मंगलाचरण
सत्र का प्रारम्भ मंगलाचरण से होता है।
प्रश्नोत्तर — पिछले सत्र के विषय में
वक्ता कल के विषय में प्रतिभागियों से प्रश्न पूछते हैं। यह सत्र पिछले अधिकरण के विषयों पर आधारित है।
ब्रह्मसूत्राणुभाष्य परिचय: द्वितीय पाद के अंतिम अधिकरण का प्रारंभ
वक्ता द्वितीय पाद के अंतिम एकादश अधिकरण 'फलमतः' का परिचय देते हैं, जिसमें चार सूत्र हैं। ब्रह्म के गुणधर्मों का निरूपण श्रुति में हमारी बुद्धि के सौकर्य हेतु किया गया है, न कि ब्रह्म की शक्तियों को न्यूनता प्रदान करने के लिए। श्रीपुरुषोत्तमजी ने श्रीमहाप्रभुजी के निर्णय को स्पष्ट किया कि ब्रह्म के गुणधर्म गौण नहीं होते। इस पाद में श्रुतियों की बोधकता का विचार किया गया है, जो अधिकारी भेद के अनुसार ब्रह्म का निरूपण करती हैं। इस प्रकार श्रुति की बोधकता का प्रकार इन वाक्यों से निर्णित होता है।
सूत्र १-२ (अधिकरण ११) — ब्रह्म की फलदात्रता का निरूपण
फलमत उपपत्ते इस सूत्र से एकादश अधिकरण प्रारंभ होता है। ब्रह्म ही सर्वोत्तम हैं, उत्तम अधिकारियों के लिए भजनीय हैं। अन्य अधिकारी प्रायः फल की इच्छा से भजन करते हैं, इसलिए परमात्मा में फलदात्व भी है। ऐहिक और पारलौकिक सभी फल ईश्वर ही देते हैं। 'सर्वस्य वसी, सर्वस्य शणा' जैसी श्रुतियाँ परमात्मा के सार्वभौम स्वामित्व को बताती हैं। ब्रह्म के अतिरिक्त किसी में सर्वफलदात्व शक्ति नहीं है। सूत्र 'श्रुतत्वात च' के द्वारा गीता जी के वाक्य 'भवंति भावा भूतानं मत एव प्रथक विदा' का भी समर्थन किया गया है, जो सिद्ध करता है कि सभी फल ईश्वर ही प्रदान करते हैं।
सूत्र ३ (अधिकरण ११) — जैमिनी मत: कर्म ही फल का दाता
'धर्मम जैमिनी रीत एव' सूत्र से मीमांसकों का पूर्व पक्ष प्रस्तुत किया गया है। उनके मत में कर्म से ही फल मिलता है, ईश्वर से नहीं। कर्मवादी तर्क देते हैं कि ईश्वर भी कर्मनिरपेक्ष फल प्राप्ति की बात नहीं कह सकते, अन्यथा शास्त्रीय विधि व्यर्थ हो जाएगी। कर्म की आवश्यकता स्वीकारने से कर्म की प्रधानता सिद्ध होती है। कर्म का स्वरूप और स्वर्ग आदि फल शास्त्रसम्मत हैं। कर्ममीमांसक ईश्वर ज्ञान संबंधी वेद वाक्यों को अर्थवाद मानते हैं और कर्मों को स्वर्ग आदि फल का साधक रूप में बताते हैं। यदि लोक में विपरीत फल भी दिखे तो उसे शास्त्र सम्मत कर्म का अदृष्ट फल मानना चाहिए। जैमिनी मत के अनुसार, अविषम ईश्वर से विषम फल मानने पर वैश्य और निर्गुणता का दोष आता है, इसलिए कर्म से ही फल होता है।
प्रश्नोत्तर — जैमिनी मत पर शंका समाधान
प्रतिभागियों द्वारा जैमिनी मत के विषय में प्रश्न पूछे जाते हैं। 'चेतन अधिष्ठित अचेतन कार्यक्षम है' कथन का अर्थ समझाया गया कि जीवात्मा के बिना अचेतन शरीर को फल नहीं मिल सकता। 'अपूर्व कर्म व्यापार की कल्पना' पर चर्चा हुई, जहाँ यह स्पष्ट किया गया कि भक्ति में भी भगवान ही भक्तों के साधनों की पूर्ति कर देते हैं, जिससे कर्म की नेसेसिटी (आवश्यकता) बनी रहती है। वक्ता ने बताया कि जैमिनी ऋषि निरीश्वरवादी हैं, और उनके मत का प्रवर्तन भगवान द्वारा पाखंड मत के रूप में करवाया गया है। महाप्रभुजी ने जैमिनी के मत के केवल उन्हीं अंशों को स्वीकार करने का निर्देश दिया है जो व्यास से अविरुद्ध हों।
सूत्र ४ (अधिकरण ११) — बादरायण मत: ईश्वर ही कर्मफल के हेतु
'पूर्वतु बाद हेतु व्यपदेशात' इस अंतिम सूत्र से पूर्व पक्ष का निराश किया गया है। व्यास के मतानुसार, ईश्वर ही फलदाता हैं। श्रुति में ईश्वर को साधु और असाधु दोनों कर्मों का प्रेरक बतलाया गया है। जो कर्म करवाता है, वही तदनुसार फल भी देता है। ईश्वर स्वयं फलदान में समर्थ हैं और कर्म को कारण मानने का तात्पर्य उनकी सृष्टि में विचित्रता की इच्छा से है। इस प्रकार, सकाम भाव से भी भगवान ही भजनीय हैं, क्योंकि हर प्रकार से ईश्वर ही सभी कर्मों के कर्तृत्व और फल के अधीन होते हैं। ईश्वर की सर्वोपरिता और ईश्वरता इसी से खंडित नहीं होती।
अनुभाष्य के अनुवाद और लेखकत्व पर संपादकीय टिप्पणी
इस खंड में श्रीविट्ठलनाथजी के द्वारा अनुभाष्य के अगले डेढ़ अध्याय के भाष्य किए जाने के विषय पर चर्चा होती है। ललित कृष्ण गोस्वामी जी के अनुवाद, जो चौखंबा संस्कृत सीरीज से प्रकाशित हुआ, में 'विद्वन मंडले श्री विट्ठले नच' पाठ कोष्ठबद्ध किया गया है। संपादक महोदय ने अपनी सूझबूझ से इसे मूल महाप्रभुजी की लेखनी का अंश नहीं माना है, क्योंकि श्रीविट्ठलनाथजी उस समय अल्पवयस्क थे और 'विद्वन मंडन' ग्रंथ तब बना भी नहीं था। श्रीपुरुषोत्तमजी ने शैली भेद को ध्यान में रखकर यह मत उपस्थित किया कि आगे का भाष्य श्रीगोसाईंजी ने पूरा किया है। इस पर श्याम काकाजी और केदारनाथ मिश्र ने भी कार्य किया है।
समापन
सत्र का समापन होता है और अगले सत्र में तृतीय पाद के प्रारंभ की बात कही जाती है।