तृतीय पाद का आरम्भ एवं साधना का निरूपण
द्वितीय पाद के समापन के उपरान्त तृतीय पाद का प्रारंभ होता है। वक्ता ने स्पष्ट किया कि महाप्रभुजी का भाष्य तृतीय अध्याय के द्वितीय पाद तक ही प्राप्त होता है और आगे का भाष्य श्रीगोसाईंजी ने पूर्ण किया है। तृतीय पाद साधनाध्याय है, जो ब्रह्म साक्षात्कार हेतु उपासना रूप साधनों का निरूपण करेगा। उपासना में धारणा सिद्ध होने पर मानसी मूर्ति की अभिव्यक्ति होती है, जिसके परिपाक से साक्षात्कार होता है। इस पाद में गुणोपसंहार के अंतरंग विचार किए जाएँगे। भगवान उद्धवजी के प्रति ज्ञान और भक्ति को अंतरंग साधन बताया गया है, जबकि कर्म बहिरंग साधन है। पुरुषोत्तमजी के अनुसार, कर्मोपसंहार से पहले ज्ञान और भक्ति की उपयोगिता के कारण गुणोपसंहार का विचार पहले किया गया है।
काम्य उपासना, ज्ञान-भक्ति तथा कर्म साधना में भेद
एक प्रतिभागी ने कर्म, ज्ञान और भक्ति के क्रम तथा काम्य उपासना के संदर्भ में प्रश्न किया। वक्ता ने स्पष्ट किया कि कर्म बहिरंग साधन है क्योंकि वह कामनाओं की पूर्ति हेतु किया जाता है। ब्रह्मज्ञान रहित शुद्ध कर्म केवल चित्त शुद्धि ही देता है, मोक्ष नहीं। ज्ञान और भक्ति अंतरंग साधन हैं, जिनकी सीधी मोक्षोपकारिता है, इसलिए उनका विचार पहले किया गया है। काम्य उपासना का संदर्भ यह है कि, भले ही किसी को मोक्ष न चाहिए हो और वह सकाम उपासना करता हो, उसे भी फल ब्रह्म ही देते हैं। ब्रह्मज्ञान अपूर्ण होने पर भी, शास्त्र ने शाखा भेद से इसकी व्यवस्था दी है, जिससे साधक अपनी शाखा के अनुसार ब्रह्म की उपासना कर सके।
ब्रह्मसूत्र १ — सर्ववेदान्तप्रत्ययं चोदनाद्यविशेषात् का पूर्वपक्ष
वक्ता ने प्रथम अधिकरण के पहले सूत्र 'सर्व वेदांत प्रत्यय विशेषात' का आरम्भ किया, जिसमें श्रीमहाप्रभुजी यह स्थापित करते हैं कि ब्रह्म ही सभी श्रुतियों द्वारा गम्य और प्रत्येक श्रुति का तात्पर्य हैं। पूर्व पाद में ब्रह्म के शुद्ध सच्चिदानंद रूप का निरूपण किया गया, अब ब्रह्मगत धर्मों पर विचार किया जाएगा। संशय यह है कि ब्रह्म के धर्म एक स्थान पर वर्णित न होकर भिन्न उपासनाओं के प्रकरण में भिन्न रूप से वर्णित हैं (जैसे पंचाग्नि विद्या में कहीं पांच, कहीं छह अग्नियों का उल्लेख)। विभिन्न अवतारों (श्रीकृष्ण, श्री राम, नरसिंह, वामन) के स्वरूप, गुण और लीलाओं में भी भेद दिखता है, जिससे उपासक भ्रमित होता है। देवताओं के स्वरूप भेद और याग भेद भी अनेक ब्रह्म की धारणा को बल देते हैं, जो श्रुति विरुद्ध है।
ब्रह्म की अनेकता और उपासना में संशय
वक्ता ने स्पष्ट किया कि अनेकता का अनुभव ब्रह्म के स्वरूप में एकरूपता का ज्ञान नहीं होने देता। इससे ब्रह्म के गुणधर्मों के विषय में संशय बना रहता है कि श्रुति का विवरण किस संदर्भ से दिया गया है। उपासना वाक्यों में ब्रह्म के गुणधर्मों का वर्णन उपासनार्थ दिया गया है, परंतु भिन्नताएँ उन्हें उपयोगी नहीं बनने देतीं। इससे साधक या तो कुछ धर्मों को स्वीकार कर अन्य को छोड़ देते हैं, या आधुनिक आदिभौतिक व्याख्याओं का सहारा लेते हैं। जब हम पंचदेव उपासना करते हैं, तो प्रत्येक देवता को ब्रह्म रूप में देखना कठिन होता है क्योंकि हम उनके विशिष्ट गुणों से प्रभावित होते हैं। कर्म प्रतिपादक संहिता और ब्राह्मण ग्रंथों को पढ़कर भी ब्रह्मविद्या का बोध नहीं होता, जिससे साधक को अनेक ब्रह्म की प्रतीति होती है और वास्तविक ब्रह्म को ग्रहण कर पाना कठिन हो जाता है। इस कारण, अपूर्ण ज्ञान से प्राप्त ब्रह्म की उपासना भी सीमित फलदायक होगी।
समापन
वक्ता ने सत्र का समापन करते हुए बताया कि ये समस्याएं सभी विचारकों को झेलनी पड़ती हैं जब वे वेदों की विविध शैलियों का सामंजस्य नहीं कर पाते। उन्होंने कहा कि शास्त्र की शैली को समझना आवश्यक है ताकि ब्रह्म के गुणों का सामंजस्य किया जा सके। अन्यथा, ब्रह्मविरुद्ध धर्माश्रयता को अपने श्रवण, मनन और निदिध्यासन का ऑब्जेक्ट बनाना कठिन हो जाता है। शाखा विभाग हमारी बौद्धिक अनुकूलता को ध्यान में रखकर व्यवस्था करते हैं, ताकि साधक किसी एक गुण या रूप पर निष्ठापूर्वक ध्यान कर सके।