सूत्र १२: ब्रह्म के गुणों पर विचार और उपासना का स्वरूप
सत्र में श्रीमहाप्रभुजी द्वारा ब्रह्म के गुणवान और निर्गुण स्वरूप पर विचार किया गया। उपासना को मोक्षदायक प्रक्रिया बताते हुए, यह स्पष्ट किया गया कि उपासना कभी साक्षात फल देती है, तो कभी परंपराया क्रम मुक्ति प्रदान करती है। विभिन्न शाखाओं में ब्रह्म के स्वरूप का खंडित वर्णन प्राप्त होने पर, यह प्रश्न उपस्थित होता है कि अपूर्ण ज्ञान से मोक्ष कैसे सिद्ध होगा। श्रीमहाप्रभुजी ने स्पष्ट किया कि ब्रह्म एक ही है, और उपासना ब्रह्मविद्या नहीं है ऐसा सर्वथा नहीं कहा जा सकता। द्रव्य और देवता भेद से याग में भेद होने पर भी उपासना में तत्वतः परिवर्तन नहीं होता। गुणाधिक्य से उपासना का स्वरूप नहीं बदलता, अपितु गुणों का उपसंहार होता है। अवशिष्ट ब्रह्मत्व ही उपासना का विशेष विषय है, अर्थात ब्रह्म ही अन्न रूप हुआ है, अन्न ब्रह्म है, क्योंकि ब्रह्म उसका उपादान कारण है।
गुणोपसंहार पर पूर्वपक्ष और आचार्यजी का उत्तर
वक्ता ने बताया कि ओमकार जैसे एक वर्ण के संकेत को अनंत अर्थों में इनहेरिट किया जा सकता है, वैसे ही ब्रह्म के अनंत गुणों का उपसंहार अक्षरोपासना के प्रकरण में करना चाहिए। यदि ऐसा नहीं मानते तो शास्त्र के विस्तार का प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। उपासना मार्गीय व्यवस्था और भक्ति मार्गीय व्यवस्था में भेद स्पष्ट किया गया। पूर्वपक्षी ने संशय उठाया कि अग्निष्टोम के उद्देश्य से तैतरी और वाजसनेय यज्ञों में बतलाए गए धर्म समान होने पर भी शिष्टाचार के विरुद्ध उपसंहार नहीं किया जाता। इसी प्रकार पंचाग्नि विद्या में षष्ठाग्नि का उपसंहार नहीं होता, और आथर्वणिक धर्मों का अन्य शाखाओं में उपसंहार नहीं किया जा सकता। यह दर्शाता है कि गुणों का उपसंहार हर जगह संभव नहीं है।
सूत्र १३: स्वाध्याय, समाचार और अधिकारी भेद का नियम
श्रीमहाप्रभुजी ने 'स्वाध्यायस्य तथान समाचार अधिकारात चव नियम' सूत्र का निरूपण किया। इसमें स्पष्ट किया गया कि वेद का स्वाध्याय अपनी शाखा के अनुसार होता है, और एक ही कर्म को शाखा के भेद से भिन्न-भिन्न प्रकार से बतलाया जाता है। विधिपूर्वक किए गए यज्ञों में अंगों के आचरण में थोड़ी भी घटबड़ नहीं होती। उपर्युक्त उपासना व्यवस्था के अनुसार क्या उनके धर्मों का उपसंहार संभव है, इस प्रश्न का उत्तर 'अधिकारभेदात' से दिया गया। प्रत्येक शाखा का अपने शाखोक्त धर्म में ही अधिकार रहता है, परशाखा में नहीं। ऐसा करना अपराध माना जाता है, क्योंकि उच्चारण, द्रव्य और कर्म में भेद होता है। यदि अपनी शाखा से भिन्न कार्य किया जाए तो प्रायश्चित्त की व्यवस्था है, पर कुछ वैकल्पिक स्थितियों में शास्त्र अनुमति देता है, जैसे अनाथ बालक या बहुशाखाध्यायी के लिए। ऐसे में उपसंहार संभव है। उदाहरण के रूप में, अथर्वणिक में वर्णित शतौदन होम अन्य शाखाओं में नहीं मिलता।
प्रश्नोत्तर — यज्ञ, अग्निहोत्र और परंपरा
इस खंड में प्रतिभागियों द्वारा विभिन्न प्रश्नों का समाधान किया गया। मुख्य रूप से यह चर्चा की गई कि दक्षिण भारत में याग और अग्निहोत्र जैसे कर्मों का प्रचलन आज भी अधिक है। वक्ता ने स्पष्ट किया कि अग्निहोत्र अनिवार्य धर्म है, संप्रदाय से इसका कोई संबंध नहीं है। श्रीमहाप्रभुजी और श्रीगुसाईंजी ने भी इसे धारण किया था। दीक्षित पद अग्निहोत्री श्रौ अग्नि से दीक्षित लोगों के लिए प्रयुक्त होता है। यह भी बताया गया कि श्रौ अग्नि को आजीवन प्रज्वलित रखा जाता है, जबकि स्मार्थ अग्नि में आवाहन-विसर्जन होता है, जिससे यह अधिक सरल हो जाती है। देश-काल-द्रव्य के भेद से भी कर्मों में भिन्नता आती है, जैसे गंगा-यमुना के मध्य की भूमि कर्मों के लिए सर्वोत्तम मानी गई है। दक्षिण भारतीय परंपराओं में भी अपने आचार भेद होते हैं।