सूत्र ३१ — पूर्वपक्ष के चार तर्कों का संग्रह
वक्ता ने पूर्व सत्र की पुनरावृत्ति करते हुए बताया कि शंकराचार्य जी ने इस अधिकरण में चार पैराग्राफों में पूर्वपक्षीय तर्क उपस्थित किए हैं, जिन्हें श्रीमहाप्रभुजी ने यहाँ संक्षेप में प्रस्तुत किया है। पहला तर्क यह है कि शास्त्र में साधन रूप और फल रूप के वचन भिन्न-भिन्न हैं, अतः दोनों को एक नहीं करना चाहिए। दूसरा तर्क यह है कि ब्रह्म का मूल स्वरूप गेय नहीं है — जो औपाधिक स्वरूप से जाना जाता है, वह मूल से न्यून है। तीसरे तर्क में प्रमेय रूप से ब्रह्म का जो निरूपण होता है, वह भी परिच्छिन्न होने के कारण ब्रह्म का मूल रूप नहीं है। चौथे तर्क में यह कहा गया कि फल दृष्टि से भी ब्रह्म का जो बोध हम करते हैं, वह भी परिच्छेद-सापेक्ष है, इसलिए शास्त्र के सभी वचनों को परिच्छिन्न और अपरिच्छिन्न दो कोटियों में रखना चाहिए।
प्रश्नोत्तर — प्रमेय रूपता, उन्मान व्यपदेश और भूताकाश का दृष्टान्त
एक प्रतिभागी ने प्रमेय रूपता के सन्दर्भ में उन्मान व्यपदेश से स्वरूप निरूपण की बात को स्पष्ट करने का अनुरोध किया। वक्ता ने बताया कि दहर वाक्य में भी प्रमेय के दो रूप बताए गए हैं — आधार रूप तत्त्व और आधेय रूप तत्त्व अलग-अलग निरूपित हैं। जब कोई ज्ञानी या योगी अपनी आत्मा में ब्रह्म के स्वरूप का अनुभव करता है, तो वह उसका परिच्छिन्न रूप ही जान पाता है, मूल रूप नहीं। भूताकाश का दृष्टान्त देते हुए वक्ता ने कहा कि आकाश स्वयं व्यापक नहीं है, फिर भी श्रुति ने ब्रह्म की व्यापकता को समझाने के लिए उसका उपयोग किया — यह परिच्छिन्न स्वरूप से निरूपण है, जो टू बी अंडरस्टुड है। इस प्रकार उन्मान से परिच्छेद का ही निरूपण होता है, यह पूर्वपक्षी का आशय है।
प्रश्नोत्तर — परिच्छिन्न और अपरिच्छिन्न ब्रह्म, दो प्रकार की बुद्धि
एक अन्य प्रतिभागी ने देश-काल-वस्तु स्वरूप के परिच्छेद को प्रमाण-प्रमेय-साधन-फल से जोड़ने की बात पूछी। वक्ता ने समझाया कि प्रमाण गम्य होना, प्रमेय गम्य होना, साधन गम्य होना और फल बुद्धि होना — ये चारों ही परिच्छेद के एक प्रकार हैं। जब हम श्रवण, मनन और निदिध्यासन करते हैं, तो तीनों में ब्रह्म परिच्छिन्न ही ज्ञात होता है — अपरिच्छिन्न का न श्रवण हो सकता है, न मनन, न निदिध्यासन। फल काल में जो अनुभव होता है, उसकी अभी जो बुद्धि है वह भी परिच्छिन्न है। बच्चे को थाली में चंद्रमा का प्रतिबिंब दिखाने के उदाहरण से वक्ता ने स्पष्ट किया कि शास्त्र अभी हमें अंदाजा देता है — वास्तविक अनुभव मुक्ति की अवस्था में होगा।
प्रश्नोत्तर — विभिन्न आचार्यों के मत और महाप्रभुजी का तृतीय मार्ग
प्रतिभागी के प्रश्न के उत्तर में वक्ता ने बताया कि शंकराचार्य जी के पास इस होपलेस परिस्थिति का उत्तर यह है कि तुम स्वयं ही ब्रह्म हो — माया के आवरण के कारण पहचानते नहीं। रामानुजाचार्य जी और मधवाचार्य जी यह कहते हैं कि जो अभी समझ में आ रहा है वह मिथ्या नहीं, परंतु आंशिक है — वैकुंठ में जाकर अनुभूति का विषय बनेगा। महाप्रभुजी ने तृतीय स्कन्ध की सुबोधनी में एवं भेद पुरस्कृत त्रिविधो भक्ति मार्ग का निरूपण करते हुए तामस, राजस और सात्विक भक्ति मार्ग का भेद बताया — जहाँ भेद की मात्रा के आधार पर यह वर्गीकरण है, न कि प्राकृत गुणों के आधार पर। अस्माकम तो निर्गुण कहकर महाप्रभुजी चौथा स्टैंड लेते हैं। हम तादात्मवादी हैं — अभेद के ब्रैकेट में भेद प्रकट होता है, भेद के ब्रैकेट में अभेद नहीं।
प्रश्नोत्तर — पुष्टिमार्ग में प्रमाण, प्रमेय, साधन और फल रूपता
एक प्रतिभागी ने ब्रह्म को प्रमाण कहने का अर्थ पूछा। वक्ता ने महाप्रभुजी के सर्वनिर्णय का सन्दर्भ देते हुए बताया कि नाम सृष्टि के रूप में ब्रह्म होते हैं — वेदादि शास्त्र नाम सृष्टि हैं और भगवान ने अपना ही रूप प्रकट किया है। इसलिए भगवान प्रमाण बनकर हमारे पास आते हैं। प्रमेय रूपता में ब्रह्म की पूर्ण स्वीकृति है — लेशमात्र भी न्यूनता का निरूपण नहीं है। साधन रूपता के सन्दर्भ में वक्ता ने कहा कि साधन गम्य तो वैसे भी ब्रह्म नहीं हैं — निःसाधनता का बोध कराने के लिए साधन रूपता बताई गई। फल रूपता तो निश्चित है ही। अन्त में वक्ता ने बताया कि आगे का सूत्र विस्तृत है इसलिए सोमवार से आगे लेंगे — अभी महाप्रभुजी का उत्तर पक्ष शेष है।