सूत्र १ (पाद ३, अधिकरण १) : ब्रह्म के सगुण-निर्गुण स्वरूप का समन्वय और संशय
सत्र के आरंभ में ब्रह्मसूत्र के तृतीय अध्याय के द्वितीय पाद के संपन्न होने की बात की जाती है, जहाँ श्री महाप्रभुजी ने ब्रह्म की सगुणता और निर्गुणता पर विचार किया। ब्रह्म के स्वरूप निर्धारण का महत्व विभिन्न मार्गों, जैसे कर्म, ज्ञान और उपासना या भक्ति, के लिए समझाया गया। तृतीय पाद में ब्रह्मगत धर्मों पर विचार प्रारंभ होता है, और गुणोपंहार अधिकरण की चर्चा शुरू होती है। वक्ता उदाहरणों के माध्यम से बताते हैं कि कैसे शास्त्रों में ब्रह्म के विविध गुण और रूप (अग्नि, प्राण, आकाश, अन्न, राम, कृष्ण, नरसिंह आदि) अलग-अलग वर्णित हैं, जिससे ब्रह्म के स्वरूप के निर्धारण में संशय उत्पन्न होता है और अनेक ब्रह्मों की आपत्ति आती है, जो 'एकमेवा द्वितीय ब्रह्म' जैसे श्रुति वाक्यों के विरुद्ध है। यह विषय पहले के सत्र में विस्तृत रूप से विचार किया गया था।
प्रश्नोत्तर : उपासना विषयों के ब्रह्मत्व पर पूर्व पक्ष
एक सहभागी द्वारा यह प्रश्न उठाया जाता है कि उपासना में अविर्भाव-तिरोभाव या अन्वय-व्यतिरेक से क्या भेद आता है, और इससे ब्रह्मत्व में क्या अस्पष्टता आती है। वक्ता स्पष्ट करती हैं कि यदि कोई भक्त एक रूप (जैसे राम) को परब्रह्म मानता है और दूसरे (जैसे शिव) में परब्रह्म नहीं देखता, तो अनेक ब्रह्मों की आपत्ति आती है, जिससे मोक्ष की सिद्धि नहीं होती। इस पर शंकराचार्यजी के पूर्व पक्ष को प्रस्तुत किया जाता है कि ब्रह्म निर्विषय है, उसे केवल ज्ञान से ही जाना जा सकता है। उपासना के जितने भी विषय हैं (अन्न, आकाश, राम, कृष्ण आदि), वे सभी औपादिक और अविद्या कल्पित हैं, अतः उनका अब्रह्मत्व मानना ठीक है। यह कहा गया कि शुद्ध ब्रह्म दुर्ज्ञेय होने के कारण शास्त्र ने हमारी सौकर्य के लिए उपाधि विशिष्ट रूपों का उल्लेख किया है, जिनकी उपासना से चित्त शुद्धि होती है, जिससे निर्विकल्पक समाधि में शुद्ध ब्रह्म का अनुभव होता है। इस प्रकार, श्रुति वाक्यों पर मिथ्यावादी होने का आक्षेप नहीं लगता।
प्रश्नोत्तर : श्रुति का मिथ्यात्व और ब्रह्म की अनुभूति
एक सहभागी द्वारा यह प्रश्न किया जाता है कि यदि अन्न ब्रह्म नहीं है, तो श्रुति उसे ब्रह्म क्यों कहती है, क्या यह श्रुति को मिथ्यावादी सिद्ध नहीं करता? वक्ता समझाती हैं कि श्रुति झूठ नहीं बोल रही है, वह हमारी परच्छिन्न बुद्धि के अनुरूप ब्रह्म के गुणों को औपाधिक रूप से बताती है, जैसे बच्चे को शेर का खिलौना दिखाकर शेर का परिचय करवाया जाता है। शंकराचार्यजी के मत में, उपासना मोक्षदायी नहीं है; यह केवल चित्त शुद्धि के लिए है, जिससे ज्ञान प्राप्ति की योग्यता आती है। निर्गुण ब्रह्म परक श्रुतियाँ ब्रह्म का निरूपण नहीं करतीं, बल्कि केवल उसकी ओर संकेत (हिंट) देती हैं, क्योंकि वाणी द्वारा ब्रह्म का निरूपण उसे स्वतः सगुण बना देगा। 'अहम ब्रह्मास्मि' जैसे महावाक्य भी पूर्ण ज्ञान नहीं हैं, क्योंकि उसमें 'अहं' और 'अस्मि' की निवृत्ति होकर केवल 'ब्रह्म' शेष रहता है। पुष्टिमार्ग में द्वैत भाव में ही परब्रह्म की पूर्ण अनुभूति बताई गई है, जहाँ भक्त और भगवान का व्यक्तिगत विषय होता है।
प्रश्नोत्तर : औपाधिक ज्ञान और पुष्टिमार्गीय मतभेद
वक्ता शेर के खिलौने के दृष्टांत को विस्तृत करती हैं कि चित्र का टाइगर मिथ्या होते हुए भी वास्तविक टाइगर का बोध करवाता है; इसी प्रकार, औपाधिक रूप से वर्णित ब्रह्म भी मिथ्या नहीं है, बल्कि वह उपासक को ब्रह्म का बोध कराता है। शंकराचार्यजी के मत में, नाम-रूप मिथ्या हैं क्योंकि शब्द क्षणिक और अनित्य होते हैं, परंतु वे बोध कराते हैं। इसके विपरीत, पुष्टिमार्ग में इस ब्रह्मांड में कुछ भी अनित्य या मिथ्या नहीं माना जाता, वस्तुतः भी नहीं और प्रातिभाषिक अनुभव भी नहीं। वक्ता इस बात पर बल देती हैं कि शंकराचार्य भाष्य को समझे बिना श्रीमहाप्रभुजी के भाष्य को समझना कठिन है, क्योंकि महाप्रभुजी की प्रत्येक पंक्ति शंकराचार्यजी के वाद की ओर इशारा करती है। सत्र का समापन अगले सत्र में द्वितीय पक्ष की चर्चा के साथ किया जाता है।