गुणों का संहार न्याय और अवतार विग्रहों का समन्वय
वक्ता ने गुणों के संहार न्याय के अंतर्गत ब्रह्म के गुणों के समन्वय के विषय को प्रस्तुत किया। कर्म, ज्ञान और उपासना की तीनों प्रक्रियाओं में श्रीमहाप्रभुजी द्वारा किए गए समय के निरूपण को स्पष्ट किया गया। यह बताया गया कि अवतार विग्रहों में यह प्रक्रिया कैसे होती है और भगवान विभिन्न स्वरूपों व अवतारों में अपने गुणों का समन्वय अलग-अलग प्रकार से करते हैं। परब्रह्म श्रीकृष्ण धर्मी हैं और उनके अतिरिक्त सभी अवतार धर्म रूप से किए जाते हैं। समन्वय आविर्भाव-तिरोभाव की दृष्टि से होता है, जिससे नैआयिक सिद्धांत में आने वाली उत्पत्ति-नाश की आपत्ति नहीं आती। रामानुज और मधु संप्रदाय में सभी अवतारों को समान मानने की बात का खंडन किया गया, यह समझाते हुए कि पुष्टिमार्ग में कार्य भेद के कारण तारतम्य देखा जाता है, परंतु स्वरूप भेद नहीं होता। भगवान कार्य के अनुसार अपनी शक्तियों को प्रकट और अप्रकट करते हैं, जिससे भेद-दृष्टि या अपराध भाव की चिंता नहीं होती।
सच्चिदानंद विग्रह और विभूति रूपत्व
सच्चिदानंद विग्रह संबंधी बात हर जगह विरुद्ध नहीं होती, क्योंकि सत्व भी एक भगवद् धर्म है जो सच्चिदानंद विग्रह से अविरुद्ध है। मंत्र आदि के द्वारा अधिष्ठात्री विभूति रूप है। गोसाईंजी ने भक्तिहंस में इस विषय को विस्तृत रूप से बतलाया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भगवान के सभी विग्रहों की व्यवस्था क्या है। ब्रह्म को उपादान कारण मानने से सृष्टि के जड़, जीव, चेतन, अवतार, मूर्ति आदि सभी में भगवान का उपादान कारणत्व सिद्ध है। इसलिए तकनीकी रूप से उनमें परस्पर भेद विचार या उच्च-नीच भाव नहीं होता, क्योंकि उपादानत्व सभी में समन्वित है। सत्व को भगवद् गुणधर्म बताया गया जो सच्चिदानंद धर्म से अविरुद्ध है। मंत्र प्रतिष्ठा से प्रतिष्ठित विग्रहों को विभूति रूप माना जाता है क्योंकि वहां भगवान समर्याद प्रतिष्ठित होते हैं, शुद्ध पुष्टि रूप से नहीं। भक्तिहंस में मंगलाचरण से ही स्पष्ट किया गया है कि भगवान अस्पृश्यो रमते निज भक्तेषु, अतः सभी स्वरूपों में कार्य भेद होता है, स्वरूप भेद नहीं। उनमें पूर्ण पुरुषोत्तम का प्रादुर्भाव नहीं माना जाता।
ब्रह्म की निराकारता पर शंका तथा समाधान
एक शंका उपस्थित की गई कि शुद्ध ब्रह्म की अनंत रूपता मत्स्यादि रूपों में अधिष्ठान रूप से नहीं हो सकती, क्योंकि ब्रह्म की निराकार स्वभावता प्रसिद्ध है। इसलिए सत्व से अव्यवहित प्राकट्य की बात नहीं बन सकती। गोसाईंजी ने इस शंका को असंगत बताया और कहा कि सत्वाधिष्ठान प्रमाण सिद्ध है। 'यदेम अव्यक्तम अनंत रूपम' इत्यादि श्रुति में स्पष्टतः कहा गया है कि भगवान अव्यक्त और एक होते हुए भी अनंत रूपों में प्रकट होते हैं। भगवान का प्राकट्य भक्तों के लिए होता है, और भक्ति अनेक प्रकार की होती है, अतः प्राकट्य भी उनके अनुरूप होता है। सर्ग आदि कार्यों में अधिकृत भक्तों के लिए मत्स्य आदि रूपों में उनकी भावनानुसार प्रकट होते हैं, जबकि एकमात्र भगवद् स्वरूप में आसक्त भक्तों के लिए प्रभु स्वयं प्रत्यक्ष प्रकट होते हैं। लालू भट्ट जी ने 'स्वरूपािक्त फलाकांक्षा राहित्यम्' कहकर पुष्टि भक्ति और पुष्टि जीव का लक्षण बतलाया।
रसो वै सह श्रुति से श्रेष्ठ स्वरूप का निरूपण
पुरुषवि श्रुति भगवान के रूपों में भेद स्पष्ट करती है। 'रसो वै सह' इत्यादि श्रुति प्रतिपादित स्वरूप स्वाभाविक स्नेहवान प्रभु का है, और यही श्रेष्ठ स्वरूप है। मत्स्यादि रूप औपाधिक भक्तों के लिए हैं, जो उनकी कामना अनुसार प्रकट हुए। श्रीगोसाईंजी ने स्पष्ट किया कि 'रसो वै सह' श्रुति के द्वारा जो भगवान की आनंद रूपता और पूर्ण रूपता का निरूपण किया गया है, वह पूर्णता भगवान की केवल अपने निरुपाधिक भक्तों के लिए कृष्णावतार में ही प्रकट होती है, अन्य अवतारों में नहीं। शुद्ध भक्तों उद्धार के कार्य में ही भगवान अपने मूल धर्म को प्रकट करते हैं। अतः 'रसो वै सह' श्रुति द्वारा निरूपित भगवद् स्वरूप शुद्ध स्वरूप और शुद्ध ब्रह्म का स्वरूप है। गुण भेद की अप्रयोजकता निश्चित होती है, और ब्रह्म की सर्व वेदांत प्रत्ययता भी सिद्ध होती है, जिसका अर्थ है कि ब्रह्म वेदांत द्वारा गेय हैं। शास्त्र ने गुणोपसंहार न्याय से ब्रह्म के सभी भिन्न-भिन्न निरूपणों को ब्रह्म में समन्वित किया है, जिससे भगवान का कोई भी स्वरूप सोपाधिक या अपूर्ण नहीं है।
प्रश्नोत्तर: कार्य भेद और स्वरूप भेद
एक प्रतिभागी ने 'गुणों का संहार न्याय' को समझने में कुछ असमंजसता व्यक्त की। वक्ता ने कर्म मार्गी और ज्ञान मार्गी के परस्पर भेद को उदाहरण देकर समझाया, जहां प्रत्येक मार्ग दूसरे को अपूर्ण मानता है। उन्होंने बताया कि यह समन्वय की आवश्यकता पर बल देता है। धर्मी का प्राकट्य सत्वनिष्ठ होकर नहीं होता, जबकि धर्म का प्राकट्य सत्वनिष्ठ होकर होता है। भगवान शुद्ध सत्व से शरीर का निर्माण कर उसमें प्रविष्ट होते हैं, जिसे भगवद् अवतार कहा जाता है, परंतु यह अवतारत्व परमानेंट नहीं होता (जैसे व्यासजी और परशुरामजी के केस में)। विस्मृति आदि होने पर भी वे प्राकृत नहीं होते, शुद्ध सत्व युक्त होते हैं, उनमें निर्गुणता प्रकट नहीं होती। गोकुल में ठाकुरजी का प्राकट्य पूर्ण पुरुषोत्तम रूप से होता है, वह शुद्ध सत्व में नहीं होता, अपितु साक्षात् स्वरूपात्मक होता है। यह कार्य भेद है, स्वरूप भेद नहीं। भगवान अपने सभी गुण वहां प्रकट नहीं करते, कुछ तिरोहित रहते हैं।
प्रश्नोत्तर: मंत्रोपचार और मर्यादा मार्गी भाव
वक्ता ने बताया कि निरूपाधिक स्नेह के कारण पूर्ण पुरुषोत्तम प्रकट होते हैं, जबकि सोपादिकता होने पर व्यूह सहित प्राकट्य होता है। कुछ चीजें प्रक्रियागत भी होती हैं; यदि भाव निरूपाधिक भी हो, पर मंत्र प्रतिष्ठा हो, तो वह सोपादिक ही रहेगी। इसलिए उस प्रक्रिया से बाहर निकलना पड़ता है। शालिग्रामजी के उदाहरण से समझाया गया कि तंत्रोपचार से पंचामृत करवाते समय मंत्र प्रतिष्ठा की जाती है, तब अद्विज चरण स्पर्श योग्य नहीं होते। हालांकि बाद में वे निरूपाधिक भाव में प्रतिष्ठित हो जाते हैं। यह कार्य भेद है, स्वरूप भेद नहीं। ठाकुरजी कभी मर्यादा मार्गी नहीं होते, भक्त मर्यादा मार्गी होते हैं। ठाकुरजी सदा सर्वदा एक ही होते हैं। गुणोपसंहार का मूल मुद्दा है कि भगवान के गुणों का समन्वय सभी प्रकार के प्रतिष्ठानों में होता है। आविर्भाव-तिरोभाव से कार्य भेद होते हैं, प्राग भाव और प्रद्वंसा भाववादी नहीं। यदि प्राग भाव और प्रद्वंसा भाववादी होते, तो स्वरूप भेद हो जाता।
साधना अध्याय में गुणोपसंहार का महत्त्व
वक्ता ने समझाया कि साधना अध्याय में ब्रह्म के बारे में हमारी समझ ही साधन को निर्धारित करती है, और साधन के द्वारा ही फल सिद्धि होनी है। प्रमाण और प्रमेय की स्पष्टता देखने के बाद अब साधन के विषय में स्पष्टता की जा रही है। गुणोपसंहार का अर्थ है कि जैसे भगवान ही प्रमाण रूप और प्रमेय रूप बनते हैं, वैसे ही भगवान ही साधन रूप भी बनते हैं। परंतु साधन रूप भगवान सदा सर्वदा एक रूप से नहीं बनते, सबके लिए अलग-अलग प्रकार से बनते हैं। जब भी भगवान साधन रूप बनना चाहते हैं, वे इन प्रक्रियाओं से साधन रूप होते हैं। भगवान चाहे मर्यादि साधन रूप क्यों न बनते हों या प्रवाहिकी साधन रूप भी क्यों न बनते हों, परंतु वे गुण तो भगवान के ही होते हैं, किसी और के नहीं। ये गुण प्रकृति, माया शबलित ब्रह्म, प्राकृत ब्रह्म या अंतर्यामी के नहीं होते, अपितु मूल ब्रह्म के होते हैं।