सूत्र ३२ (पाद ३, अधिकरण ८) : ब्रह्म की सेतु रूपता का निराकरण
ब्रह्मसूत्राणुभाष्य के तृतीय पाद के अंतर्गत, यह सत्र पूर्व पक्ष द्वारा उपस्थित संशय के निराकरण से प्रारम्भ होता है। पूर्व पक्ष ने ब्रह्म की सेतु रूपता के वर्णन से ब्रह्म के स्वरूप को साधन रूप या फल रूप मानकर दो भिन्न अवस्थाएँ या स्वरूप माने थे, जिसके कारण शास्त्र वचनों में भेद प्रतीत होता था। श्रीमहाप्रभुजी स्पष्ट करते हैं कि ब्रह्म के भिन्न स्वरूप नहीं होते, केवल कार्य भेद होते हैं। पुरुषोत्तमजी के अनुसार, सेतु शब्द का उपयोग संसार सागर पार करने के उपाय के रूप में सामान्य भाव से किया गया है। जैसे निर्लेपता दिखाने के लिए ब्रह्म को आकाश रूप कहा गया है, वैसे ही यह सेतु रूपता गौण है। यह गौणता ब्रह्म की निर्लेपता को समझाने के लिए है, न कि उसके स्वरूप को न्यून करने के लिए। जैसे 'कुंडपाई अयन' में 'मासाग्निहोत्र' का निरूपण गुणार्थवाची होता है, दोषार्थक नहीं, उसी प्रकार सेतु आदि शब्दों में ब्रह्म के दोष नहीं देखने चाहिए।
सूत्र ३३ (पाद ३, अधिकरण ८) : बुद्धिगत ज्ञान हेतु ब्रह्म स्वरूप का उपासन
यह सूत्र इस प्रश्न का उत्तर देता है कि ब्रह्म के गुणों (जैसे आकाश के समान निर्लेपता या सेतु के समान संसार तरणता) का शास्त्र में निरूपण कहाँ उपयोग होता है। श्रीपुरुषोत्तमजी महाप्रभुजी भाष्य में स्पष्ट करते हैं कि इनका उपयोग हमारी बुद्धि में ब्रह्म के स्वरूप और गुणों का अनुमान कराने के लिए है। अप्राकृत ब्रह्म तत्व को समझने के लिए प्राकृत या सांसारिक वस्तुओं के उदाहरण दिए जाते हैं ताकि हम उसकी इमेजिनेशन कर सकें। वक्ता प्रश्नोत्तर में स्पष्ट करते हैं कि जब पुरुषसूक्त में भगवान को चतुष्पाद कहा जाता है, तो यह ब्रह्म के उपकरणों और धर्मों का स्वीकार है, जैसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष उसके चार चरण हैं। यह उपासना के लिए ब्रह्म के आकार और स्वरूप को चित्त में बनाने का प्रयोजन रखता है।
सूत्र ३४ (पाद ३, अधिकरण ८) : धर्मातिदेश की आवश्यकता
इस सूत्र में पुनः शंका उठाई जाती है कि 'स एव अयम' (वही यह है) जैसे अतिदेश से भी बुद्धिगत प्रयोजन सिद्ध हो सकता है, तो सेतु आदि धर्मों के अतिदेश (धर्मातिदेश) की क्या आवश्यकता है। वक्ता उत्तर देते हैं कि पूर्व अतिदेश में धर्मत्व ज्ञान का अभाव रह सकता है, जबकि धर्मातिदेश में समान धर्मवत्ता का स्पष्ट बोध होता है। उदाहरण के लिए, जैसे सूर्य, चंद्र और अग्नि में तेजस् तत्व समान होते हुए भी उनकी प्रकाशता में भिन्नता होती है, उसी प्रकार अन्न को ब्रह्म कहने पर पोषणत्व का धर्म स्पष्ट नहीं होता। धर्मातिदेश ब्रह्म के गुणों की दिव्यता प्रदर्शित करने के लिए किया जाता है। सूत्रस्थ 'आदि' पद से यह भी स्पष्ट होता है कि उपाधि विशेष के संबंध से काल भी उत्तम या निकृष्ट माना जाता है, जिससे ब्रह्म के धर्मों की विशिष्ट सन्दर्भ साम्यता समझाई जाती है।
सूत्र ३५ (पाद ३, अधिकरण ८) : ब्रह्म के अन्य परत्व का दूषण
सूत्र ३५ में ब्रह्म के अलावा किसी अन्य तत्व के 'पर' (उत्तम) होने के मत का दूषण किया गया है। यदि सत्य, ज्ञान और अनंत आदि धर्मों से युक्त विशिष्ट ब्रह्म से भी भिन्न कोई उत्तम तत्व होता, तो शास्त्र में उसका प्रमाण अवश्य मिलता, पर ऐसा नहीं है। यह केवल पूर्व पक्षी की युक्ति है, जिसका कोई प्रमाण भाव नहीं है। ब्रह्म में गौण और विशिष्ट भाव नहीं होते, केवल आविर्भाव-तिरोभाव की दृष्टि से भगवान कार्य भेद के कारण अपने गुणों को पूर्णतः प्रकट या अप्रकट करते हैं। अद्वैत श्रुति 'एकमेवा द्वितीय ब्रह्म नेह नानास्तिक किंचन' कहकर किसी दूसरे श्रेष्ठ तत्व का निषेध करती है, अन्यथा ब्रह्म के स्वरूप में भेद स्वीकारना पड़ेगा।
सूत्र ३६ (पाद ३, अधिकरण ८) : ब्रह्म से श्रेष्ठ किसी अन्य का निषेध
सूत्र ३६ 'तथा अन्य प्रतिषेधात' के माध्यम से ब्रह्म से अन्य किसी वस्तु के श्रेष्ठ होने का निषेध करता है। जैसे ब्रह्म को सेतु आदि रूप में वर्णित करने वाली श्रुति है, वैसे ही 'न तत्सम अभ्यधिक दृश्यते' (न उसके समान कोई है, न उससे अधिक कोई देखा जाता है) जैसी श्रुतियाँ भी किसी अन्य अधिक वस्तु का निषेध करती हैं। श्रीमहाप्रभुजी आज्ञा करते हैं कि इन श्रुतियों का अर्थ पूर्व पक्षी को स्वीकार करना चाहिए। भगवान अवतार के समय अपनी शक्ति को प्रकट या अप्रकट करते हैं, जिससे लोक को प्रकर्ष की प्रतीति होती है। यह दर्शाता है कि एक ही भगवान अपने गुणों का तिरोधान कर पुनः उन्हें आविर्भूत करते हैं, इसलिए एक तत्व से अन्य कोई दूसरा उत्तम तत्व है, ऐसी कल्पना नहीं करनी चाहिए।
सूत्र ३७ (पाद ३, अधिकरण ८) : ब्रह्म की सर्वगतता का निरूपण
यह अंतिम सूत्र 'अनेन सर्वगतम माया शब्दादिभ्यः' ब्रह्म की सर्वगतता का निरूपण करता है। 'आकाशवत सर्वगतश्च नित्य' जैसी श्रुतियाँ ब्रह्म की व्यापकता को सिद्ध करती हैं, जिसका ज्ञान अनुमान के बजाय श्रुति से होता है। अनुमान तभी प्रमाण होता है जब वह श्रुति संवादी हो। शंकराचार्यजी जैसे लोग निषेध वृत्ति से ब्रह्म की व्यापकता सिद्ध करते हैं, जिसे श्रीमहाप्रभुजी असंगत मानते हैं, क्योंकि इससे ब्रह्म की व्यापकता के ज्ञान के लिंग मिथ्या हो जाते हैं। जन्माद्यस्य यतः जैसे सूत्र भी परमात्मा के सर्वदेशगत कार्य-कर्तृत्व से उसकी व्यापकता बतलाते हैं। इस अधिकरण में ब्रह्म की व्यापकता को केवल उत्पत्ति, स्थिति और लय तक सीमित न करके उसकी अनेक देशगत कार्य-कारण सामर्थ्य विशिष्टता को समझाया गया है। इस प्रकार यह अधिकरण ब्रह्म के अन्य परत्व का निराश करता है।