दसवाँ अधिकरण — सेतु रूपता का संशय और पूर्व पक्ष का उपक्रम
तृतीय अध्याय के द्वितीय पाद के नौवें अधिकरण में श्री पुरुषोत्तमजी ने ब्रह्म की सगुणता और निर्गुणता दोनों पक्षों को स्थापित किया था। पाँचवें से नौवें तक के पाँच अधिकरणों द्वारा श्रुति की बोधकता अर्थात ब्रह्म के स्वरूप का निरूपण करने की रीति स्पष्ट की गई थी। अब दसवाँ अधिकरण प्रारम्भ होता है जो सात सूत्रों का है। श्रुति के 'य आत्मा ससेतुः' इत्यादि वचन में ब्रह्म को सेतु रूप कहा गया है। सेतु साधन रूप होता है, इसलिए संशय उपस्थित होता है कि यदि ब्रह्म को सेतु रूप कहा जाए तो ब्रह्म की साधन रूपता सिद्ध होती है और तब ब्रह्म की फल रूपता अर्थात परता नहीं रहती। देश, काल, वस्तु और स्वरूप — इन चार प्रकार के परिच्छेदों से रहित ब्रह्म को अन्य प्रकार से परता बताना श्रुति का तात्पर्य हो सकता है, यह प्रश्न प्रथम सूत्र से उपस्थित किया जा रहा है।
सूत्र १ — पूर्व पक्ष : अक्षर ब्रह्म और परब्रह्म में कोटि भेद का संशय
यहाँ पूर्व पक्षी यह कहना चाहता है कि श्रुति ने ब्रह्म को सेतु रूप कहा है, जिससे साधन रूप ब्रह्म और फल रूप ब्रह्म — ये दो अलग-अलग कोटियाँ सिद्ध होती हैं। जैसे अक्षर ब्रह्म और परब्रह्म में कोटि भेद माना जाता है — अक्षर ब्रह्म के अंदर गणितानंद होता है और परब्रह्म के अंदर अगणितानंद — उसी प्रकार साधन रूप ब्रह्म निम्न कक्षा का और फल रूप ब्रह्म उत्तम कक्षा का हो जाता है। पूर्व पक्षी यह भी कह रहा है कि जैसे महाप्रभुजी के सिद्धांत में अक्षर ब्रह्म और परब्रह्म में धर्मधर्मी के आधार पर भेद किया जाता है, उसी प्रकार शंकराचार्यजी का सगुण ब्रह्म और निर्गुण ब्रह्म वाला कोटि भेद भी समान प्रकार का ही है — इसलिए दोनों सिद्धांतों में कोई मेजर अंतर नहीं रह जाता। यह संशय इसलिए भी बलवान है क्योंकि जो ब्रह्म का धर्म ब्रह्मात्मक है, उसमें वृद्धि-ह्रास नहीं हो सकता; यदि वह होता है तो वह प्राकृत धर्म हो जाता है।
प्रश्नोत्तर — गणितानंदकम्, आविर्भाव-तिरोभाव और कार्य भेद बनाम स्वरूप भेद
इस खंड में श्रोताओं के प्रश्नों के उत्तर में यह विचार स्पष्ट किया गया। 'गणितानंदकम्' में 'कम्' प्रत्यय निषेधार्थक है — इसलिए जो गणितानंद नहीं है वह अक्षर है, यह श्याम काकाजी का मत है। अक्षर ब्रह्म और नारायण का भेद स्वरूप भेद नहीं है, केवल कार्य भेद है। कारण कोटि में दोनों समान हैं; कार्य कोटि में आने पर भेद प्रकट होता है। इसी प्रकार परब्रह्म और अक्षर ब्रह्म का अन्तर कार्य कोटि में है, प्रकृति पर्यंत स्वरूप भेद नहीं है। आविर्भाव-तिरोभाव के सिद्धांत से इस प्रश्न का समाधान हो सकता है, परन्तु वह महाप्रभुजी का मूल सिद्धांत नहीं है; मूल सिद्धांत तादात्मवाद है। इस खंड में यह भी स्पष्ट किया गया कि पूर्व पांच अधिकरणों में जो यह आर्गुमेंट दी गई थी कि ब्रह्म के गुणों को ग्रहण करने से ब्रह्म में परिच्छिन्नता नहीं आती — उसी आर्गुमेंट का पूर्व पक्षी विरोध में उपयोग कर रहा है।
सूत्र २ का उपक्रम — अर्थबल से विचार : प्रमाण, प्रमेय, साधन और फल
यहाँ महाप्रभुजी यह स्पष्ट करते हैं कि अब तक जो विचार हुआ वह शब्द बल से हुआ — अर्थात वेद के वचनों के आधार पर ब्रह्म के स्वरूप का निरूपण किया गया। अब इस नए अधिकरण में अर्थबल से विचार किया जाएगा। अर्थबल का तात्पर्य है — ब्रह्म को ही प्रमाण, प्रमेय, साधन और फल के रूप में अर्थ के स्तर पर कैसे समझा जाए। इसीलिए यह अधिकरण शब्द बल से भिन्न है और नया है। महाप्रभुजी का सिद्धांत यह है कि ब्रह्म को साधन रूप कहने पर भी उनकी फल रूपता का निषेध नहीं होता — इसीलिए हमारे घर में जो सेव्य हैं वे साधन रूप भी हैं और फल रूप भी हैं; इन दोनों में कोटि भेद नहीं है। श्रुति के भेदपदेश, उभावस्मिन से आधार-आदेय संबंध, तथा प्राज्ञेन आत्मना सम्पर्षक्त — इन वचनों के आधार पर पूर्व पक्षी अपने आर्गुमेंट को स्पष्ट करता है कि परिच्छिन्न ब्रह्म और अपरिच्छिन्न ब्रह्म अलग-अलग हैं। इस पूर्व पक्ष का खंडन आगे के सूत्रों में किया जाएगा।