॥ ब्रह्मसूत्राणुभाष्य-३/२/१०-१५ ॥

श्रीवल्लभाचार्य विद्यापीठ, हालोल — नित्य पुष्टिस्वाध्याय
📅 16 September 2026
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परिचय एवं सन्दर्भ

ब्रह्मसूत्राणुभाष्य के इस सत्र में पाद ३, अध्याय २, सूत्र १० से १५ तक के विषयों पर विचार किया गया। मुख्य रूप से गुणों संहार के विभिन्न पक्षों, ब्रह्म की लीला की व्यापकता, और भगवान के आनंद गुणधर्मता का निरूपण किया गया। सत्र में लीला पदार्थों की अभिन्नता और ब्रह्म के धर्मों की नित्यता पर आधारित संशयों का निवारण किया गया।

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१
गुणों संहार के पक्षों पर विचार
००:०७ – ०५:१४ — गुणों संहार के पक्षों पर विचार
गुणों संहार के पक्षों पर विचार
• पाठ: ब्रह्मसूत्र सन्दर्भ
• वक्ता विवेचन: गुणों की प्रक्रिया सभी मार्गों और लोगों के लिए एक समान नहीं होती है। श्रीगुसाईंजी ने सातवें सूत्र में विचार करने के बाद भी इस विषय पर आगे विचार अपेक्षित बताया है, क्योंकि इसके बिना स्पष्टता संभव नहीं है। नौवें सूत्र में भगवान के अन्य-अन्य रूपों में गुणों संहार में आने वाली समस्या देखी गई थी। जैसे रामचंद्रजी और मध्यवराह आदि के स्वरूपों में एकरूपता न होने से गुणों को संहार करने में समस्या आती है, वैसे ही भगवान के बाल लीला, कौमार अवस्था, पौंड अवस्था के स्वरूपों में भी परस्पर भेद देखने मिलते हैं। यह भाव भेद या मार्ग भेद के कारण होता है, जिससे गुणोपसंहार सभी लोग अलग-अलग तरह से करते हैं। ब्रह्म नित्य तत्व है, इसलिए उसके धर्मों की नित्यता अनिवार्य है। भक्त भगवान की लीला को एक तरह से नहीं देखते, जैसे जामवंतजी ने रामलीला और कृष्ण लीला दोनों में भगवान के स्वरूप में एकरूपता नहीं देखी, फिर भी भगवान तो एक ही हैं। इस विषय पर 'सर्व भेदा अन्यत्रेय' दसवें सूत्र से आगे विचार किया जा रहा है।
२
सर्व भेदा अन्यत्रेय: लीला में घटित पदार्थों की अभिन्नता
०५:१४ – १०:३४ — सर्व भेदा अन्यत्रेय: लीला में घटित पदार्थों की अभिन्नता
सर्व भेदा अन्यत्रेय: लीला में घटित पदार्थों की अभिन्नता
• पाठ: ब्रह्मसूत्र सूत्र १० (सन्दर्भ)
• वक्ता विवेचन: लीला में घटित सभी पदार्थ ब्रह्म से अभिन्न होने के कारण ब्रह्म के समान एक हैं। पूर्व लीला से बाद की लीला तक जो भी धर्म हैं, वे सब एक-दूसरे से संबंधित होने से एक हैं। लीला की सामग्री जैसे रामचंद्रजी के अवतरण के समय अयोध्यावासी के रूप में आए देवता, या भगवान के प्राकट्य के समय ब्रजभक्त आदि, सभी आधिदैविक हैं, प्राकृत जीव नहीं। उनमें आध्यात्मिक और आधिदैविक गुणधर्म प्रकट होते हैं। पूर्व लीला से आगे की लीलाओं में और अवतारों में जो परिवर्तन आते हैं, वे सब एक-दूसरे से परस्पर संबंधित होते हैं। 'रसो वै सः' और 'सर्वरस' श्रुति दोनों ही ब्रह्म की रसात्मकता का निर्णय करती हैं। रस के विभाव अनुभावों से रस की निष्पत्ति होती है, जैसे आतान वितानात्मक तंतुओं से पट (कपड़ा) निर्मित होता है। विभिन्न विभाव अनुभावों से विभिन्न रसों की निष्पत्ति होती है, किंतु वे सब तादात्म संबंध से रस ही हैं, उनमें कोई भेद नहीं है। भगवान में एक रस नहीं होता, वे विविध रसों से परिपूर्ण और विरुद्ध धर्माश्रय हैं। इसलिए ब्रह्मांड के जितने भी भाव, अनुभाव, विभावानुभाव आदि हैं, वे सब भगवान में पूर्णतः समन्वित होकर एकरूप होकर रहते हैं। जैसे कपड़े के अंदर अनेक धागे मिलकर कपड़ा बनाते हैं और आतान वितानात्मक संबंध से गुथकर एकरूप होते हैं, वैसे ही भगवान के अंदर अनेकानेक रस सम्मिलित होकर भगवान के रस या गुण का अनुभव करवाते हैं। तादात्म संबंध से वे एक रस हो जाते हैं। सिद्धांत रहस्य में महाप्रभुजी ने गंगाजी का उदाहरण दिया है कि अनेक धाराएं मिश्रित होने पर भी हम उन्हें अलग-अलग नहीं देखते। उसी प्रकार, भगवान अनेक लीलाएं प्रकट करते हैं, परस्पर विरुद्ध लीलाएं भी प्रकट करते हैं, ऐसी अन्यथा करतुम सामर्थ्य से भी लीलाएं प्रकट करते हैं, परंतु अंततः सब एक रस भावपन्न हो जाती हैं और उनमें भेद नहीं देखा जाता।
३
लीला पदार्थों की अव्यापकता पर संशय
१०:३४ – १५:११ — लीला पदार्थों की अव्यापकता पर संशय
लीला पदार्थों की अव्यापकता पर संशय
• पाठ: ब्रह्मसूत्र सूत्र १०-१५ (पूर्व पक्ष)
• वक्ता विवेचन: विभिन्न दिशाओं वाले एक जातीय भावों का तो भक्ति अतिशय से एक साथ एक जातीय लीला के साथ भगवत प्रादुर्भाव में सामंजस्य संभव है। किंतु भगवान की अव्यापकता में प्रादुर्भाव के समय उत्पन्न इन लीला पदार्थों की अव्यापकता होने से एक साथ आविर्भाव संभव नहीं है। अर्थात, लीला पदार्थ तो लीला तक ही सीमित हैं। व्यापक ब्रह्म के साथ वे कैसे अभिन्न भाव से उपस्थित रह सकते हैं? यह संशय उपस्थित किया जा रहा है। भक्त के अतिशय के कारण, भक्त स्वीकार कर सकता है कि भगवान जो कुछ भी करें वह सब भगवान का है। जब भक्ति का अतिशय बढ़ जाता है, तब भगवान के प्रादुर्भाव के समय इन सभी लीलाओं का सामंजस्य हो सकता है। परंतु जब भगवान सन्मुख प्रकट न हों, जैसे बैकुंठ लोक में विराज रहे हों, और उन प्रत्यक्ष लीलाओं का दर्शन न हो पाए, उस समय वे लीला पदार्थ भी अव्यापक होते हैं। भगवान के प्रकट होने पर ही लीला सामग्री प्रकट होती है और भगवान के धाम पधार जाने पर लीला सामग्री भी पधार जाती है। इसलिए उनका एक साथ आविर्भाव संभव नहीं है। यह संशय इस वजह से होता है कि लीला पदार्थ लीला तक सीमित होते हैं। लीला के बाद वे ना व्यक्ति रह जाते हैं, ना उनके भावों के दर्शन हो पाते हैं, और ना उन्हें हम समझ सकते हैं। ऐसी स्थिति में उन लीला सामग्रियों को समझ पाना या हृदय में भावित कर पाना संभव नहीं रह जाता, और उनके अभिन्न भाव का विचार कैसे करेंगे, इस प्रश्न का उत्तर अब दिया जा रहा है।
४
भक्तिमार्ग की एकरूपता और लीला की व्यापकता
१५:११ – १८:४८ — भक्तिमार्ग की एकरूपता और लीला की व्यापकता
भक्तिमार्ग की एकरूपता और लीला की व्यापकता
• पाठ: ब्रह्मसूत्र सूत्र १०-१५ (समाधान)
• वक्ता विवेचन: भक्तों सभी समान होते हैं, भक्तों में तारतम्य नहीं होता, और भक्ति मार्ग की कोई विरुद्धता भी नहीं है। भगवान एक साथ माया से सब कुछ प्रदर्शित करते हैं, ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि भगवान की लीलाएं मायावी नहीं हैं। यदि हम इतना सोचते हैं, तो हमारे संशय का निवारण हो जाता है। ब्रह्म के समान लीला भी व्यापक है। अतः उनमें स्वाभाविक अभिन्नता है। जैसे भगवान व्यापक हैं, वैसे ही उनकी लीलाएं भी व्यापक हैं, इसलिए उनमें स्वाभाविक अभेद है। भगवान और उनकी लीलाओं के अंदर स्वाभाविक अभेद है। एक भक्त के लिए जैसे ब्रह्म के साथ लीला पदार्थ प्रकट होते हैं, वैसे ही सभी समान भक्तों के लिए प्रकट होते हैं, ऐसा सुसंगत मत है। जैसे भगवान की द्वारका लीला में ब्रजभक्त पार्टिसिपेंट नहीं हैं, या द्वारका लीला के लोग ब्रज लीला के पार्टिसिपेंट नहीं हैं, परंतु फिर भी उनके लिए वह सब सामग्री दोनों ही स्थितियों में प्रकट है। जब वे ब्रज लीला में विराज रहे हैं, तब भी प्रकट है, और ब्रज लीला से द्वारका लीला में पधार गए, तब भी सभी भक्तों के लिए भगवान की जितनी भी लीलाएं हैं, वे प्रकट ही होती हैं। उनके अंदर अप्राकट्य का कोई संशय या विचार नहीं है।
**प्रश्न:** (प्रतिभागी) यह तो अनवतार काल में भी जैसे हम ८४ वैष्णव की वार्ता में देखते हैं, तो ऐसे ही समझें ना इसको? मतलब अनवतार काल में भी प्रभु की लीला प्रकट हो सकती है, सर?
**उत्तर:** (वक्ता) हां, प्रकट होती ही है। मतलब अवतार और अनवतार दोनों इसमें लेना है। यहां श्रीगुसाईंजी ने इस विषय का विस्तार नहीं किया है, पर विद्वत् मंडल ने नित्य लीलावाद को अपने अंतिम फल प्रकरण के अंदर बहुत विस्तार से स्थापित किया है। तो वहां श्रीगुसाईंजी ने शंकरों के खासकर कंपैरिजन में, क्योंकि उनके यहां मिथ्यात्व का सिद्धांत है, इसलिए उसके कॉन्टेक्स्ट में भगवान जो हैं, वह नित्य हैं। इसलिए भगवान की सभी लीलाएं नित्य ही हैं, ऐसा आग्रह पूर्वक श्रीगुसाईंजी ने वहां सिद्धांत स्पष्ट किया है।
५
भगवत् धर्मों की व्यापकता और प्रकट-अप्रकटता पर संशय
१८:४८ – २२:०० — भगवत् धर्मों की व्यापकता और प्रकट-अप्रकटता पर संशय
भगवत् धर्मों की व्यापकता और प्रकट-अप्रकटता पर संशय
• पाठ: ब्रह्मसूत्र सूत्र १०-१५ (पूर्व पक्ष)
• वक्ता विवेचन: जैसे परमात्मा व्यापक हैं, वैसे ही परमात्मा के पूर्ण आनंद, ऐश्वर्य, वीर्य आदि धर्मों की भी प्रतीति होनी चाहिए, पर नहीं होती। यह आनुषंगिक संशय उपस्थित होता है कि जैसे भगवान की लीला या भगवान के गुण प्रकट हैं, उसी प्रकार से ऐश्वर्य, वीर्य, श्री, ज्ञान, वैराग्य आदि जितने भी भगवत् धर्म हैं, वे सभी भक्तों के अंदर सदा प्रकट होने चाहिए, परंतु ऐसा नहीं होता है। भगवान अपने ऐश्वर्य, वीर्य को अपने लीलाकाल में कभी प्रकट रखते हैं, कभी अप्रकट रखते हैं, कभी प्रकट कर देते हैं, कभी छुपा देते हैं। ऐसी स्थिति में भी भगवान के सभी धर्म नित्य प्रकट रहते हों, ऐसे दर्शन हमें नहीं होते हैं। दुखी होने पर ही भक्त प्रभु की प्रार्थना करते हैं। इसलिए धर्मों की व्यापकता कहना भी कठिन है। जब हम दुखी हो जाते हैं, हमें भगवान की सहायता की आवश्यकता होती है, तब हम भगवान को विज्ञप्त करते हैं। तब तक भगवान का ऐश्वर्य धर्म हमें प्रकट दिखाई नहीं दे रहा था। परंतु जैसे ही हमें आवश्यकता पड़ती है, तो हमें यह पता चलता है कि हम ऐश्वर्य विहीन हैं और भगवान ऐश्वर्यवान हैं। इसलिए हमें भगवान के ऐश्वर्य धर्म के महात्म्य को ध्यान में लेते हुए भगवान से विज्ञप्ति करने की इच्छा हृदय में प्रकट हो जाती है या मन में ऐसा विचार उपस्थित हो जाता है कि अब हमें भगवान से मांगना चाहिए या उनकी सहायता लेनी चाहिए। तो ये धर्म भी भगवान के अंदर प्रकट होते हैं, फिर भगवान के अंदर अप्रकट हो जाते हैं। इसलिए उसके अंदर कोई ऐसी एकरूपता बनी नहीं रहती है। तो भगवान के धर्म की नित्यता के विषय में यह प्रश्न उपस्थित होता है कि भगवत् धर्म कितने अंश में नित्य होते हैं और कितने अंश में प्रकट-अप्रकट या अनित्य होते हैं।
**प्रश्न:** (प्रतिभागी) राजा अभी आपने जो आज्ञा की कि कितने अंश में प्रभु के धर्म प्रकट होते और नहीं होते, वो आगे आएगा मतलब उसकी प्रोसेस या...
**उत्तर:** (वक्ता) हां, अब वह आगे आनंदवल्ली है बृहदारण्यक की, वहां से भगवान की नित्या आनंद रूपता का निरूपण कर रहे हैं।
६
भगवान के आनंद गुणधर्मता का दृष्टिकोष
३५:११ – ४८:२९ — भगवान के आनंद गुणधर्मता का दृष्टिकोष
भगवान के आनंद गुणधर्मता का दृष्टिकोष
• पाठ: ब्रह्मसूत्र सूत्र १०-१५ (सन्दर्भ)
• वक्ता विवेचन: यह विचार भगवान की आनंद गुणधर्मता के दृष्टिकोण से किया जा रहा है, क्योंकि भगवान अपने लीला कार्यों को आनंद गुण से प्रकट करते हैं। भगवान का जो आनंद धर्म है, वह आनंद धर्म भगवान का लीला आविष्करण करता है। आनंद ही आविष्कृत होकर लीला बनता है। तो वह आनंद आविष्कार को ही यहां प्राइमरीली समझाया जा रहा है। भगवान स्वरूपत: तो पूर्णानंद हैं। अब उस आनंद की पूर्ण मात्रा प्रकट करने की आवश्यकता नहीं है तो भगवान उसे पूर्ण मात्रा में प्रकट नहीं करते हैं, परंतु उससे भगवान जो हैं, वह न्यून आनंद से युक्त हैं या गणितानंद हैं, ऐसा तो सिद्ध नहीं हो जाता है।
**प्रश्न:** (प्रतिभागी) परमात्मा एक साथ माया से वहां सब प्रदर्शन करते हैं, ऐसा भी नहीं कह सकते, तो यह वाक्य समझ में नहीं आ रहा है जी।
**उत्तर:** (वक्ता) उसका मतलब कि भगवान की जो भी ये लीलाएं हैं, वह मिथ्या हैं और माया के कारण ही भगवान की ये सभी लीलाएं या चरित्र हमें दिखाई दे रहे हैं, ऐसा हम नहीं कह सकते। सत्य है। अर्थात शंकराचार्यजी से कोई पूछेगा कि एक अवतार में ऐसा दिखाई दे रहा है, दूसरे अवतार में ऐसा दिखाई दे रहा है, तीसरे अवतार में भगवान कुछ और कार्य प्रकट कर रहे हैं, तो इनका क्या निर्णय? तो शंकराचार्यजी के लिए तो यह जवाब देना सरल है कि यह तो माया के द्वारा दिखाई देता है। इसलिए उन्हें वहां ऐसी विरोध-श्रेता को बताने की जरूरत नहीं है, पर हम तो ऐसा नहीं कह सकते हैं ना। तो हम क्या कहेंगे कि भगवान की लीलाएं नित्य होती हैं। नित्य होने के कारण ही तो यह समस्या हो रही है। नित्यता का स्वीकार करने के कारण ही यह प्रॉब्लम हो रही है कि एक अवतार में भगवान कैसा कार्य प्रकट कर रहे हैं, ऐसा दूसरे अवतार में नहीं कर रहे हैं। इसीलिए यह कंफ्यूजन हो रहा है कि नित्यता है तो कंसिस्टेंसी क्यों नहीं है? यहां समस्या यह हो रही है कि मैं भगवान की लीला के प्रति दर्शक हूं। मुझे भगवान की कोई एक पर्टिकुलर लीला के दर्शन हो रहे हैं। उस समय मैंने भगवान का कोई एक रूप देखा। अब इसका यहां कॉन्टेक्स्ट नहीं है कि वह मुझे मेरे भाव के कारण दिखा या भगवान मुझे ऐसा दिखाना चाहते थे। दोनों में से कुछ भी हो पर अल्टीमेटली हो यह रहा है कि मुझे राम अवतार में ऐसी लीला के दर्शन हो रहे हैं और फिर कृष्ण अवतार में भगवान के कोई दूसरी प्रकार के लीला के दर्शन हो रहे हैं। और एक प्राकृत मनुष्य होने के नाते या परिछिन्न बुद्धि वाला होने के नाते मुझे उन दोनों लीलाओं के अंदर कंसिस्टेंसी दिखाई नहीं देती है, जबकि तत्व मुझे यह पता है कि भगवान एक ही हैं, भगवान दो नहीं हैं। अब इस स्थिति में यह नित्यता का एक सिद्धांत है कि भगवान नित्य होते हैं, भगवान की लीलाएं नित्य होती हैं, भगवान का कार्य नित्य होता है, सब कुछ नित्य होता है। नित्य होने पर भी नित्यता दिखाई तो नहीं दे रही है ना। तो शंकराचार्यजी की तरह हम यहां यह भी नहीं कह सकते हैं कि यह तो सब मिथ्या होता है, तो इसमें नित्यता की क्या बात है? हम नित्यता के सिद्धांत वाले हैं। नित्यता के सिद्धांत वाले होने के कारण ही यह इनकंसिस्टेंसी में प्रॉब्लम हो रही है, कि वो लीला भगवान की जो है, वह एक क्रम में क्यों नहीं चल रही? या एक तरह से क्यों नहीं चल रही? हां, मतलब एक जगह कभी मेरे को एक प्रकार के अगर समझो दो भक्तजन हैं, तो दोनों को एक ही प्रकार की लीला में अनेक भाव होते, तो नित्यता या ऐसे क्यों नहीं होता है, यह देख के हमें शंका होती है, तो यह निराकरण कर देते, ऐसे ही ना। क्योंकि इन सभी के अपने-अपने प्रकार के जवाब हो सकते हैं। इन सभी विषयों के, जैसे हम शबरी के ऊपर रामचंद्रजी ने जो कृपा की, उसके लिए हम कहते हैं कि वह रामचंद्रजी का पुष्टिक कार्य है, भीलनी है। अब जो भी मॉडर्न ट्रेडिशनल वक्ता हैं, वह लोग यह कहते हैं कि नहीं, वह भी नहीं है, वह ब्राह्मण है। और उन्होंने सभी वचनों से उस बात को सिद्ध भी किया है। अब यह जवाब में हम उनकी मर्यादा पुरुषोत्तमता को इंटैक्ट रखने का प्रयास कर रहे हैं, जबकि रामचंद्रजी ने शबरी के श्रीहस्त से खाया, यह बात सच है, पर उच्छिष्ट खाया, ऐसा वर्णन वाल्मीकि रामायण में नहीं आता है, सर्वथा नहीं आता है। शंबूक के प्रसंग में तो खैर वह मर्यादा वर्णाश्रम धर्म की रामचंद्रजी ने रखी, वह हमें स्पष्टता दिखाई देता है। जटायु का मोक्ष यह हम दूसरा रामचंद्रजी का पुष्टिकार्य बताते हैं कि पक्षी योनि भोग योनि होती है, उसमें मुक्ति नहीं होती है, परंतु जटायु का अपने हाथों से अंत्यष्टि करके रामचंद्रजी ने उसे मोक्ष दिया, यह द्वितीय पुष्टिकार्य है। अब इसका भी उत्तर हो ही सकता है कि वह सब आदिविक जीव हैं, आदि भौतिक नहीं हैं, हम जैसे नहीं हैं। तो पक्षीराज हैं, तो उस समय में पक्षियों की जो स्वरूप है, वह भी आज के पक्षियों के जैसा प्राकृत नहीं हुआ करता था। क्योंकि कितने ही पक्षियों के वार्तालाप में वेद की रचाएं प्रकट हुई हैं, ऐसा भी वृत्तांत हमें तैतरीय शाखा आदि के अंदर मिलता ही है। अब ये सभी विषयों का उत्तर हम दे भी सकते हैं, अगर हमें उनके अंदर आधुनिक विप्रतिपत्तियां दिखाई देती हों या ऐसे आर्गुमेंट्स दिखाई देते हों। और अगर ना दिखाई देते हों तो भगवान महात्म्य के विचार हम उसे एज इट इज भी एक्सेप्ट कर सकते हैं। परंतु ये दोनों ही प्रकार के विचार उपस्थित क्यों होते हैं? यह यही इसी प्रॉब्लम के कारण, गुणों को उपसंहार की प्रॉब्लम के कारण या भगवान के अवतार कार्य के धर्मों का सामंजस्य करने के लिए।
७
आनंदाय प्रधानस्य: ब्रह्म के प्रधान धर्म
४८:२९ – ५८:२३ — आनंदाय प्रधानस्य: ब्रह्म के प्रधान धर्म
आनंदाय प्रधानस्य: ब्रह्म के प्रधान धर्म
• पाठ: ब्रह्मसूत्र सूत्र १०-१५ (समाधान)
• वक्ता विवेचन: पूर्ण ऐश्वर्य आदि प्रधान धर्मी ब्रह्म के ही धर्म हैं। लीला पदार्थ ब्रह्म और भक्त दोनों के लिए हैं, किंतु ब्रह्म के धर्म होने से उन्हें व्यापक कहा गया है। भगवान का आनंद पूर्ण होना, ऐश्वर्य, वीर्य, यश, श्री आदि का भी पूर्ण अपरिक्षिन्न होना — ये सभी धर्म ही ब्रह्म के धर्म हैं। ये सभी धर्म ब्रह्म के धर्म होने के कारण व्यापक हैं, नित्य हैं, अपरिछिन्न मात्रा में हैं। लीला के जो भी पदार्थ हैं, वे ब्रह्म और भक्त दोनों ही के लिए होते हैं, क्योंकि वे दोनों मिलकर ही लीला के पार्टिसिपेंट्स बनते हैं। परंतु जो भक्त होता है, उसमें वे धर्म व्यापक नहीं होते हैं, परिच्छिन्न मात्रा में होते हैं, और ब्रह्म के अंदर लीला के काल में वे धर्म व्यापक होते हैं। व्यापक धर्म के अनागंतुक धर्म की व्यापकता स्वभावतः ठीक है। अनागंतुक धर्म का अर्थ है कि ब्रह्म में ऐश्वर्य आदि धर्म बाहर से नहीं आते, ब्रह्म के अंदर स्वाभाविक वो स्वभावत: होते हैं। लीला धर्मों में पूर्णता आनंद आदि की गणना नहीं कर सकते। यदि ऐसा करेंगे, तो धर्मित्व की हानि में धर्मत्व की भी हानि हो जाएगी। इसलिए इन्हें प्रधान धर्मी ब्रह्म के ही धर्म कहा गया है। यह नित्य धर्म है। लीला पदार्थों में ब्रह्म के गुण विद्यमान हैं, इसलिए उनका आविर्भाव कहा गया है। जो लीला धर्म है, उनमें पूर्णानंद की गणना हम नहीं करते। अर्थात कि लीला में भगवान ने जो ऐश्वर्य आदि धर्म प्रकट किए हैं, उनमें उनकी पूर्णता का विचार वहां नहीं किया जा सकता, क्योंकि ऐसा करने से धर्म और धर्मी के स्वरूप के अंदर हानि होती है। तो धर्मित्व की हानि में धर्मत्व की भी हानि हो जाती है, क्योंकि भगवान के धर्मी स्वरूप में अगर कुछ परिवर्तन होता है, तो धर्म में भी परिवर्तन होता ही है। इसलिए प्रधानता से धर्मी ब्रह्म के धर्म वो बताए गए हैं। और फिर वह धर्मी जो ब्रह्म है, वह जब अपने लीला में कोई धर्म प्रकट करता है, तो उनका वह आविर्भाव तिरोभाव से उन धर्मों को बैलेंस करता है। इसलिए धर्मी के रूप में भगवान में वह धर्म नित्य रहते हैं। परंतु लीला में वही धर्मी जब लीला सामग्री के रूप में प्रकट हो जाते हैं, क्योंकि वह भी लीला का एक ऑब्जेक्ट है, जो भी लीला की जा रही है, उसके अंदर एक मटेरियल है, तो वह लीला के अंदर जब वह ब्रह्म आविर्भूत होकर प्रकट होते हैं, उस समय भगवान अपने धर्मों के अंदर जो भी ऐश्वर्य आदि धर्म हैं, उन सभी का आविर्भाव तिरोभाव यथावसर और आवश्यकता के अनुसार या जो भक्त है, उसकी योग्यता के अनुसार करते हैं।
**प्रश्न:** (प्रतिभागी) जी, ये जो है, उसका कंडीशन का कोई एग्जांपल, मतलब शायद दामोदर लीला के एग्जांपल से समझ सकते हैं इसको कुछ?
**उत्तर:** (वक्ता) सभी जगह ऐसा है। दामोदर लीला में भगवान अपना ऐश्वर्य, वीर्य आदि सब कुछ अप्रकट कर देते हैं। तो जहां भी भगवान ऐसा दैन्य प्रकट करते हैं या जहां भी भगवान ऐसे कार्य प्रकट करते हैं, वहां सर्वत्र यही है। जैसे गांधारी का श्राप ले लिया ठाकुरजी ने स्वीकार लिया। क्या अर्जुन के सारथी बन गए भगवान! तो हम यह बात तो देखते ही हैं कि सारथी होने के कारण कर्ण को कितना सब लोगों ने सुनाया, सूतपुत्र कह के। तो सूत का काम होता है सारथी होना, पर भगवान ने सारथी होना भी स्वीकार लिया। तो वह सब भगवान ने अपने गुणों, अपने धर्म में या अपने स्वरूप में जो भी ऐसी न्यूनता प्रकट की है, वहां दर्शक होने के नाते तो हमें विचार होता है ना कि ऐसा क्यों?
**प्रश्न:** (प्रतिभागी) कुछ सोचते हैं तो रोमांच होता है। बाकी उस लगता है। जी।
**उत्तर:** (वक्ता) जिन्हें रोमांच होता है, उन्हें होता है। दूसरों को मायिक और मिथ्या बोलकर और उसको डिग्रेड करने में भी देर नहीं लगती है, वह दृष्टि रहे इसमें। इसीलिए महाप्रभुजी को बहुत मूल समस्या है शंकराचार्यजी के सिद्धांत से, तो महाप्रभुजी ने उसका जो निराकरण है, वह भक्ति विरोधी है ऐसा बोलकर ही किया, उसी ग्राउंड पर किया। बाकी सब चीजें तो गौण हैं। वह भी आप अगर ऐसे कहते, तभी ध्यान में आता है कि हां, हां, वह भी है।
८
सूत्र ३.२.१५: प्रिय शिरसवाद्य प्राप्ती उपचाया पचायौ ही भेदे
५८:२३ – १:००:०४ — सूत्र ३.२.१५: प्रिय शिरसवाद्य प्राप्ती उपचाया पचायौ ही भेदे
सूत्र ३.२.१५: प्रिय शिरसवाद्य प्राप्ती उपचाया पचायौ ही भेदे
• पाठ: ब्रह्मसूत्र सूत्र ३.२.१५
• वक्ता विवेचन: आगे के सूत्र में ब्रह्म के जो आनंद धर्म का निरूपण श्रुति के अंदर किया गया है, वह आनंद धर्मता का विचार यहां कर रहे हैं। प्रिय शिरसवाद्य प्राप्ती उपचाया पचायौ ही भेदे। उपासक के प्रियत्व आदि ज्ञान प्रकार के आधार पर प्रियत्व आदि धर्मों का शिरसत्व आदि रूपों में आनंदमयाधिकरण में निरूपण किया गया है। लीला में भी इनकी स्थिति है। अतः प्रियत्व आदि ज्ञान की सत्ता वहां भी है। इसलिए लीला में भी स्वरूपोपासक के प्रियत्व आदि धर्मों का उपसंहार करना चाहिए। इस संशयित मत का निराकरण करते हैं।
९
सूत्र ३.२.१५: पूर्व पक्ष - उपासक के प्रियत्व आदि ज्ञान प्रकार
१:००:०४ – १:१६:४२ — सूत्र ३.२.१५: पूर्व पक्ष - उपासक के प्रियत्व आदि ज्ञान प्रकार
सूत्र ३.२.१५: पूर्व पक्ष - उपासक के प्रियत्व आदि ज्ञान प्रकार
• पाठ: ब्रह्मसूत्र सूत्र ३.२.१५ (पूर्व पक्ष)
• वक्ता विवेचन: अब यहां आगे पुनः शंकराचार्यजी ही पूर्व पक्ष में हैं। तो वहीं से इसका विचार कर रहे हैं कि उपासक जो होता है, वह भगवान को प्रेम क्यों करेगा या भगवान के साथ किसी भी एक मिनट। तो उपासक जो है, वह भगवान के प्रति जो भी भाव रखता है, प्रेम का भाव रखता है या भगवान के साथ अपने संबंध का वह जिस प्रकार के विचार करता है, उससे यह निर्धारित होता है कि जीव और ब्रह्म के बीच में या भक्त और भगवान के बीच में क्या संबंध है। 'आत्मनस्तु कामाय सर्वम प्रियं भवति' का यहां विशेष विचार करना चाहते हैं। यह वाक्य बहुत फेमस है और इसी वाक्य का उपयोग सभी लोग, ज्यादातर जितने भी आचार्य हैं, वे सभी आचार्य कोई भी साधना पद्धति को इनिशिएट करने के लिए करते हैं या परमात्मा के साथ जीवात्मा के संबंध को आइडेंटिफाई करवाने के लिए करते हैं। वहां आत्मा शब्द को जीवात्मा परक भी लिया जाता है, परमात्मा परक भी लिया जाता है, जीवात्मा परमात्मा के अभेद परक भी लिया जाता है, और जीवात्मा और परमात्मा के बीच में तादात्म संबंध से भी लिया जाता है। विशिष्टाद्वैत के संबंध से भी लिया जा सकता है और अधीनत्व के संबंध से भी लिया जा सकता है। अर्थात कि जितने भी आचार्यों के जितने भी तत्व सिद्धांत हैं, उन सभी तत्व सिद्धांतों को वहां सोचा जा सकता है। श्रीमहाप्रभुजी जब 'आत्मनस्तु कामाय सर्वम प्रियं भवति' इस वचन की व्याख्या करेंगे, तो 'आत्मनस्तु कामाय' का अर्थ करेंगे 'परमात्मनस्तु कामाय सर्वम प्रियं भवति'। हमें वह प्रियता, अर्थात कि सत्-चित् और आनंद ब्रह्म के इन तीन धर्मों में जो सत्ता, चैतन्य और आनंद धर्म के कार्य के स्वरूप में प्रियता का जो अनुभव होता है या प्रियता का जो एलिमेंट हमारे अंदर भगवान के अंश होने के कारण स्थापित किया जाता है, वह प्रियता अंशात्मना संसार में लगती है। अर्थात कि उसका कुछ-कुछ प्रपोर्शन संसार में लगता है। जो शास्त्र इस बात को कहता है कि ब्रह्म के आनंद की मात्रा का ही हम सभी उपभोग करते हैं। तो सांसारिक भी जो हमें सुख, प्रेम, आनंद का अनुभव होता है, वह भी ब्रह्म के ही आनंद गुणधर्म का अंश है, उसका पार्टिकल है, और वह पार्टिकल होने के कारण ही उसका अनुभव हम करते हैं। अब यह जो पार्टिकल हमें फील हो रहा है, यह मेरे और ब्रह्म के बीच के संबंध के ऊपर निर्धारित किया जाता है। अब शंकराचार्यजी के सिद्धांत के हिसाब से जीव और ब्रह्म इन दोनों में कोई भेद है ही नहीं। 'जीवो ब्रह्मव न अपरः' यह उनका सिद्धांत है। उस वजह से 'आत्मनस्तु कामाय सर्वम प्रियं भवति' इस सिद्धांत का तात्पर्य यह होगा कि आत्मा की कामना से सब कुछ प्रिय लगता है। और यहां आत्मा शब्द का मतलब क्या है कि ब्रह्म, परमात्मा और जीवात्मा दोनों की एकता, दोनों का एकत्व भाव। और हमें इसीलिए उस मूल स्वरूप में स्थिति करने के प्रति हमारी जीवात्मा आकर्षित होती है और उसी वजह से हमें वह प्रियता का अनुभव होता है, यह अर्थ होगा। रामानुजाचार्यजी करेंगे तो विशिष्टाद्वैत परक करेंगे, परमात्मा परक करेंगे, परंतु 'आत्मनस्तु कामाय सर्वम प्रियं भवति' अर्थात कि जीवात्मा को जो है, वह अपने नारायण स्वरूप, जो हम तो देह रूप हैं और नारायण हमारी आत्मा है, इसलिए उनकी कामना के कारण ही हमें प्रियता का अनुभव सर्वत्र होता है, यह उनका अर्थ होगा। मध्वाचार्यजी 'आत्मनस्तु कामाय सर्वम प्रियं भवति' का अर्थ इस तरह से करेंगे कि हम क्योंकि जीव जितने भी हैं, वह परतंत्र हैं और विष्णु स्वतंत्र हैं। विष्णु के अतिरिक्त, अर्थात नारायण के अतिरिक्त और कोई भी स्वतंत्र तत्व नहीं है, इसलिए हम उनके प्रति परतंत्र हैं। इसलिए हमें उनके प्रति प्रियता का अनुभव होने के कारण सर्वत्र प्रियता अनुभूत होती है। महाप्रभुजी तादात्म परक अर्थ करेंगे। अब यह जितने भी अर्थ हमने किए हैं, वहां सर्वत्र वह प्रियता का एलिमेंट हमारे अंदर कहीं से आया है। एक शंकराचार्यजी को छोड़कर वैष्णवाचार्यों के मत में जो भी थोड़ा बहुत ऊपर नीचे है, फिर भी वह ब्रह्म में से हमें मिलता है। प्रियता का एट्रिब्यूट हमें ब्रह्म में से मिलता है। वह मेरा धर्म नहीं है, मेरा आगंतुक धर्म है, और ब्रह्म के लिए वह अनागंतुक और स्वाभाविक धर्म है। परंतु जब जीव और ब्रह्म की एकता हम बता देते हैं, तो जीवात्मा के लिए भी जीव और ब्रह्म एक होने के कारण वह उसका भी आगंतुक धर्म नहीं रह जाता है, वह उसके लिए भी अनागंतुक और स्वाभाविक धर्म के रूप में उसकी सिद्धि होती है, जिसे उसे प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं है। तो जो पहली पंक्ति में जो यह संशय उपस्थित कर रहे हैं, वह श्रीशंकराचार्यजी की तरफ से ही किया जा रहा है कि प्रियत्व आदि ज्ञान प्रकार के आधार पर, अर्थात कि शंकराचार्यजी के सिद्धांत में जब 'अहम ब्रह्मास्मि' का ज्ञान मुझे हो जाएगा, तो वह प्रियता मुझे अपने स्वाभाविक धर्म के रूप में प्रतीत होने लगेगी, इसलिए मुझे जो भी बाह्य जगत में प्रियता का अनुभव होता है, वह निवृत्त हो जाएगा, और मुझे केवल अपने अंदर ही प्रियता का अनुभव होने लगेगा, जैसे ब्रह्म आत्मरमणशील होता है, उस तरह से। तो प्रियत्व आदि ज्ञान प्रकार के आधार पर तो वहां मुझे प्रियता का ज्ञान होता है। 'आत्मनस्तु कामाय सर्वम प्रियं भवति' यहां जो आत्मा की प्रियता का बोध किया जा रहा है और उसकी अंशात्मक प्रियता जगत में फील होती है, ऐसा बताया जा रहा है, उसके स्थान पर अंशात्मक प्रियता मिथ्या है और आत्मप्रियता या आत्मरमण शीलता सत्य है, इस प्रकार का सिद्धांत एस्टैब्लिश होगा। तो ज्ञान प्रकार के आधार पर प्रियत्व आदि धर्मों का शिरसत्व आदि रूपों में तो 'तस्य प्रियव शिरः' इस प्रकार से जो आनंदमयाधिकरण में निरूपण है कि ब्रह्म का मस्तक ही उसका आनंद है। फिर 'मोद उत्तर पक्षः प्रमोद दक्षिण पक्षः' ऐसा कह के जैसे पक्षी होते हैं, उसके दो पंख होते हैं, तो एक पंख प्रमोद है और एक पंख मोद है। अर्थात कि मोद, प्रमोद और प्रियता ऐसा बोल के ब्रह्म आनंद घन है, यह सिद्धांत स्थापित करना चाहते हैं। तो आनंदमय अधिकरण में उसका निरूपण हुआ है। लीला में भी इनकी स्थिति है, अर्थात कि लीला के अंदर भी ब्रह्म तो जब आविर्भूत होते हैं, तो भगवान तो अपने उसी स्वरूप के साथ आविर्भूत होते हैं। इसलिए भगवान का श्रीमस्तक ही प्रिय है और मोद, प्रमोद ये उत्तर पक्ष और दक्षिण पक्ष हैं। जैसा 'सर्वत्र पाणि पादान्त सर्वतोक्ष शिरोमुखंम्' से कहा जाता है कि भगवान के तो सर्वत्र हस्त, नेत्रा आदि सब कुछ होते हैं। तो सर्वत्र होते हैं, से तात्पर्य भगवान के अंदर आनंदता, आनंद गुणधर्मता की पूर्णता को बताने में तात्पर्य है, अर्थात कि भगवान स्वगत भेद विवर्जित हैं, यह बताने में तात्पर्य है। तो लीला में भी इनकी स्थिति है। अतः प्रियत्व आदि ज्ञान की सत्ता वहां भी है। तो प्रियत्व आदि का जो ज्ञान हमें 'आत्मनस्तु कामाय सर्वम प्रियं भवति' के जैसे होता है, उसमें ज्ञान की सत्ता भगवान की लीला में भी है। इसलिए स्वरूपोपासक के प्रियत्व आदि धर्मों का उपसंहार करना चाहिए।
**प्रश्न:** (प्रतिभागी) जी, आपने जो डिफरेंट डिफरेंट अपने 'आत्मनस्तु कामाय' के जो विभिन्न मतों के अर्थ देखे, उसमें मतलब, जिसे श्रीशंकराचार्यजी जो मूल पक्षी है, तो इसमें जो 'आत्मनस्तु कामाय' में जिसे ऐसा किया जाएगा कि, अह, माने आत्मा यानी ब्रह्म और जीव का एकत्व भाव और क्योंकि वो विस्मृत है, अह, अभी। पर जब हो जाएगा, तब वह एकत्व भाव है। तो फिर नेट रिजल्ट वहां जैसे प्रियता का क्या आएगा? मतलब प्रियता क्यों है आत्मा में?
**उत्तर:** (वक्ता) प्रियता इसलिए है, क्योंकि मैं ही ब्रह्म हूं, तो वो मेरा ही धर्म है। बस मैं भूल गई थी।
**प्रश्न:** (प्रतिभागी) नहीं पर वो मतलब। मैं पूछना यह चाह रहा हूं कि माने प्रियता ज्ञानात्मक प्रियता है, कैसी प्रीत है? क्योंकि जो श्रीशंकराचार्यजी के मत में हमने जैसे कई बार देखा है कि वह जो ब्रह्म की जो चेतना है, उसको भी वह अपने आनंद का भान नहीं है मतलब एक तरह से। तो वह केवल ज्ञान की चेतना इस प्रकार की चेतना है, तो उसमें फिर प्रियता का अर्थ वहां क्या ज्ञान के अर्थ में लेना पड़ेगा, कैसे मतलब विस्मृत तो हो गए, वो तो बात सच्ची है पर प्रियता का अर्थ क्या रहेगा 'आत्मनस्तु कामाय सर्वम' और 'सर्वम' का क्या आएगा?
**उत्तर:** (वक्ता) 'सर्वम' का मतलब तो जगत में जो भी हमें प्रेम या प्रियता का अनुभव होता है, वह तो सभी के मत में एक ही बात है।
**प्रश्न:** (प्रतिभागी) नहीं पर जगत, जगत की तो सत्ता है ही नहीं ना। वो तो अविद्यक है शंकराचार्यजी के मत में तो वो तो...
**उत्तर:** (वक्ता) अविद्यक है पर व्यावहारिक सत्ता तो है ना? पारमार्थिक ही नहीं है, व्यावहारिक ही तो है ही।
**प्रश्न:** (प्रतिभागी) तो 'सर्वम' का अर्थ वहां भी जगत ही रहना पड़ेगा? मतलब।
**उत्तर:** (वक्ता) हां, बिल्कुल। जगत में प्रियता तो हमें फील होती है ना।
**प्रश्न:** (प्रतिभागी) अच्छा, तो मतलब यह प्रियता कैसी प्रियता है? जैसे एक तो क्या है कि जिसकी सत्ता नहीं है, उसमें प्रियता, ऐसी प्रियता?
**उत्तर:** (वक्ता) वह तो हमारे सिद्धांत में भी संसार की सत्ता नहीं है, पर हमें संसार ही तो प्रिय लगता है, जगत थोड़ी प्रिय लगता है।
**प्रश्न:** (प्रतिभागी) नहीं पर हम अंशात्मना होने के कारण वह प्रियता को सत्य तो मान रहे हैं, क्योंकि वह ब्रह्म के अंशात्मक से ही प्रकट हो रही है, क्योंकि जगत भी सत्य तो है हमारे मत में, तो वह प्रियता तो ब्रह्म के धर्म से ही हमको प्रतीत हो रही है।
**उत्तर:** (वक्ता) अरे, तो मैं खुद ब्रह्म हूं, तो वह प्रियता मेरे अंदर तो सत्य ही है ना, मिथ्या कहां है? शंकराचार्यजी का तो यही जवाब है ना, मैं और ब्रह्मा अलग थोड़ी है।
**प्रश्न:** (प्रतिभागी) मतलब मेरे संदर्भ में तो बात सच्ची, पर जब हम 'सर्वम' का अर्थ जगत करने जा रहे हैं ना, तो वहां वो शंकराचार्यजी के मतलब मुझे क्योंकि उसकी कोई सत्ता ही नहीं है, अधिष्ठान ही नहीं है, तो फिर उसमें प्रियता?
**उत्तर:** (वक्ता) अरे, सत्ता है, वही मैं कह रही हूं, सत्ता है, व्यावहारिक ही सत्ता है ना जगत, प्रातिभासिक थोड़ी है।
**प्रश्न:** (प्रतिभागी) अच्छा अच्छा अच्छा। हम। और वह प्रियता मतलब मूल में ज्ञानात्मक प्रियता है? ज्ञान, ज्ञान है, मतलब प्रियता को, अर्थात?
**उत्तर:** (वक्ता) हां, नहीं प्रियता अभी मुझे आत्मरमणशील में नहीं होती, तब तक तो मुझे प्रियता फील नहीं हो सकती है अपने मूल स्वरूप में। तो मुझे प्रियता का बोध करवाया जाता है। वर्बल अंडरस्टैंडिंग है प्रियता की।
**प्रश्न:** (प्रतिभागी) जी, और वह जब प्रतीति हो जाएगी, मतलब ब्रह्म ज्ञान हो जाएगा और जगत वहां से स्वरूप जगत नहीं रहेगा और ब्रह्म ज्ञान हो, तो फिर उस स्टेज में वह प्रियता ज्ञानात्मक प्रियता ही, तो वही?
**उत्तर:** (वक्ता) हां, उसी का तो निराकरण करना चाहते हैं।
**प्रश्न:** (प्रतिभागी) अच्छा जी, एक चीज, जैसे आपने एक यह जो जैसे मध्वाचार्यजी को बताया ना कि जैसे हम परतंत्र और विष्णु स्वतंत्र हैं, तो हमें वो प्रियता मतलब क्योंकि द्वैत मत तो वो प्रियता विष्णु के प्रति प्रियता के कारण प्रियता है।
**उत्तर:** (वक्ता) हां, क्योंकि हम तो परतंत्र तत्व हैं ना, स्वतंत्र नहीं हैं, तो कोई भी अनुभूति हमारी अपनी नहीं हो सकती।
**प्रश्न:** (प्रतिभागी) तो जैसे मोर और लेस जो बाकी वैष्णवाचार्य, को बाकी जितने वैष्णवाचार्य ने उनको जो मत है, उसमें तो वह प्रियता मतलब प्रभु की प्रियता के संदर्भ में है, बस फर्क सिर्फ वहां तादात्मवाद को या अलग-अलग मत के अनुसार वो प्रियता को अर्थ गठन हो जाएगा।
**उत्तर:** (वक्ता) हां, वह कम से कम हमारी है, ऐसा तो कोई वैष्णवाचार्य तो नहीं कहता है।
**प्रश्न:** (प्रतिभागी) तो वो कुल मिलाकर के वो जो उपसंहार है, गुणों का उपसंहार, उसमें सबके अलग-अलग इंटरप्रिटेशन है। पर वो मूल में प्रियता ब्रह्म धर्म की ही मानी जा रही है, बाकी सब मतलब?
**उत्तर:** (वक्ता) हां, बिल्कुल।
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सूत्र ३.२.१५: पूर्व पक्ष - चित्त शुद्धि हेतु गुणोपसंहार
१:१६:४२ – १:३१:४७ — सूत्र ३.२.१५: पूर्व पक्ष - चित्त शुद्धि हेतु गुणोपसंहार
सूत्र ३.२.१५: पूर्व पक्ष - चित्त शुद्धि हेतु गुणोपसंहार
• पाठ: ब्रह्मसूत्र सूत्र ३.२.१५ (पूर्व पक्ष)
• वक्ता विवेचन: अब क्या गुणों संहार क्या करेंगे? गुणों को संहार हम क्या करेंगे कि भगवान के धर्म हमारे अंदर आते हैं। कैसे कि मेरे अंदर जो प्रियता है, वह भगवान की ही अंशात्मक प्रियता है। मेरे अंदर जो ऐश्वर्य है, वह भगवान का अंशात्मक ऐश्वर्य है। मेरे अंदर जो ज्ञान है, वह भगवान का अंशात्मक ज्ञान है। इस तरह से जितने भी धर्म मेरे अंदर हैं, वे सभी ब्रह्म के ही धर्मों के अंश रूप हैं और उन्हीं धर्मों का उपयोग मैं भगवान के लिए करती हूं या भगवान की प्रसन्नता के लिए करती हूं। इस प्रकार से हम गुणों पर संहार करते हैं। और जो शंकराचार्यजी हैं, वह इस बात को यह कहेंगे कि जो स्वरूप उपासक है, अर्थात कि मैं जो उपासक है, वह क्या कहेगा कि मैंने तो केवल इन धर्मों को विस्मृत किया है। ऐश्वर्यवान होना यह मेरा ही धर्म है, वीर्यवान होना यह मेरा ही धर्म है। परंतु अविद्या अवस्था में ये धर्म मुझे मेरे अंदर दिखाई नहीं देता है पर विष्णु में दिखाई देता है। मेरे अंदर नहीं दिखाई देता पर कृष्ण में दिखाई देता है। मेरे अंदर नहीं दिखाई देता परंतु शिव में दिखाई देता है। परंतु वस्तुतः मैं और शिव हम तो दोनों एक ही हैं। ऐसा गुणोपंहार वहां होगा। इसका अब यहां निराकरण करना चाहते हैं कि उपासना शंकराचार्यजी के सिद्धांत में चित्त शुद्धि होती है। इसलिए जो गुणोपंहार वहां किया जाता है, वह चित्त शुद्धि के लिए ही किया जाता है। चित्त शुद्धि ही उस गुणोसंहार का पर्पस है। वेदांत चिंतामणि के सत्र में भी हमने इस बात को देखा था कि शिवोपासना क्यों करनी? हम अपनी उपासना क्यों नहीं कर सकते? तो तब हमने इस बात को वहां सोचा था कि हम अपनी उपासना करते हैं, तो हमें अपनी या कोई भी प्राकृत मनुष्य की या कोई भी जड़ चेतन पदार्थ की, तो उसमें हमें वो प्राकृत धर्म दिखाई देते हैं। परंतु शास्त्रों से जब हम देवी-देवताओं के चरित्रों को पढ़ते हैं, तो उनमें हमें अपने से बढ़कर कुछ अप्राकृतता दिखाई देती है। इसलिए जिन गुणों के होने के बावजूद भी उनका उपसंहार हम अपने आप में नहीं कर सकते, उन गुणों का उपसंहार उन देवताओं के रूपों में करना हमारे लिए सरल हो जाता है। इसलिए वह गुणों का संहार उनमें करना हमें ठीक लगता है या वह गुणों पर संहार उनके अंदर करना हमें सरल लगता है, और वह करने से हमें फिर अपने अंदर वह गुणों की प्रतीति कभी ना कभी होने लग जाती है। चित्त शुद्धि होने के बाद यह शंकराचार्यजी की प्रक्रिया है। यह यहां संशय उपस्थित किया जा रहा है। अब इसका निराकरण आगे करेंगे।
**प्रश्न:** (प्रतिभागी) राजा, हेलो, हां राजा, आ बऊ समजी तो रही छु, म डीप मा बोलता नहीं पावे, पर मने विचार आयो के एक एग्जांपल तरीके लई के नानपण रमता था तो जे दाव आपे अ पछी पाछ फरी ने जो तो छोकरा बधा उभा छे ए हसावी ने आपने एक्सप्रेशन करी ने हसावी सकिए, तो ए रीतना आप भगवान तो छे हाजरा आपने हंसावी ने आपने समझ, समझ सकता ना एग्जांपल अंदर अपाई कर? नहीं।
**उत्तर:** (वक्ता) नहीं।
सत्र का समापन
• पाठ: ब्रह्मसूत्र सूत्र ३.२.१५ (समाधान)
• वक्ता विवेचन: आज यहां रखते हैं। आगे अब इसका समाधान जो है, वह करेंगे, तो हम नेक्स्ट वीक उसका विचार करेंगे।
📖 सार
📌 सार
यह सत्र ब्रह्मसूत्राणुभाष्य के पाद ३, अध्याय २, सूत्र १० से १५ पर आधारित है।
इसमें गुणों संहार के विभिन्न पक्षों पर विचार किया गया, विशेषतः भगवान के विविध लीला स्वरूपों में भेद होने पर भी उनकी अभिन्नता।
लीला में घटित सभी पदार्थों को ब्रह्म से अभिन्न माना गया, जो तादात्म संबंध से एक रस होते हैं।
भगवान के धर्मों की नित्यता और लीला की व्यापकता पर उठे संशयों का निवारण किया गया।
शंकराचार्यजी के मायावाद के विपरीत पुष्टिमार्ग में लीला और लीला सामग्री की नित्यता पर बल दिया गया।
सूत्र ३.२.१५ 'प्रिय शिरसवाद्य प्राप्ती उपचाया पचायौ ही भेदे' को प्रस्तुत कर शंकराचार्यजी के पूर्व पक्ष का विस्तृत विवेचन किया गया।
यह समझाया गया कि 'आत्मनस्तु कामाय सर्वम प्रियं भवति' का अर्थ विभिन्न आचार्यों के मत में कैसे भिन्न होता है, विशेषतः शंकराचार्यजी के 'अहम ब्रह्मास्मि' सिद्धांत के संदर्भ में।