मंगलाचरण
यह खंड मंगलाचरण के लिए आरक्षित है, जिसमें सत्र के आरम्भ में परंपरागत वंदना की गई है।
सूत्र ११ — गुणोपसंहार न्याय का परिचय और ब्रह्म की स्वतंत्र सत्ता
श्रीमहाप्रभुजी ने गुणोपसंहार न्याय के अंतर्गत शास्त्र के शाखा विभाग, कर्म, ज्ञान तथा उपासना की तीनों विधाओं में भगवान के गुणों के निरूपण और उनके मूल स्वरूप के साथ समन्वय को स्पष्ट किया। पूर्व पक्ष से प्रश्न उठा कि शाखाओं में ब्रह्म के धर्मों का निरूपण कम है, तो पूर्ण ज्ञान कैसे होगा। इस पर वक्ता ने ब्रह्म की सर्वतंत्र स्वतंत्र सत्ता और उसकी अनंत शक्तियों का वर्णन किया, जो स्वाभाविक ही सिद्ध होती हैं।
सूत्र ११ — अथर्वणिक और शिरोव्रत विद्या का समन्वय
अथर्वणिक विद्या और शिरोव्रत विद्या को परस्पर अपेक्षित मानकर कर्म भेद की आशंका पर सूत्रकार का मत प्रस्तुत किया गया। सूत्रकार कहते हैं कि उक्त विद्या के धर्म केवल स्वाध्याय वेद पाठ मात्र के हैं, वहाँ कर्मभेद नहीं है। 'नैत चीर्ण व्रतोधीत' वाक्य में 'एतत' शब्द का एकवचन में प्रयोग और अध्ययन परंपरा यह सिद्ध करती है कि सभी विद्याएँ एक हैं। महाप्रभुजी के अनुसार, यह विद्या धर्म रूप नहीं है, बल्कि विद्या अभेदकता को स्थापित करने के लिए है, जहाँ ज्ञान और क्रिया का परस्पर समन्वय होता है।
सूत्र ११ — अथर्वणोपनिषद में अवतारों की श्रेष्ठता
अथर्वणोपनिषद के प्रसंग में कमलनाभि के अवतारों में श्रेष्ठ अवतार की चर्चा की गई, जहाँ श्रीकृष्ण को पूर्ण अवतार बताया गया। इस पर ब्रह्म के निरवयव होने पर भी अंशी-अंश भाव के औचित्य पर प्रश्न उठा। इसका समाधान देते हुए बताया गया कि भगवान अप्राकृत होते हुए भी शुद्ध सत्व प्रधान होने के कारण सभी भगवत् धर्मों से संपन्न हैं, और उनके सहस्त्र शीर्ष, नेत्र, हस्त, चरण आदि सभी अप्राकृत अवयव नित्य हैं। भगवान जिस रूप में कार्य करना चाहते हैं, उसी में अग्नि के समान आविर्भूत होते हैं।
प्रश्नोत्तर — गुणोपसंहार की भिन्न प्रक्रियाएँ और कर्म-ज्ञान समन्वय
प्रतिभागियों द्वारा गुणोपसंहार की भिन्न प्रक्रियाओं, कर्म और ज्ञान के परस्पर पूरक संबंध, तथा अवतारों में तारतम्य के संदर्भ में प्रश्न पूछे गए। वक्ता ने स्पष्ट किया कि विद्या केवल बुद्धिस्त करने के लिए नहीं होती, बल्कि उसका क्रिया रूप में अनुष्ठान भी होता है। मीमांसक ज्ञान को अर्थवाद मानते हैं और ज्ञानमार्गी कर्म को, परन्तु महाप्रभुजी दोनों के परस्पर पूरक होने को सिद्ध करते हैं। उन्होंने जनक राजा का उदाहरण दिया जो ब्रह्मविद्या से संपन्न होकर भी कर्मपरायण थे, यह दर्शाते हुए कि अध्यास निवृत्त होने पर भी निष्कर्म्यता का नियम नहीं है।
प्रश्नोत्तर — अवतारों में तारतम्य और शुद्ध सत्व का अधिष्ठान
मयूर जी द्वारा अवतारों में स्वरूप तारतम्य के बजाय कार्य तारतम्य और शुद्ध सत्व के अधिष्ठान पर विशेष स्पष्टीकरण मांगा गया। वक्ता ने समझाया कि अंशावतारों में भगवान शुद्ध सत्व से निर्मित देह में प्रविष्ट होते हैं, जबकि पूर्णावतार स्वयं प्रकट होते हैं। भक्तोद्धार जैसे स्वभावानुपाती कार्य में भगवान अपनी समस्त शक्तियों को उद्घाटित करते हैं। भगवान की बाल्य लीला और पौगंड लीला जैसी सभी अवस्थाएँ नित्य हैं, उनमें प्राकृत शरीर जैसा भेद नहीं होता। सत्र का समापन समय की कमी के कारण हुआ।