मंगलाचरण
• पाठ: मंगलाचरण
• प्रतिभागी वाचन:
• वक्ता विवेचन: यह सत्र मंगलाचरण के साथ प्रारंभ हुआ।
गुणोपसंहार न्याय का पुनरावर्तन
• पाठ:
• प्रतिभागी वाचन:
• वक्ता विवेचन: अनुभाष्य का अध्ययन क्रम आज से पुनः प्रारंभ हो रहा है। तृतीय अध्याय के तृतीय पाद को प्रारंभ किया था, जहाँ ब्रह्म की साधन रूपता को लेकर विषय प्रारंभ हुआ। वेद का स्वाध्याय कैसे किया जाता है, वेद की शाखाओं में ब्रह्म का निरूपण कैसे हुआ है, और ब्रह्म वेद में किस प्रकार से प्रतिपादित है, इन सभी विषयों का विचार करना तृतीय अध्याय का विषय है। गुणोपसंहार न्याय का तात्पर्य समन्वय है। 'तत्व समन्वयात' सूत्र में प्रथमा अध्याय में यह विषय देखा था कि वेद का सर्व वेद्य भगवान में ही समन्वित होता है, ब्रह्म में ही समन्वित होता है, ऐसा श्रीमहाप्रभुजी का निर्णय है। कर्म मार्ग, ज्ञान मार्ग, और उपासना मार्ग में ब्रह्म का निरूपण पूर्णतया होता है।
सूत्र ८: संज्ञोपासनमेकत्वात् — संज्ञा और अधिकार में भेद
• पाठ: ब्रह्मसूत्र ३.३.८
• प्रतिभागी वाचन:
• वक्ता विवेचन: सातवें सूत्र तक हमने परोवरीय विद्या का निरूपण देखा था। अब आठवें सूत्र से उपासना के एकांतिक और अनैंतिक अर्थात अनन्य उपासना, जहाँ एक को ही इष्ट के रूप में पसंद करते हैं, और समन्वित उपासना इन दोनों पद्धतियों का आगे गुणोपसंहार की दृष्टि से निरूपण कर रहे हैं। संज्ञा तो लौकिकी होती है, किंतु अधिकार में भिन्नता होती है। संज्ञा से अधिकार ही बलवान होता है। रामोपासक, कृष्णोपासक, नरसिमोपासक आदि संज्ञाएँ बाह्य आइडेंटिफिकेशन हैं। परंतु अधिकार में भेद होता है, और अधिकार की प्रमुखता होती है। एक संज्ञा मानने में अन्वय व्यभचार होगा। 'संज्ञात चेत संज्ञात' अर्थात संज्ञा के द्वारा ऐसा होने पर भी 'तदव अस्ति' आगे के सूत्र में कह चुके हैं। अन्वय व्यभचार का अर्थ है कि व्याप्ति की सिद्धि तब होती है जब अन्वय और व्यतिरेक दोनों हों। यदि अन्वय में व्यभचार हो, तो व्याप्ति का सिद्धांत घटित नहीं हो सकता। प्रवित भेद वाली उपासनाओं में संज्ञायिकत्व है, उदगीत उपासना में गौण है।
सूत्र ९: व्याप्तेश्च समंजसम् — भगवान के स्वरूपों में न्यूनाधिकता का खंडन
• पाठ: ब्रह्मसूत्र ३.३.९
• प्रतिभागी वाचन: प्रतिभागी संज्ञा और अधिकार के भेद के संबंध में प्रश्न पूछते हैं, जैसे रामोपासक को रामोपासना में अधिकार होना चाहिए।
• वक्ता विवेचन: वक्ता स्पष्ट करते हैं कि संज्ञा और अधिकार एक होना चाहिए। संज्ञा केवल एक बाह्य पहचान है (जैसे रामोपासक), जबकि अधिकार आंतरिक योग्यता है। अधिकार प्रमुख होता है, संज्ञा गौण। व्याप्ति सर्वत्र एक जैसी नहीं होती। वक्ता कहते हैं कि उपास्य रूपों में बाल्य, पौगंड, कुमार आदि अवस्थाओं का उल्लेख है, जिससे विग्रहों में न्यूनाधिक भाव का विचार उत्पन्न होता है (जैसे ब्रज लीला और द्वारका लीला)। यदि हम इसे प्राकृत मान लें, तो भगवान के सच्चिदानंद रूप में कमी आती है। श्रीमहाप्रभुजी ने 'यशोदा करोड़े स्थितोप कृष्ण सकल जगदाधारो भवति' से विरुद्ध धर्माश्रयता को निरूपित किया है। भगवान की साकारता प्राकृत नहीं, परिच्छेद नहीं, सर्वसह श्रुति से उसकी सर्वसात्मकता निश्चित होती है। भक्त की रसानुभूति के लिए प्रभु योगमाया से अपने को उन्हीं रूपों में प्रकट करते हैं।
प्रश्नोत्तर — उपासना में एकांतिकता और गुणोपसंहार
• पाठ:
• प्रतिभागी वाचन: प्रतिभागी शंकराचार्य द्वारा स्थापित पंचदेवोपासन की प्रक्रिया और उसमें निष्ठा या प्रेम के आधार पर किसी एक उपास्य को मध्य में स्थापित कर अन्य देवताओं को आवरण देवता मानने के द्वितीय कल्प के विषय में पूछते हैं।
• वक्ता विवेचन: वक्ता बताते हैं कि शंकराचार्य जी ने पंचदेवोपासन को चित्त शुद्धि के लिए स्थापित किया, जिसमें सभी देवता समान माने जाते हैं। द्वितीय कल्प में इष्टदेव को मध्य में प्रतिष्ठित करके अन्य को आवरण देवता माना जाता है। ये दोनों ही गुणोपसंहार के प्रकार हैं, पर एक जैसे नहीं। वक्ता आठवें सूत्र के संदर्भ में अग्निहोत्र कर्म का उदाहरण देते हैं कि कर्म एक ही है, पर अधिकारी के भेद के कारण (जैसे कृष्ण यजुर्वेदी, शुक्ल यजुर्वेदी) उसका अधिकार भिन्न होता है। संज्ञा अग्निहोत्र कर्म है, परंतु अधिकार भेद है। यह बताता है कि संज्ञा और अधिकार अलग-अलग विषय हैं, और अधिकार इसमें प्रबल होता है।
प्रश्नोत्तर — व्याप्ति का सिद्धांत
• पाठ:
• प्रतिभागी वाचन: प्रतिभागी अन्वय व्यभचार और व्याप्ति के उदाहरण के बारे में पूछते हैं।
• वक्ता विवेचन: वक्ता बताते हैं कि व्याप्ति की सिद्धि अन्वय और व्यतिरेक दोनों से होती है (जैसे 'यत्र यत्र धूम तत्र तत्र वहनी' और 'यत्र यत्र धुआ भाव तत्र तत्र वह्या भावः')। यदि अन्वय में व्यभचार हो, तो व्याप्ति का सिद्धांत घटित नहीं हो सकता। वक्ता उदाहरण देते हैं कि गीली लकड़ी जलाने पर धुआँ उठता है पर आग नहीं जलती, और ज्वलनशील पदार्थ जलाने पर आग होती है पर धुआँ नहीं निकलता, जिससे अन्वय और व्यतिरेक दोनों की सिद्धि नहीं होती, और उसमें दोष माना जाता है।
नित्य धर्मों व लीलाओं के संबंध पर संशय
• पाठ:
• प्रतिभागी वाचन:
• वक्ता विवेचन: वक्ता मूल तात्पर्य बताते हैं कि ये सभी धर्म ब्रह्म के धर्म हैं। संशय यह है कि ब्रह्म के धर्म नित्य हैं, तो वे नित्य ही कहलाएँगे। फिर भी वे विशेष-विशेष भक्ति के अनुसार विशिष्ट हैं। एक ही भक्त का पूर्वापर्य क्रम से अनेक लीलाओं से संबंध देखा जाता है। अतः पूर्व लीला की नित्यता के अनुसार उसके संबंधी भक्त को वैसा ही कहना चाहिए, फिर उसका अग्रिम लीला से संबंध भिन्न हो जाएगा। इस दुविधा को दूर करने के लिए सूत्र प्रस्तुत करते हैं। ब्रह्म नित्य तत्व है, उसके धर्म भी नित्य होने चाहिए। भगवान के धर्मों में अनित्यता का प्रवेश नहीं स्वीकारा जा सकता। यदि लीलाओं में भेद है, तो भक्त का आगे की लीलाओं से संबंध नहीं होना चाहिए। पुष्टिमार्ग में हम ब्रज के श्रीकृष्ण का भजन करते हैं, द्वारका लीला का भावन नहीं करते क्योंकि उसमें अपना अधिकार नहीं है। भगवान की लीला में किंचित तारतम्य है, क्योंकि कुछ लीलाएँ भक्तोंार्थ नहीं की गई हैं। जामवंत और देवकी-वसुदेव आदि के उदाहरण से भक्त के भिन्न लीलाओं और अवतारों से संबंध को समझाया जाता है, जहाँ गुणोंपसंहार अपेक्षित है।
प्रश्नोत्तर — गोसाईं जी का भक्ति पर बल व अधिकारिता
• पाठ:
• प्रतिभागी वाचन: प्रतिभागी पूछते हैं कि क्या गोसाईं जी का भाष्य में भक्ति पर अधिक बल है, और संज्ञा कौन देता है (व्यक्ति स्वयं, परिवार, या शास्त्र/गुरु)।
• वक्ता विवेचन: वक्ता स्पष्ट करते हैं कि गोसाईं जी और महाप्रभुजी के 'मूड' अलग-अलग होने की बाहरी विचारकों की एनालिसिस है, पर हमारा सांप्रदायिक ओपिनियन ऐसा नहीं है। भक्ति मार्ग में भगवान की सर्वोपरि साधन रूपता होती है, इसलिए उसका विशेष विचार किया गया है। संज्ञा व्यक्ति स्वयं पसंद कर सकता है, या परिवार/गुरु से मिल सकती है। अधिकार फलमुख होता है। पुष्टिमार्गियों को इस बात को अधिक समर्थन देना चाहिए कि मार्ग बल से संज्ञा की प्रबलता है, जैसे अजामिल के केस में। यदि सिद्धांत में स्पष्टता नहीं है तो पुष्टिमार्गीय फल की दिशा में बढ़ने में फ्लक्चुएशन आ सकता है।
प्रश्नोत्तर — ब्रज व मथुरा लीला में प्रादुर्भाव का भेद
• पाठ:
• प्रतिभागी वाचन: प्रतिभागी द्वारका लीला के प्रति अफेक्शन और जन्माष्टमी पर मथुरा लीला मनाने के बारे में पुष्टिमार्ग की स्थिति पूछते हैं।
• वक्ता विवेचन: वक्ता बताते हैं कि गुणोपसंहार स्वीकार्य है, परंतु निसाधनता और सुसाधनता का डिवीजन प्राथमिक है। महाप्रभुजी का सिद्धांत है कि व्यूह रूप से भगवान का आविर्भाव अन्य कार्यों की पूर्ति के लिए हो सकता है, परंतु पूर्णावतार केवल भक्तोंार्थ होता है। जन्माष्टमी पर पुष्टिमार्गी ब्रज में भगवत्प्रादुर्भाव मनाते हैं, जो पूर्णावतार श्रीकृष्ण का प्रादुर्भाव है, मथुरा का वासुदेव व्यूह का प्रादुर्भाव नहीं। हम व्यूह के उपासक नहीं, पुरुषोत्तम के उपासक हैं। यह बहुत स्पष्ट डिवीजन है, जिसके गैप्स को खत्म नहीं किया जा सकता। यदि इंटरनली यह अंडरस्टैंडिंग स्पष्ट नहीं है, तो भविष्य में भावावेश में फ्लक्चुएशन की संभावना है।
प्रश्नोत्तर — गुणोपसंहार की व्यक्तिगत और प्रक्रियागत जटिलता
• पाठ:
• प्रतिभागी वाचन: प्रतिभागी पूछते हैं कि क्या पुष्टिमार्ग में उपासना को लेकर कोई संतुलन (बैलेंसिंग) है, या यह दो धारी तलवार के जैसा है।
• वक्ता विवेचन: वक्ता कहते हैं कि गुणोपसंहार बहुत पेचीदा और व्यक्तिगत विषय है। इसे सभी मार्गों, प्रक्रियाओं, या अधिकारियों के लिए एक तरह से लागू नहीं किया जा सकता। गोसाईं जी ने इसका इतना विशद विचार इसीलिए किया है कि गुणोपसंहार के प्रिंसिपल को सुनकर हमारी बुद्धि घोड़े के जैसे अंधी न हो जाए। सिद्धांत का एप्लीकेशन मार्ग के अनुसार होता है। वक्ता विभिन्न वैष्णवाचार्यों (रामानुज, मधवाचार्य, महाप्रभुजी) के अन्य देवोपासन के प्रति भिन्न दृष्टिकोणों का उदाहरण देते हैं, जहाँ सभी गुणोपसंहार ही कर रहे हैं, पर प्रक्रिया एक नहीं। महाप्रभुजी तीर्थ में या नैमित्तिक कर्मों में समाधान की अनुमति देते हैं, परंतु अर्चन की नहीं। गुणोपसंहार के सभी अंगों का विचार न करने पर वह टेक्निकली गुणोपसंहार है ही नहीं।
समापन
• पाठ:
• प्रतिभागी वाचन:
• वक्ता विवेचन: यह विषय तृतीय पाद के अंत तक चलेगा।