॥ ब्रह्मसूत्राणुभाष्य-३/३/३०-३३ ॥

श्रीवल्लभाचार्य विद्यापीठ, हालोल — नित्य पुष्टिस्वाध्याय
📅 28 July 2026
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परिचय एवं सन्दर्भ

इस सत्र में ब्रह्मसूत्राणुभाष्य के तृतीय पाद के तृतीय अधिकरण (भेद इत्याधिकरणम्) के सूत्र ३० से ३३ पर चर्चा की गई है। वक्ता ने ब्रह्म के विविध गुणधर्मों के निरूपण के कारण होने वाले संशय और उपासना मार्ग की ब्रह्मविद्यात्वता पर विभिन्न पूर्वपक्षों को प्रस्तुत किया। तदनंतर श्रीमहाप्रभुजी के सिद्धान्त का विवेचन किया गया कि सभी वेदांत वाक्य ईश्वरार्थक हैं, जो जीवों की रुचि और अधिकार के अनुसार ब्रह्म के विविध रूपों का वर्णन करते हैं।

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मंगलाचरण
२
प्रश्नोत्तर — कल के विषय में
००:०६ – ००:२९ — प्रश्नोत्तर — कल के विषय में
प्रश्नोत्तर — कल के विषय में
सत्र का प्रारंभ पूर्व सत्र में चर्चा किए गए विषयों पर प्रश्नोत्तर से होता है। किसी प्रतिभागी को कल के विषय में कोई प्रश्न होने पर वक्ता उसे स्पष्ट करते हैं। यह सत्र की निरंतरता को दर्शाता है।
३
ब्रह्म के विविध गुणधर्मों का निरूपण: पूर्वपक्ष
००:२९ – १६:४० — ब्रह्म के विविध गुणधर्मों का निरूपण: पूर्वपक्ष
ब्रह्म के विविध गुणधर्मों का निरूपण: पूर्वपक्ष
वक्ता ने तृतीय पाद में श्रीमहाप्रभुजी द्वारा भाष्य में उठाए गए विषय को प्रस्तुत किया, जिसमें ब्रह्म के विविध गुणधर्मों के निरूपण से स्वरूप निर्धारण में संशय होता है। प्रथम पूर्वपक्ष के रूप में श्रीशंकराचार्यजी के मत को रखा गया, जिसमें ब्रह्म को निर्विषय और उपासना को औपाधिक तथा अविद्याकल्पित कहा गया। द्वितीय पूर्वपक्ष शंकराचार्यजी के मत का खंडन करता है, यह तर्क देते हुए कि ऐसा करने पर समन्वय विरोध और उपासना की ब्रह्मविद्यात्वता नष्ट हो जाएगी। श्रुति आत्मा का अन्यथा निरूपण करने वाले की निंदा करती है, अतः उपासना को मिथ्या कहना श्रुति के अपने ही वाक्य से विरोधाभास है।
४
प्रश्नोत्तर — व्यास जी का निर्णय और उपासनाओं में भेद
१६:४० – ३७:२५ — प्रश्नोत्तर — व्यास जी का निर्णय और उपासनाओं में भेद
प्रश्नोत्तर — व्यास जी का निर्णय और उपासनाओं में भेद
एक प्रतिभागी ने रामकृष्ण आदि नामों का स्पष्ट उल्लेख करने वाली श्रुतियों और ज्योति, आकाश आदि संदिग्ध अर्थ वाले शब्दों पर व्यासजी के निर्णय के संबंध में प्रश्न किया। वक्ता ने स्पष्ट किया कि व्यासजी ने रामकृष्ण जैसे स्पष्ट नामों पर कोई निर्णय नहीं दिया, क्योंकि वहाँ संशय ही नहीं है, जबकि ज्योति, अन्न, आकाश जैसे शब्दों पर संशय बना रहता है। अन्य प्रतिभागियों ने उपासनाओं के भेद और ब्रह्म की प्राप्ति के मार्ग के बीच संबंधों को समझने के लिए प्रश्न किए।
५
उपासनाओं का परस्पर भेद और तारतम्य
३७:२५ – ५५:०३ — उपासनाओं का परस्पर भेद और तारतम्य
उपासनाओं का परस्पर भेद और तारतम्य
वक्ता ने स्पष्ट किया कि कर्म, ज्ञान और उपासना के मार्ग में फल के संदर्भ में तारतम्य होता है। महाप्रभुजी भी कर्म मार्ग को पूर्ण ब्रह्मविद्या नहीं मानते, ज्ञान मार्ग को अक्षर ब्रह्म तक सीमित मानते हैं, और शुद्ध भक्ति को ही परब्रह्मप्रापक मानते हैं। यह तारतम्य प्रत्येक आचार्य द्वारा स्वीकृत है। सभी आचार्य किसी एक मार्ग पर बल देते हुए अन्य को गौण मानते हैं। यदि उपासना ब्रह्मविद्या है भी, तो उसकी अपनी सीमाएँ हैं। इस प्रकार, ब्रह्म के गुणों या स्वरूप में उच्च-नीच भाव तो है ही, जिसके कारण विभिन्न जीवों को वह विभिन्न मात्रा में ग्रहित होता है। यह स्थिति ब्रह्म के स्वरूप के विषय में परस्पर संशय को बनाए रखती है।
६
सूत्रकार श्रीमहाप्रभुजी का विचार: ब्रह्म के विविध रूप ईश्वरार्थक
५५:०३ – १:१३:३१ — सूत्रकार श्रीमहाप्रभुजी का विचार: ब्रह्म के विविध रूप ईश्वरार्थक
सूत्रकार श्रीमहाप्रभुजी का विचार: ब्रह्म के विविध रूप ईश्वरार्थक
श्रीमहाप्रभुजी का सिद्धान्त यह है कि ब्रह्म के अन्न, ज्योति, आकाश, राम, कृष्ण, इंद्र, शंकर आदि विविध रूपों का वर्णन वेदांत शास्त्रों में जीवों की रुचि और अधिकार के अनुसार सरलता से उपासना करके ब्रह्मप्राप्ति हो सके, इसलिए किया गया है। ब्रह्म तो एक ही है। जैसे विधि वाक्य (जैसे अग्निष्टोमेन यजेत) समान होते हुए भी व्यक्ति अपने संकल्प के अनुसार भिन्न देवताओं का यजन कर सकता है, वैसे ही उपासनाएँ ब्रह्मत्व भाव से एक हैं, भले ही उनके रूप भिन्न हों। सभी उपासनाएँ साक्षात् या परम्परा भेद से मोक्षफल की ही वाचक हैं। सूत्र में प्रयुक्त 'आदि' पद इसी बात को सूचित करता है कि सभी विधाएँ ब्रह्म को ही लक्षित करती हैं।
७
प्रश्नोत्तर — गुणों में भेद और आश्रय में एकत्व
१:१३:३१ – १:२१:५५ — प्रश्नोत्तर — गुणों में भेद और आश्रय में एकत्व
प्रश्नोत्तर — गुणों में भेद और आश्रय में एकत्व
प्रतिभागियों ने फल भेद और मोक्ष के प्रकारों पर प्रश्न किए। वक्ता ने स्पष्ट किया कि यद्यपि ब्रह्म के विविध गुण हैं और साधना के आधार पर मोक्ष के प्रकार अलग-अलग हो सकते हैं, परंतु गुणों का आश्रय एक ही ब्रह्म है। प्रत्येक गुण अपने आप में पूर्ण होता है। रामकृष्ण परमहंस के तालाब के उदाहरण से वक्ता ने समझाया कि विभिन्न मार्गों से ब्रह्म को अप्रोच करने पर भी सभी का गंतव्य एक ही है। साधक जब अपनी साधना अवस्था में तद्विशिष्ट तत्व की बुद्धि रखता है कि भगवान के अनेक गुण होते हैं, तो उसके द्वारा प्राप्त फल पूर्ण होता है।
८
गुणों का संभार न्याय का परिचय
वक्ता ने बताया कि अगले सत्रों में गुणों का संभार न्याय (गुणोपसंहाराधिकरणम्) पर विस्तृत चर्चा होगी, जिससे इस विषय की अधिक स्पष्टता प्राप्त होगी। वर्तमान सत्र में केवल एक प्राथमिक निर्णय दिया गया है। वेद की शाखाओं के विभाजन और उनमें ब्रह्म के गुणों के विभिन्न वर्णन, तथा उससे उपासना में पूर्णता या अपूर्णता जैसे विषय आगे स्पष्ट किए जाएँगे, जिससे तीसरे अधिकरण की समाप्ति तक पूरा विषय स्पष्ट हो जाएगा।
📖 सार
📌 सार
• ब्रह्म के विविध गुणधर्मों के निरूपण से उसके स्वरूप निर्धारण में संशय होता है।
• शंकराचार्यजी ब्रह्म को निर्विषय मानते हैं और उपासना को अविद्याकल्पित कहते हैं।
• द्वितीय पूर्वपक्ष इस मत का खंडन करता है, क्योंकि यह श्रुति और व्यासाशय के विपरीत है।
• कर्म, ज्ञान और उपासना के मार्गों में फल के संदर्भ में तारतम्य अवश्यंभावी है।
• श्रीमहाप्रभुजी का सिद्धान्त है कि ब्रह्म के सभी विविध रूप ईश्वरार्थक हैं, जीवों की रुचि के अनुसार।
• सभी उपासनाएँ ब्रह्मत्व भाव से एक हैं और साक्षात् या परम्परा भेद से मोक्ष फल की ही वाचक हैं।
• ब्रह्म के गुणों में भेद होने पर भी, उनका आश्रय एक ही ब्रह्म है, जिससे साधना की पूर्णता पर मोक्ष प्राप्त होता है।