॥ ब्रह्मसूत्राणुभाष्य-३/१२-१४ ॥
श्रीवल्लभाचार्य विद्यापीठ, हालोल — नित्य पुष्टिस्वाध्याय
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📖 सार
📌 सार
- ब्रह्मसूत्राणुभाष्य के तृतीय अध्याय में समन्वयाधिकरण के सूत्रों पर विवेचन हुआ।
- वक्ता ने ज्ञान, कर्म, और उपासना मार्गों में ब्रह्म के गुणों के समन्वय को स्पष्ट किया।
- शंकराचार्य जी के गुणोपसंहार के सिद्धांत और पुष्टिमार्गीय मत के भेद पर चर्चा हुई, जहां मिथ्यावाद का खंडन किया गया।
- आनंदमयोपासना में पक्षी रूप और पुरुष रूप के समन्वय संबंधी शंकाओं का निराकरण करते हुए ब्रह्म की आनंदमयता में उपचय-अपचय का भेद अस्वीकृत किया गया।
- विरुद्ध प्रतीत होने वाले धर्मों के उपसंहार की आवश्यकता को `अध्यानाय प्रयोजनाभावात्` सूत्र से समझाते हुए बताया गया कि उपासना में प्रयोजन ही मुख्य है।
- `आत्मशब्दाच्च` सूत्र के माध्यम से आनंदमय को जीवात्मा न मानकर परमात्मा ही सिद्ध किया गया, जिसे कपिल गीता के पूर्वस्थ-उत्तरस्थ सिद्धांत से समझाया गया।
- उत्तमाधिकारी को पूर्णानंद का अनुभव होता है, जबकि मध्यम अधिकारी के लिए विभूति उपासना अल्पकालीन होती है, परंतु गणितानंद भी सत्य है।