मंगलाचरण
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सूत्र ३.३.३२ — गुणों का संहार न्याय का निरूपण
वक्ता ने बताया कि श्रीगोसाईंजी ने उपासना परंपरा में भगवान के गुणों का समन्वय अवतार रूपों और विग्रहों में किस प्रकार होता है, इसका निरूपण किया। 'दर्शयति च सर्वे वेदा यत पद मामनती' श्रुति के अनुसार, समस्त विद्याएँ एक वैद्य वस्तु, ब्रह्म में समन्वित होती हैं। 'यदा हेवईष एतन एतन निमुंदरम' श्रुति उपासना प्रकार के भेद से उपास्य भेद दृष्टि को दूषित मानती है। ब्रह्म के स्वरूप में कोई विकार नहीं आता, इसलिए उपासना के भेद के कारण उपास्य रूपों में भेद करना दोष है। अव्यय शब्द भी अर्थवान सिद्ध होता है क्योंकि ब्रह्म विकार रहित हैं।
सूत्र ३.३.३३ — उपसंहार प्रक्रिया का आरंभ
सूत्र 'उपसंहार अर्था भेदात विदिशेषवत समाने च' के माध्यम से गुणोपसंहार की विविध प्रक्रियाओं का निरूपण किया गया है। वक्ता ने स्पष्ट किया कि उपासना के भेद के कारण कार्य भेद होता है, स्वरूप भेद नहीं। भगवान भक्त के अधिकार अनुसार अपने स्वरूप और शक्तियों में परिवर्तन करते हैं। 'नमस्ते रघुवरय' में 'ते' पद भगवान श्रीकृष्ण को ही रघुवर राम के रूप में द्योतक है, जो सतवाची भगवत् लक्षण युक्त पदार्थ हैं। इससे राम और श्रीकृष्ण का अभेद सिद्ध होता है, अर्थात यहाँ गुणोपसंहार हो रहा है।
रामोपनिषद में उपसंहार और विधिशेषवत् की व्यवस्था
वक्ता ने रामोपनिषद में भगवान के गुणों का उपसंहार करने के स्पष्ट निरूपण की चर्चा की। यदि अभिन्नता मान ली जाए तो मत्स्य में शरचाप और पुरुष में श्रृंग आदि की भावना होगी, जिससे आपत्ति आती है। इसका समाधान 'विधिशेषवत्' से किया गया। जैसे अग्निहोत्र आदि धर्मों में समानता होते हुए भी अपनी-अपनी शाखाओं के प्रकारों का ही उपसंहार करने का प्रचलन है, वैसे ही उपासकों को उन-उन अवतारों की विशेषताओं की ही उपासना करनी चाहिए। अन्य अवतारों के धर्मों की उपासना विहित नहीं है। 'वत' प्रत्यय मतार्थीय है, जो सामंजस्य बताता है।
प्रश्नोत्तर — 'अर्थवाद' शब्द का तात्पर्य
एक सहभागी ने 'विधिशेष केवल अर्थवाद है' पर शंका व्यक्त की। वक्ता ने समझाया कि अर्थवाद का तात्पर्य विस्तार होता है, जिसमें मुख्य विषय को समझाने के लिए कई उदाहरण या बातें कही जाती हैं। विस्तार की हर बात आज्ञार्थक या विधि परक नहीं होती। मीमांसकों और शंकराचार्य जी के संदर्भ में, अर्थवाद का प्रयोग किसी बात को निष्फल बताने के लिए नहीं, बल्कि यह दर्शाने के लिए होता है कि उसका विस्तार मोक्ष प्राप्तक नहीं है, अतः वह गौण है, प्राथमिक नहीं। मुख्य बात वह निर्णय है जो उस विस्तार के बाद आता है। इसमें 'निंदा' या 'स्तुति' का भाव नहीं होता, बल्कि मुख्य विषय पर ध्यान केंद्रित करने का प्रयोजन होता है।
कर्म में फलभेद और उपासना में गुणोपसंहार की व्यवस्था
वक्ता ने बताया कि श्रुतियों में एक ही कर्म का भिन्न-भिन्न फल निरूपण मिलता है। जैसे वैश्वदेव कर्म का एक श्रुति प्रजा प्राप्ति फल बताती है, तो दूसरी केवल आशीर्वादात्मक गति। ऐसे में, कामना अनुसार फल के साधकत्व गुणों का ही उपसंहार होता है। अग्निहोत्र आदि कर्मों में भी अपनी शाखा के प्रकार से ही प्रयोग करना चाहिए। अन्य शाखोक्त धर्मों का उपसंहार करने से प्रायश्चित्त का विधान है, क्योंकि कुल परंपरा, देश और काल के भेद से विधियों में अंतर होता है। प्राण आदि उपासनाओं में अधिक गुणों का उपसंहार करने में कोई बाधा नहीं होती, क्योंकि वहाँ व्यापक बुद्धि को सिद्ध करना धर्म रूप होता है।
प्रश्नोत्तर — ब्रह्म के धर्मों में गुणोपसंहार का विस्तार और संप्रदाय नियामक
एक सहभागी ने पूछा कि क्या गुणोपसंहार को साधन और फल के साथ-साथ ब्रह्म के धर्मों (सत्, चित्, आनंद) के संदर्भ में भी समझ सकते हैं। वक्ता ने पुष्टि की कि प्रमाण, प्रमेय, साधन और फल चारों में गुणोपसंहार होता है। शंकराचार्य जी के मायावाद के विपरीत, पुष्टिमार्ग में ब्रह्म के गुणधर्म प्राकृत नहीं, अप्राकृत हैं। यदि ब्रह्म के गुणों का उपसंहार नहीं होता, तो साधन रूपता चली जाती है और भक्ति सोपादिक हो जाती है, जो पुष्टिमार्ग के सिद्धांतों के लिए आपत्तिजनक है। संप्रदाय भी गुणोपसंहार में नियामक होते हैं, जैसे महाप्रभुजी धर्मधर्मी का भेद मानते हैं, जबकि रामानुज और मधु संप्रदाय में सभी भगवत् अवतार समान माने जाते हैं। विभिन्न आचार्य अपने-अपने दर्शन और उपपत्ति के आधार पर ब्रह्म के गुणों का निरूपण करते हैं।