॥ ब्रह्मसूत्राणुभाष्य-२/१०/३१ ॥

श्रीवल्लभाचार्य विद्यापीठ, हालोल — नित्य पुष्टिस्वाध्याय
📅 07 July 2026
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परिचय एवं सन्दर्भ

यह सत्र ब्रह्मसूत्राणुभाष्य के तृतीय अध्याय के द्वितीय पाद में दसवें अधिकरण के प्रथम सूत्र (सूत्र ३१) पर आधारित है। पिछले सत्र में नौवां अधिकरण संपन्न हुआ था। दसवां अधिकरण सात सूत्रों का है और इस सत्र में उसके प्रथम सूत्र ‘परमतः सेतुन मान संबंध भेद व्यपदेशभ्यह’ के पूर्व पक्ष पर विचार किया गया, जिसमें ब्रह्म की सेतु रूपता और उसके निहितार्थों पर गहन चर्चा हुई।

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मंगलाचरण
सत्र का प्रारम्भ मंगलाचरण से होता है।
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सूत्र ३१ (दशम अधिकरण) — ब्रह्म की सेतु रूपता पर पूर्व पक्ष का प्रारंभ
००:०३ – ०६:५१ — सूत्र ३१ (दशम अधिकरण) — ब्रह्म की सेतु रूपता पर पूर्व पक्ष का प्रारंभ
सूत्र ३१ (दशम अधिकरण) : ब्रह्म की सेतु रूपता पर पूर्व पक्ष का प्रारंभ
तृतीय अध्याय के द्वितीय पाद का दसवां अधिकरण सात सूत्रों का है। इसका प्रथम सूत्र 'परमतः सेतुन मान संबंध भेद व्यपदेशभ्यह' ब्रह्म की सेतु रूपता से संबंधित संशय को प्रस्तुत करता है। पूर्व पक्षी का तर्क है कि यदि ब्रह्म को 'सेतु' रूप कहा जाता है, तो वह साधन रूप होने के कारण उसकी फल रूपता या परत्वता सिद्ध नहीं होती, क्योंकि सेतु का उपयोग केवल गंतव्य तक पहुँचने के लिए किया जाता है। इससे ब्रह्म में देश, काल, वस्तु और स्वरूप कृत चार प्रकार के परिच्छेद का विचार उपस्थित होता है। यह सूत्र ब्रह्म की सगुणता और निर्गुणता के पहले के विचारों के विरोध के परिहार का आधार बनता है। वक्ता ने इस संदर्भ को स्पष्ट करते हुए ब्रह्म के धर्म और धर्मी संबंधी विचारों पर प्रकाश डाला।
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अक्षर ब्रह्म और परब्रह्म में भेद का प्रश्न
०६:५१ – १९:१६ — अक्षर ब्रह्म और परब्रह्म में भेद का प्रश्न
अक्षर ब्रह्म और परब्रह्म में भेद का प्रश्न
पूर्व पक्षी संशय उपस्थित करता है कि क्या गेय ब्रह्म से भी उत्कृष्ट कोई और तत्व है। 'अक्षरात परतः पराः पुरुषान परं किंचित सा काष्ठा सा परागति' जैसे श्रुति वचन ब्रह्म की सेतु रूपता को आधार बनाकर इस भेद का समर्थन करते हैं। यदि सेतु रूप ब्रह्म को निम्न श्रेणी का माना जाए, तो यह अक्षर ब्रह्म और परब्रह्म के भेद के समान हो जाता है। वक्ता ने समझाया कि यदि पुष्टिमार्ग भी अक्षर ब्रह्म को गणितानंद और परब्रह्म को अगणितानंद कहकर कोटिभेद स्वीकार करता है, तो शंकराचार्य जी के सगुण-निर्गुण ब्रह्म के भेद के विरोध की हमारी दलील कमजोर पड़ जाती है। यह प्रश्न उठा कि ब्रह्म के गुण यदि ब्रह्मात्मक हैं, तो उनमें वृद्धि-ह्रास कैसे संभव है, जो प्राकृत धर्मों का लक्षण है।
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प्रश्नोत्तर — सेतु रूप ब्रह्म और गुणधर्मों में भेद
१९:१६ – ३५:३७ — प्रश्नोत्तर — सेतु रूप ब्रह्म और गुणधर्मों में भेद
प्रश्नोत्तर — सेतु रूप ब्रह्म और गुणधर्मों में भेद
इस भाग में वक्ता ने पूर्व पक्षी के तर्कों को विस्तृत रूप से समझाया। उन्होंने स्पष्ट किया कि शंकराचार्य जी के मत में सगुण ब्रह्म उपासनार्थ है और फल निर्गुण ब्रह्म है, जिसे जानने के लिए सगुण ब्रह्म सेतु का कार्य करता है। इसी तरह, यदि हम अक्षर ब्रह्म को साधन रूप मानते हैं और परब्रह्म को फल रूप, तो यह शंकराचार्य जी के मत से बहुत भिन्न नहीं होता। वक्ता ने समझाया कि ब्रह्म के गुणधर्म ब्रह्मात्मक होने के कारण उनमें वृद्धि-ह्रास नहीं हो सकता, क्योंकि यह प्राकृत धर्मों का लक्षण है। अक्षर ब्रह्म में आनंद की न्यूनता की बात इस सिद्धांत के विरुद्ध प्रतीत होती है। इस आपत्ति के निराकरण के लिए 'गणितानंदकम्' में 'कम्' प्रत्यय को निषेधार्थक मानने और कार्य भेद (स्वरूप भेद नहीं) के सिद्धांत का उपयोग किया जाता है, जैसा कि प्रमेयरत्नसंग्रह में अक्षर ब्रह्म और नारायण के संदर्भ में बताया गया है।
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प्रश्नोत्तर — गेय ब्रह्म और फल रूप उत्कृष्ट
३५:३७ – ५६:५५ — प्रश्नोत्तर — गेय ब्रह्म और फल रूप उत्कृष्ट
प्रश्नोत्तर — गेय ब्रह्म और फल रूप उत्कृष्ट
वक्ता ने एक प्रश्न का उत्तर दिया कि 'गेय ब्रह्म से उसका फल रूप उत्कृष्ट है, उससे कोई और उत्कृष्ट है या नहीं' इस संशय का अर्थ क्या है। उन्होंने स्पष्ट किया कि श्रुति ब्रह्म के 1/4 स्वरूप का निरूपण करती है, जबकि 3/4 हिस्सा अज्ञेय और फल रूप होता है। 1/4 हिस्सा केवल ब्रह्म के स्वरूप का अंदाजा देने वाला साधन है, जैसे आकाश व्यापकता को समझाने का साधन है, किंतु स्वयं पंचमहाभूत होने के कारण परिछिन्न है। उन्होंने बल दिया कि यदि ब्रह्म के आनंद जैसे गुणधर्मों में भी न्यूनता या वृद्धि-ह्रास होता है, तो वे प्राकृत हो जाते हैं, जिससे सगुण और निर्गुण ब्रह्म का भेद अनिवार्य हो जाता है, जैसा कि पूर्व पक्षी तर्क दे रहा है। वक्ता ने इस बात को पुष्टिमार्ग के सिद्धांत 'आत्मसृष्टि है ना वैषम्य निर्गण्य दोष' और आविर्भाव-तिरोभाव के माध्यम से समझाया, फिर भी पूर्व पक्षी का सवाल बना रहता है।
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शब्द बल और अर्थ बल का भेद
यह अधिकरण क्यों आवश्यक है, इस संशय का समाधान करते हुए वक्ता ने बताया कि अब तक 'समन्वय' और 'उत्तरपाद' में 'शब्द बल' पर विचार किया गया था, अर्थात् वेद वाक्य ब्रह्म निरूपक कैसे हैं। परंतु अब 'अर्थ बल' पर विचार होगा कि वेद वाक्य किस प्रकार ब्रह्म रूपी प्रमेय का निरूपण कर रहे हैं। वक्ता ने 'पुष्प' शब्द का उदाहरण दिया, जहां शब्द बल से उसका अर्थ खिलने वाला है, लेकिन अर्थ बल से वह एक फूल या किसी व्यक्ति का नाम भी हो सकता है। यह अधिकरण ब्रह्म के 'फल', 'साधन', 'प्रमेय' और 'प्रमाण' स्वरूपों के अर्थ बल पर विचार करेगा, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि ब्रह्म की साधन रूपता उसकी न्यूनता या हीनता नहीं है।
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प्रश्नोत्तर — धर्मान्तर और प्रमाण-क्रम
१:०८:३६ – १:१३:३६ — प्रश्नोत्तर — धर्मान्तर और प्रमाण-क्रम
प्रश्नोत्तर — धर्मान्तर और प्रमाण-क्रम
एक प्रश्न में 'धर्मान्तर संबंधी' शब्द का अर्थ पूछा गया, जिसका वक्ता ने उत्तर दिया कि इसका अर्थ है कि ब्रह्म के विभिन्न धर्मों में परस्पर विरोध की संभावना। वक्ता ने यह भी स्पष्ट किया कि फल, साधन, प्रमेय और प्रमाण के क्रम को उल्टा क्यों बताया गया, यह फल के संदर्भ में उत्पन्न संशय के कारण है, जहाँ फल को सबसे ऊपर माना जाता है। इस चर्चा ने यह स्पष्ट किया कि इस अधिकरण में ब्रह्म के विभिन्न स्वरूपों को एक ही परम तत्व के अभिन्न आयामों के रूप में समझने का प्रयास किया जा रहा है।
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सेतु की साधन रूपता पर पूर्व पक्ष
१:१३:३६ – १:२१:५७ — सेतु की साधन रूपता पर पूर्व पक्ष
सेतु की साधन रूपता पर पूर्व पक्ष
पूर्व पक्षी अब अपने हेतुओं की बाधकता का निरूपण करते हैं, विशेषकर 'सेतु' शब्द पर। श्रुति ने 'अथ यह आत्मानं अनुविध्य व्रजती' से लेकर 'सर्वेशु लोकेशु कामचारो भवती' तक के प्रसंग में काम भाव, ज्ञान प्रशंसा और अज्ञात व्यवधान का वर्णन करते हुए ज्ञान की सिद्धि के बाद संसार संबंध के अभाव के निमित्त ब्रह्म को सेतु रूप कहा है। 'पाप सागर से पार होने के लिए सेतु का आश्रय' का वर्णन करते हुए श्रुति संसार और फल के मध्य में ब्रह्म को सेतु रूप स्थित करती है। इससे पूर्व पक्षी यह तर्क देता है कि यदि तरना ही फल है, तो सेतु रूप ब्रह्म अवांतर फल हो सकता है, परंतु परम फल नहीं। इस प्रकार, ब्रह्म को साधन रूप कहना उसकी फल रूपता का निषेध करता है।
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अनुमान, संबंध और भेद व्यापदेश से ब्रह्म का परिछिन्न स्वरूप
१:२१:५७ – १:३५:२७ — अनुमान, संबंध और भेद व्यापदेश से ब्रह्म का परिछिन्न स्वरूप
अनुमान, संबंध और भेद व्यापदेश से ब्रह्म का परिछिन्न स्वरूप
पूर्व पक्षी आगे उन्मा (अनुमान/ध्यान), संबंध (आधार-आधेय भाव) और भेद व्यापदेश के माध्यम से ब्रह्म के परिछिन्न स्वरूप का निरूपण करता है। दहर प्रसंग में 'जितना यह भूताकाश है, उतना ही यह हृदयस्थ आकाश है' जैसे दृष्टांतों से ब्रह्म के स्वरूप को समझाने का प्रयास किया गया है, जो हमारी सीमित बुद्धि के लिए उपयोगी है, पर वस्तुतः ब्रह्म की अपरिछिन्नता को नहीं दर्शाता। पुरुष सूक्त में चतुष्पाद ब्रह्म का वर्णन भी मनुष्य शरीर के दृष्टांत से ब्रह्म को समझने का साधन मात्र है, न कि उसका वास्तविक, अपरिछिन्न स्वरूप। 'उभावस्मिन' (आधार-आधेय संबंध) और 'प्राज्ञेन आत्मना सम संपरिषक्त' (वस्तु परिच्छेद) जैसे श्रुति वचन भी ब्रह्म में परिछिन्नता दिखाते हैं। 'जो इस सूर्य में हिरण्यमय पुरुष दिखता है, जो इस नेत्र में पुरुष दिखता है' जैसे भेद व्यापदेश भी ब्रह्म में भिन्नता दर्शाते हैं। ये सभी तर्क यह सिद्ध करते हैं कि श्रुति में एक परिछिन्न ब्रह्म और एक अपरिछिन्न ब्रह्म का निरूपण है, जो अलग-अलग तत्व हैं।
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पूर्व पक्ष का निष्कर्ष एवं आगामी सत्र
१:३५:२७ – १:३५:५६ — पूर्व पक्ष का निष्कर्ष एवं आगामी सत्र
पूर्व पक्ष का निष्कर्ष एवं आगामी सत्र
पूर्व पक्षी अपने तर्कों को सारांशित करता है कि देश, काल, वस्तु और स्वरूप संबंधी चार प्रकार के परिच्छेदों से रहित कोई और भी विवेचनीय वस्तु है। श्रुति ब्रह्म को कहीं परिछिन्न और कहीं अपरिछिन्न रूप में निरूपित करती है, जिससे यह सिद्ध होता है कि एक ब्रह्म परिछिन्न है और दूसरा अपरिछिन्न है, और वे दोनों अलग-अलग हैं। इस प्रकार, पूर्व पक्ष ने ब्रह्म के स्वरूप में साधन-फल, न्यून-उत्कृष्ट और परिछिन्न-अपरिछिन्न भेद को स्थापित किया। वक्ता ने सत्र का समापन करते हुए बताया कि महाप्रभुजी अगले सूत्र में इस पूर्व पक्ष का खंडन कर सिद्धांत स्थापित करेंगे। प्रतिभागियों को इस विषय पर पुनः विचार करने का निर्देश दिया गया।
📖 सार
📌 सार
• ब्रह्मसूत्राणुभाष्य के तृतीय अध्याय के द्वितीय पाद में दसवें अधिकरण के प्रथम सूत्र (३१) 'परमतः सेतुन मान संबंध भेद व्यपदेशभ्यह' का पूर्व पक्ष प्रस्तुत किया गया।
• पूर्व पक्षी ने तर्क दिया कि श्रुति में ब्रह्म को 'सेतु' (साधन) रूप कहने से उसकी फल रूपता और परत्वता खंडित होती है।
• शंकराचार्य के सगुण-निर्गुण ब्रह्म और पुष्टिमार्ग के अक्षर ब्रह्म-परब्रह्म में भेद की समानता पर प्रश्न उठा, विशेषकर गुणों में वृद्धि-ह्रास के संदर्भ में।
• वक्ता ने स्पष्ट किया कि समन्वय में 'शब्द बल' पर विचार हुआ था, जबकि यह अधिकरण 'अर्थ बल' पर ध्यान केंद्रित करेगा।
• पूर्व पक्षी ने 'सेतु', 'उन्मा' (अनुमान/ध्यान), 'संबंध' (आधार-आधेय भाव) और 'भेद व्यापदेश' के माध्यम से ब्रह्म के परिछिन्न स्वरूप को दर्शाया।
• तर्कों का निष्कर्ष यह रहा कि श्रुति एक परिछिन्न ब्रह्म (साधन) और एक अपरिछिन्न ब्रह्म (फल) का निरूपण करती है, जो भिन्न हैं।