपता, सेतु की तरणता) के साथ सामंजस्य इसलिए किया गया है ताकि हमारी प्राकृत बुद्धि ब्रह्म के स्वरूप और गुणों का अनुमान कर सके। यह गौणी वृत्ति ब्रह्म को गौण नहीं करती, बल्कि उपासना के प्रयोजन से ही ऐसे दृष्टांत दिए गए हैं। प्रश्नोत्तर में चतुष्पादता की व्याख्या पर चर्चा हुई।
सूत्र ३४-३५ (पाद ३, अधिकरण ८) : धर्मातिदेश और अन्य परत्व का दूषण
सूत्र ३४ 'स्थान विशेषतः प्रकाश आदिवत' इस आशंका का समाधान करता है कि 'वही यह है' जैसे अतिदेश से भी बुद्धि का प्रयोजन सिद्ध हो जाता है, तो धर्मातिदेश की क्या आवश्यकता है। इसका उत्तर है कि केवल अतिदेश में धर्मत्व ज्ञान का अभाव होता है; जैसे सूर्य, चंद्र और अग्नि में तेज समान होते हुए भी प्रकाशता में भेद है। सूत्र ३५ 'उपपत्तेः' ब्रह्म से भिन्न किसी उत्कृष्ट तत्व के मत का दूषण करता है। वक्ता बताते हैं कि सत्य, ज्ञान आदि धर्मों से युक्त विशिष्ट ब्रह्म से भिन्न कोई उत्तम तत्व शास्त्र द्वारा प्रमाणित नहीं है और ऐसा मानना अद्वैत श्रुति के विरुद्ध होगा।
सूत्र ३६ (पाद ३, अधिकरण ८) : ब्रह्म के समान या अधिक का प्रतिषेध
सूत्र ३६ 'तथाऽन्यप्रतिषेधात्' यह स्पष्ट करता है कि ब्रह्म में सेतुता आदि धर्मों का वर्णन होते हुए भी श्रुति स्पष्ट रूप से कहती है कि 'न तत्सम अभ्यधिक दृश्यते' (ब्रह्म के समान या उससे अधिक कोई नहीं दिखता)। यह श्रुति वचन किसी अन्य अधिक वस्तु का निषेध करता है। महाप्रभुजी आज्ञा करते हैं कि पूर्वपक्षी को इस अर्थ का अनुसरण करना चाहिए। वक्ता समझाते हैं कि भगवान अवतार के समय अपनी शक्तियों का तिरोधान कर प्रकट होते हैं, जिससे लोक को बाद में प्रकर्ष का अनुभव होता है। यह दर्शाता है कि एक ही तत्व के गुण आविर्भूत और तिरोहित होते हैं, कोई अन्य उत्तम तत्व नहीं है।
सूत्र ३७ (पाद ३, अधिकरण ८) : ब्रह्म की सर्वगतता और अधिकरण उपसंहार
अधिकरण के अंतिम सूत्र ३७ 'अनेन सर्वगतम आयांशब्दादिभ्यः' में ब्रह्म से अतिरिक्त किसी की परता का निरास करते हुए ब्रह्म की सर्वगतता का निरूपण किया गया है। 'आकाशवत सर्वगतश्च नित्य' जैसी श्रुतियों द्वारा ब्रह्म की व्यापकता सिद्ध होती है, अनुमान से नहीं। अनुमान तभी प्रमाण होता है जब वह श्रुति संवादी हो। वक्ता स्पष्ट करते हैं कि ब्रह्म की व्यापकता को केवल उत्पत्ति, स्थिति और लय तक सीमित नहीं किया जा सकता, बल्कि योग सिद्ध दूर श्रवण आदि की तरह अनेक देशगत कार्य कारण सामर्थ्य विशिष्टता को समझना चाहिए। 'अनेन' पद का उपयोग यह सिद्ध करता है कि ये युक्तियाँ ब्रह्म की व्यापकता की सिद्धि करती हैं, और यह पुनरुक्ति दोष नहीं है, बल्कि विशिष्ट अवगति के लिए है। श्रुति ही ब्रह्म के संबंध में मुख्य प्रमाण है।