ब्रह्म के धर्मों का समन्वय और गुणों का संहार न्याय
वक्ता ने कल के सत्र के विषय को उठाते हुए बताया कि श्रीमहाप्रभुजी ने ‘गुणोपसंहार न्याय’ को अनुसरण करते हुए ब्रह्म के धर्मों का समन्वय कैसे किया है। इसमें कर्म, ज्ञान और उपासना तीनों मार्गों की परंपराओं में भगवद्धर्मों का समन्वय किया जाता है। व्यक्ति अपनी रुचि और अधिकार के अनुसार किसी भी संप्रदाय या मार्ग का अनुयायी बनता है, परंतु ब्रह्म के धर्मों का समन्वय शास्त्र के निर्देशानुसार ही करना चाहिए, अपनी स्वतंत्र इच्छा से नहीं। ब्रह्म के निरूपण में बताए गए अवतार आदि धर्मों को शुद्ध ब्रह्म मानना उचित नहीं है, क्योंकि शास्त्र ने जहाँ-जहाँ ब्रह्म के स्वरूप का वर्णन किया है, उन्हीं धर्मों का स्वीकार ब्रह्म के अवतार रूपों में किया जा सकता है।
न्याय प्रक्रिया द्वारा ब्रह्म की अनन्य सत्ता का निरूपण
वक्ता ने न्याय दर्शन की प्रक्रियाओं, जैसे ‘अन्योन्याभाव’ और ‘अत्यंताभाव’, के माध्यम से ब्रह्म की अनन्य सत्ता को समझाया। ‘अन्योन्याभाव’ का अर्थ है कि एक वस्तु (घट) दूसरी वस्तु (पट) नहीं है, प्रत्येक वस्तु का अपना स्वतंत्र स्वरूप होता है। ‘अनंत भाव प्रतियोगी’ का तात्पर्य है कि एक वस्तु अपने से अतिरिक्त सभी वस्तुओं में अभाव रखती है। ‘अत्यंताभाव’ असत वस्तु का होता है, जैसे ‘शशृंग’ (खरगोश के सींग), जिसका न भाव है न अभाव। ब्रह्म की ‘नित्य सत्ता’ होने के कारण उसका कभी ‘प्रागभाव’ या ‘प्रद्वंसाभाव’ नहीं होता, जिससे उसका ‘धर्मी रूप’ अत्यंत विशिष्ट और अनन्य सिद्ध होता है। तैत्तिरीय उपनिषद के प्रमाण से ब्रह्म के समान कोई नहीं है, वह सबसे महान है, यह बात स्पष्ट की गई।
ब्रह्म के अन्योन्याभाव और अत्यंताभाव का स्पष्टीकरण
एक प्रतिभागी के प्रश्न पर वक्ता ने ‘घटाभाव’ के ‘प्रतियोगी’ (घट) और ‘अत्यंताभाव’ (असत वस्तु) के बीच का अंतर स्पष्ट किया। ‘अभाव’ का ‘प्रतियोगी’ ‘भाव’ होता है। ‘अत्यंताभाव’ उस वस्तु का होता है जिसकी सर्वथा उपलब्धि नहीं हो सकती, जैसे ‘ख पुष्प’ (आकाश कुसुम)। ब्रह्म का ‘प्रागभाव’ कभी था ही नहीं, इसलिए वह ‘नित्य तत्व’ है और उसके लिए ‘है’ बोलना भी अयुक्त है, क्योंकि ‘है’ बोलने से ‘अभाव प्रतियोगी’ का भाव होता है। ब्रह्म के धर्मी रूप का सर्वत्र अभाव नहीं है, अपितु उसके प्रकट हुए धर्मों में भी ब्रह्म के धर्मी रूप का ‘अन्योन्याभाव’ रहता है। इसे ‘व्यतिरेक’ से समझना चाहिए कि धर्म, धर्मी नहीं होते।
पुरुष आदि विग्रहों को शुद्ध ब्रह्म मानने का खंडन
वक्ता ने स्पष्ट किया कि ‘पुरुष’ आदि रूप विग्रहों को ‘शुद्ध ब्रह्म’ मानना आपत्तिजनक है, जैसा कि शंकराचार्य जी जीव और ब्रह्म की एकता मानते हैं। पुष्टिमार्ग में यह स्पष्ट किया जाता है कि समष्टि चैतन्य रूप पुरुष को शुद्ध ब्रह्म नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह ब्रह्म का धर्म है, धर्मी नहीं। न्याय के सिद्धांत के अनुसार, ईश्वर की ‘ईश्वरत्व जाति’ नहीं होती, क्योंकि जाति समान धर्मत्व वाली अनेक वस्तुओं में होती है, जबकि ईश्वर एक एवं अद्वितीय है। ब्रह्म उपादान कारण होने पर भी, धर्मी जब अपने अंदर से धर्म को प्रकट करता है, तो धर्मी का ‘धर्मित्व’ धर्मी के अतिरिक्त कहीं प्राप्त नहीं होता। ब्रह्म के धर्म हमारे अंदर नहीं आते, जबकि हमारे धर्म ब्रह्म में हैं, जिससे अन्वय और व्यतिरेक की सिद्धि नहीं होती, अतः ईश्वर एक स्वतंत्र तत्व सिद्ध होता है।
उपासनाओं की ब्रह्म विज्ञान फलकता पर विचार
श्रीमहाप्रभुजी के अनुसार, श्रुति में वर्णित सभी उपासनाएँ (जैसे प्राणोपासना) ब्रह्म विज्ञान की साधनिका हैं। ये विज्ञान को उत्पन्न करने में प्रयोजक हैं। पूर्व-पक्षी ने प्रश्न किया कि यदि ब्रह्म विज्ञान ही लक्ष्य है, तो अलग-अलग शाखाओं में ब्रह्म के न्यून या अधिक गुणों का निरूपण क्यों किया गया है, और इससे पूर्ण ‘गुणोपसंहार’ कैसे होगा? यदि केवल न्यून गुणों का निरूपण किया जाए, तो उपसंहार किसका होगा? महाप्रभुजी इसका उत्तर देते हैं कि श्रुतियाँ स्वेच्छा से गुणों का बखान नहीं करतीं। उपासनाएँ ब्रह्म विज्ञान फलक होने के कारण एक जातीय हैं, और उनमें सभी साधनों की पूर्ति करने की क्षमता विद्यमान है। श्रुति का कार्य उसी रूप में निरूपण करना है।
शाखा भेद और ब्रह्म ज्ञान का समन्वय
महाप्रभुजी ने स्पष्ट किया कि सभी शाखाओं का अध्ययन करके ब्रह्म के संपूर्ण स्वरूप का विज्ञान प्राप्त करना कठिन है, क्योंकि इससे शाखा विभाग का कोई प्रयोजन नहीं रह जाएगा। एक शाखा के ज्ञान से दूसरी शाखा के गुणों का उपसंहार असंभव है, इसलिए उपासना भी असंभव होगी। उन्होंने निर्णय दिया कि अपनी शाखा में बतलाई गई उपासना के प्रकार के अनुसार की गई उपासना में ही सबका अधिकार है, और उसी से ब्रह्म ज्ञान भी संभव है। अग्निष्टोम के उदाहरण से समझाया कि वाद स्नेही और तैत्तरीय आदि शाखाओं में समान फल (स्वर्ग) देने वाला अग्निष्टोम बताया गया है, परंतु उपास्य ब्रह्म एक ही है। पृथ्वी में रूप, रस, गंध आदि की संवेदनाओं के समान, ब्रह्म में अनंत धर्म विद्यमान हैं, और व्यक्ति को उनका अनुभव भिन्न-भिन्न प्रकार से होता है। यह श्रुति वचन 'परमात्मा की अनेक शक्तियाँ सुनी जाती हैं, स्वाभाविक ही ज्ञान, बल, क्रिया च' से सिद्ध होता है, जहाँ ‘स्वाभाविकी’ पद ‘अविद्या कल्पित’ शक्तियों का निरस्त करता है।
प्रश्नोत्तर — ब्रह्म के गुणों का आंशिक ज्ञान और शाखीय उपासना
एक प्रतिभागी ने हाथी और अंधों के दृष्टान्त से प्रश्न किया कि यदि ब्रह्म का एक गुण भी सही ढंग से समझ में आ रहा है, तो वह ब्रह्म का ही ज्ञान है। वक्ता ने इस बात को पुष्ट किया कि इसे ही ‘गुणोपसंहार’ कहा जा रहा है, क्योंकि अनंत को जानने की आवश्यकता नहीं है। रुचि और अधिकार के अनुसार जो ज्ञान प्राप्त हो रहा है, वह अंततः भगवान का ही अंश है। महाप्रभुजी इस बात का खंडन करते हैं कि संपूर्ण वेद का अवगाहन करने पर ही ब्रह्म विज्ञान होगा, क्योंकि इससे शाखा विभाग का प्रयोजन नष्ट हो जाएगा और जीव के लिए यह संभव भी नहीं है। यदि एक शाखा की उपासना से ब्रह्म ज्ञान नहीं होता, तो श्रुतियों द्वारा वर्णित उपासनाएँ और उनके फल व्यर्थ सिद्ध होंगे, जो श्रुति पर झूठ बोलने का आक्षेप होगा। इसलिए ‘गुणोपसंहार’ करना आवश्यक है।
प्रश्नोत्तर — पुष्टिमार्गीय भेद बनाम अद्वैत मत
प्रतिभागी ने शंकराचार्य जी के अद्वैत मत के संदर्भ में प्रश्न किया। वक्ता ने स्पष्ट किया कि शंकराचार्य जी के लिए जीव और ब्रह्म का भेद औपाधिक है, असत्य है। उनके मत में ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ या ‘तत्त्वमसि’ का बोध प्राप्त करना ही पर्याप्त है, क्योंकि जीव स्वतः ही पूर्ण ब्रह्म है। इसके विपरीत, पुष्टिमार्ग में जीव को उत्पत्ति के समय आनंद गुणधर्म के तिरोभाव के कारण अपूर्ण एंटिटी माना जाता है, जबकि ब्रह्म पूर्ण एंटिटी है। अतः पुष्टिमार्ग में जीव ब्रह्म से व्यतिरिक्त किसी तत्व का बोध प्राप्त करना चाहता है, जबकि अद्वैत मत में यह ‘एक्सपेक्टेशन’ ही नहीं है। यही कारण है कि शंकराचार्य जी ‘गुणोपसंहार न्याय’ को गुणों का निषेध करके शुद्ध ब्रह्म को जानने के लिए व्याख्यायित करते हैं, जबकि महाप्रभुजी ब्रह्म की स्वाभाविक शक्तियों को स्वीकार करते हैं।