॥ ब्रह्मसूत्राणुभाष्य-३/३ ॥

श्रीवल्लभाचार्य विद्यापीठ, हालोल — नित्य पुष्टिस्वाध्याय
📅 11 August 2026
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परिचय एवं सन्दर्भ

यह सत्र श्रीमहाप्रभुजी के ब्रह्मसूत्राणुभाष्य के तृतीय पाद के तृतीय अधिकरण के अंतर्गत ब्रह्म के धर्मों के समन्वय विषय पर आधारित है। इसमें गुणोपसंहार न्याय को अनुसरण करते हुए ब्रह्म के स्वरूप की अनन्यता, न्याय-प्रक्रिया के अन्योन्याभाव और अत्यंताभाव की अवधारणा का विवेचन किया गया है। वक्ता ने उपासनाओं को ब्रह्म विज्ञान की साधनिका के रूप में निरूपित करते हुए ब्रह्म की अनंत और स्वाभाविक शक्तियों पर गहन चर्चा की है।

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पाद ३, अधिकरण ३ — गुणोपसंहार न्याय और ब्रह्म के धर्मों का समन्वय
००:०४ – २४:१९ — पाद ३, अधिकरण ३ — गुणोपसंहार न्याय और ब्रह्म के धर्मों का समन्वय
पाद ३, अधिकरण ३ : गुणोपसंहार न्याय और ब्रह्म के धर्मों का समन्वय
वक्ता ने कल के सत्र के संदर्भ में गुणोपसंहार न्याय को अनुसरण करते हुए श्रीमहाप्रभुजी द्वारा ब्रह्म के धर्मों के समन्वय के विषय को पुनः प्रस्तुत किया। इसमें कर्म, ज्ञान और उपासना तीनों मार्गों की परंपराओं के संदर्भ में गुणों का भगवद्धर्मों के साथ समन्वय करने की बात कही गई, परन्तु यह रुचि और अधिकार अनुसार ही संभव है, स्वतंत्र इच्छा से नहीं। ब्रह्म के पुरुष आदि रूप विग्रहों को शुद्ध ब्रह्म मानने का खंडन किया गया, क्योंकि शास्त्र के अनुसार ही समन्वय संभव है। वक्ता ने न्याय की प्रक्रिया में अन्योन्याभाव और अत्यंताभाव के उदाहरणों से समझाया कि कैसे एक वस्तु अपने से अतिरिक्त अन्य वस्तु के रूप में नहीं हो सकती। ब्रह्म की अनन्यता को सिद्ध करते हुए बताया कि उसका सर्वत्र अभाव है, अर्थात वह अवतरित होने पर भी अपने मूल धर्मी स्वरूप के समान नहीं हो सकता। तैतरीय उपनिषद के प्रमाण से ब्रह्म की महानता और अद्वितीयता को स्थापित किया गया।
मुक्ति की अवस्था में जीवात्मा में आनंद गुणधर्म प्रकट होने पर भी वह धर्मी का आनंद नहीं हो सकता, सदा धर्म का ही आनंद रहेगा। ब्रह्म की यह एक्सक्लूसिविटी अन्योन्याभाव और अत्यंताभाव के समान है। यज्ञ रूप हरि या गेय रूप धर्मी नहीं हैं, केवल अवतारी पुरुष ही धर्मी हैं।
अभाव रूप प्रतियोगी का अन्योन्याभाव अत्यंताभाव रूप होता है, क्योंकि जो वस्तु कभी भावित ही नहीं हो सकती, उसका कभी अभाव भी नहीं हो सकता। जैसे सींगों वाला खरगोश या ख पुष्प। अत्यंताभाव असत वस्तु का होता है, सत द्रव्य का नहीं। ब्रह्म की नित्य सत्ता है, उसका अभाव असंभव है।
ब्रह्म के धर्मी रूपत्व का अन्योन्याभाव व्यतिरेक की दृष्टि से बनता है। ब्रह्म उपादान कारण होने से सर्वत्र विद्यमान है, परंतु न्याय में भाव और अभाव 100% होते हैं, आनुपातिक नहीं, क्योंकि आविर्भाव-तिरोभाव का स्वीकार नहीं किया जाता।
कोई व्यक्ति पुरुष आदि रूप विग्रहों को शुद्ध ब्रह्म मान ले, जैसा शंकराचार्य जी जीव और ब्रह्म की एकता कहते हैं, तो यह आपत्तिजनक है, क्योंकि वह उसका धर्म है, धर्मी नहीं। न्याय में ईश्वर तत्व की जाति नहीं होती, क्योंकि वह एक एवं है और उसका एक्सक्लूसिव कैरेक्टर है। धर्मी में धर्मित्व धर्मी के अतिरिक्त कहीं प्राप्त नहीं होता। ब्रह्म के धर्म जीव में आए हैं, परंतु जीव के धर्म ब्रह्म में नहीं हैं, इसलिए अन्वय और व्यतिरेक की सिद्धि नहीं होती। ब्रह्म एक स्वतंत्र तत्व है और वह सर्वव्यापी नहीं है, अतः उसका अन्योन्याभाव कहीं हो ही नहीं सकता।
अभाव प्रयोजन रहित होता है, जैसे घड़े का फूटना या शशृंग का अत्यंताभाव। इसी प्रकार, धर्मी की आधार मान्यता भी ऐसी ही है — ईश्वर का अभाव क्यों नहीं और भाव ही क्यों, यह अनुत्तरित प्रश्न है।
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प्रश्नोत्तर — अन्योन्याभाव एवं अत्यंताभाव का स्पष्टीकरण
२४:२१ – ४१:३९ — प्रश्नोत्तर — अन्योन्याभाव एवं अत्यंताभाव का स्पष्टीकरण
प्रश्नोत्तर : अन्योन्याभाव एवं अत्यंताभाव का स्पष्टीकरण
चर्चा: प्रतियोगी, अन्योन्याभाव और अत्यंताभाव के गूढ़ अर्थों पर प्रश्न पूछे गए। वक्ता ने स्पष्ट किया कि घटाभाव का प्रतियोगी घट स्वयं है, और अभाव का प्रतियोगी भाव होता है। अत्यंत अभाव नॉन-एग्ज़िस्टेंट ऑब्जेक्ट का होता है, जैसे 'शशृंग'। ब्रह्म का अभाव संभव नहीं, क्योंकि वह नित्य तत्व है। वक्ता ने समझाया कि 'है' कहने से अभाव प्रतियोगी भाव होता है, जो ब्रह्म के संदर्भ में अनुपयुक्त है क्योंकि ब्रह्म का प्राग्भाव कभी था ही नहीं।
वक्ता: यह निरूपण उन लोगों के लिए है जो पुरुष आदि विग्रहों को शुद्ध ब्रह्म मानते हैं। न्याय में ईश्वर तत्व की जाति का स्वीकार नहीं किया गया है, क्योंकि जाति दस वस्तुओं में समान धर्मत्व की प्राप्ति से बनती है, जबकि ईश्वर एक एवं है। ब्रह्म में धर्मित्व धर्मी के अतिरिक्त कहीं प्राप्त नहीं होता। ब्रह्म के धर्म जीव में आए हैं, पर ब्रह्म के धर्म जीव में नहीं, जिससे अन्वय और व्यतिरेक की सिद्धि नहीं होती। ईश्वर एक स्वतंत्र तत्व है जिसकी जाति नहीं होती, और वह एक्सक्लूसिव कैरेक्टरिस्टिक वाला है।
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पाद ३, अधिकरण ३ — उपासनाएँ ब्रह्म विज्ञान की हेतु
४१:४१ – १:०३:५३ — पाद ३, अधिकरण ३ — उपासनाएँ ब्रह्म विज्ञान की हेतु
पाद ३, अधिकरण ३ : उपासनाएँ ब्रह्म विज्ञान की हेतु
वक्ता ने बताया कि श्रुति में सभी उपासनाओं को ब्रह्म विज्ञान की साधनिका के रूप में निरूपित किया गया है। ये उपासनाएँ विज्ञान की हेतु हैं, अर्थात विज्ञान को उत्पन्न करवाने में प्रयोजक हैं। पूर्वपक्षी ने यह प्रश्न उठाया कि यदि ब्रह्म विज्ञान फलक है, तो विभिन्न शाखाओं में न्यून अधिक गुणों का निरूपण क्यों किया गया, जिससे पूर्ण विज्ञान कैसे प्राप्त होगा? यदि आधे गुण निरूपित हुए हैं, तो उपसंहार किसका होगा? महाप्रभुजी ने इसका उत्तर दिया कि श्रुतियां स्वेच्छा से गुणों का बखान नहीं करतीं। उपासनाएँ जब ब्रह्म विज्ञान फलक हैं, तो वे सब एक जातीय हैं, और उनमें सभी साधनों की पूर्ति करने की क्षमता विद्यमान है। श्रुति को उनका इसी रूप में निरूपण करना चाहिए।
पूर्वपक्षी का पुनः संशय कि 'नामोक्त उपासीत' अर्थात जितना नामोल्लेख किया गया है, उतनी ही उपासना करनी है। गुणों के आक्षिप्त रूप का वर्णन नहीं किया जाता। प्राणोपासना का उदाहरण देते हुए बताया कि प्राण में ब्रह्म की पालन शक्ति के गुण का उपसंहार करके उपासना की जाती है, परंतु व्यष्टि प्राणों की संकुचित सामर्थ्य से ब्रह्म की अनंत पालन शक्ति का अनुमान टेक्निकली संभव नहीं है। श्रुति कहती है कि 'गुणानोपसंहार्यन', अर्थात जितने गुण कहे गए हैं, उतने मात्र से ब्रह्म के गुणों का उपसंहार नहीं किया जा सकता। यदि ऐसा मान लें कि ब्रह्म उतना ही है जितना प्राण में उपसंहार किया, तो शास्त्र इसका खंडन करेगा।
महाप्रभुजी इस समस्या का समाधान करते हुए कहते हैं कि केवल अपनी शाखाओं के पाठ करने वालों की उपासना की सिद्धि के लिए समस्त शाखाओं में उपासना प्रकार का वर्णन किया गया है, ऐसा कहना कठिन है। ब्रह्म के संपूर्ण स्वरूप का विज्ञान प्राप्त करने के लिए सभी शाखाओं का अध्ययन करना होगा, ऐसा मानने से शाखा विभाग का कोई प्रयोजन नहीं रह जाता। दूसरे की शाखा के ज्ञान से गुणों के उपसंहार का ज्ञान असंभव है, इसलिए उपासना भी असंभव हो जाएगी। अतः, अपनी शाखा में बतलाई गई उपासना के प्रकार के अनुसार की गई उपासना में ही सबका अधिकार है, और उसी से ब्रह्म ज्ञान भी संभव है। ऐसा न मानने से अव्यवस्था होती है।
वासस्नेही और तैतरीय आदि में अग्निष्टोम के समान, समस्त उपासनाओं में एकमात्र उपास्य ब्रह्म ही है। उपासनाओं के विज्ञान ब्रह्म विज्ञान ही हैं। पृथ्वी में रूप, रस, गंध आदि की संवेदनाओं के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार का ज्ञान होता है, एक को जैसा ज्ञान होता है, दूसरे को वैसा नहीं, पर सभी पृथ्वी के ही गुणधर्म हैं। इससे निश्चित होता है कि ब्रह्म में अनंत धर्म विद्यमान हैं। श्रुति कहती हैं, 'परमात्मा की अनेक शक्तियां सुनी जाती हैं, स्वाभाविकी ज्ञान बल क्रिया आदि'। इसमें 'स्वाभाविकी' कहकर अविद्या कल्पित शक्तियों को निरस्त किया गया है। ब्रह्म की शक्तियां इनबिल्ट हैं, औपाधिक नहीं, जैसा शंकराचार्य जी ब्रह्म को निर्गुण मानकर शक्तियों को औपाधिक कहते हैं।
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प्रश्नोत्तर — ब्रह्म की स्वाभाविक शक्तियाँ और अद्वैत मत से भिन्नता
१:०३:५४ – १:२२:३६ — प्रश्नोत्तर — ब्रह्म की स्वाभाविक शक्तियाँ और अद्वैत मत से भिन्नता
प्रश्नोत्तर : ब्रह्म की स्वाभाविक शक्तियाँ और अद्वैत मत से भिन्नता
चर्चा: एक प्रतिभागी ने हाथी के उदाहरण से प्रश्न उठाया कि यदि ब्रह्म का एक गुण भी समझ में आ जाए तो क्या वह पर्याप्त है? वक्ता ने पुष्टि की कि इसे ही गुणोंपसंहारन कहते हैं, और रुचि तथा अधिकार के अनुसार जो मिल रहा है, वह अंततः भगवान का ही अंश है। महाप्रभुजी का प्रतिउत्तर है कि यदि ऐसा नहीं है, तो हमें अनंत शाखाओं का अध्ययन करना होगा, जिससे शाखा विभाग का प्रयोजन ही समाप्त हो जाता है। यदि एक शाखा से ब्रह्म विज्ञान नहीं होता, तो श्रुति द्वारा बताए गए फल व्यर्थ हो जाएंगे, और श्रुति पर झूठ बोलने का आक्षेप होगा। अतः, गुणों का उपसंहार करना आवश्यक है।
वक्ता: शंकराचार्य जी के मत में जीव और ब्रह्म का भेद औपाधिक है, सत्य नहीं। उनके अनुसार, जीव स्वयं ब्रह्म ही है और उसे केवल इस बात का बोध नहीं है। ज्ञान प्राप्ति का अर्थ नया कुछ प्राप्त करना नहीं, बल्कि स्मृति है, उसे याद दिलाना है। इसलिए अद्वैत मत में पूर्णता और अपूर्णता की समस्या नहीं है, क्योंकि जीव बाय डिफॉल्ट पूर्ण ही है। पुष्टिमार्ग में हम मानते हैं कि उत्पत्ति के समय जीव से आनंद गुणधर्म का तिरोभाव कर लिया गया है, इसलिए जीव अपूर्ण एंटिटी है और ब्रह्म पूर्ण है, और हमें ब्रह्म की पूर्णता प्राप्त करनी है। यह अद्वैत से भिन्नता है।
शंकराचार्य जी गुणोंपसंहार न्याय की व्याख्या में कहते हैं कि प्रातिभासिक, व्यावहारिक और पारमार्थिक सत्ताओं का जो भेद प्रतीत होता है, उसमें औपाधिक गुणों का उपसंहार करके और निषेध वृत्ति से शुद्ध ब्रह्म को जानना चाहिए। गुणों का संहार तब तक करना है जब तक ब्रह्म समझ में न आए, शाखा अरुंधति न्याय से। जिस दिन समझ में आ जाएगा, उस दिन उनका उपसंहार का निषेध करके शुद्ध ब्रह्म का ज्ञान हो जाएगा। यह शंकराचार्य जी का मत है, जिससे महाप्रभुजी भिन्न रूप से व्याख्या कर रहे हैं।
📖 सार
📌 सार
• श्रीमहाप्रभुजी ने गुणोपसंहार न्याय के अनुसार ब्रह्म के धर्मों का समन्वय कर्म, ज्ञान और उपासना मार्गों में करने की बात कही, जो रुचि और अधिकारानुसार ही संभव है।
• न्याय की प्रक्रिया के अन्योन्याभाव और अत्यंताभाव से ब्रह्म के स्वरूप की अनन्यता को स्पष्ट किया गया, जहाँ ब्रह्म अवतरित होने पर भी अपने मूल धर्मी स्वरूप से भिन्न है।
• मुक्ति की अवस्था में जीवात्मा में आनंद गुणधर्म प्रकट होने पर भी वह सदा धर्म का ही आनंद रहेगा, धर्मी का नहीं, जो ब्रह्म की एक्सक्लूसिविटी दर्शाता है।
• श्रुति में सभी उपासनाओं को ब्रह्म विज्ञान की साधनिका के रूप में बताया गया है, जो न्यून अधिक गुणों के निरूपण के बावजूद ब्रह्म विज्ञान रूपी फल को उत्पन्न करती हैं।
• अपनी शाखा में बतलाई गई उपासना ही ब्रह्म ज्ञान की सिद्धि के लिए पर्याप्त है, क्योंकि सभी शाखाओं का अध्ययन असंभव है और शाखा विभाग का अपना प्रयोजन है।
• ब्रह्म में अनंत स्वाभाविक धर्म विद्यमान हैं; 'स्वाभाविकी' पद अविद्या कल्पित शक्तियों का खंडन करता है, जिससे ब्रह्म की शक्तियाँ इनबिल्ट सिद्ध होती हैं।
• शंकराचार्य जी के अद्वैत मत से भिन्न, पुष्टिमार्ग में जीव को अपूर्ण एंटिटी और ब्रह्म को पूर्ण माना जाता है, जहाँ जीव को ब्रह्म की पूर्णता प्राप्त करनी होती है।