॥ ब्रह्मसूत्राणुभाष्य-३/१२-१४ ॥

श्रीवल्लभाचार्य विद्यापीठ, हालोल — नित्य पुष्टिस्वाध्याय
📅 21 September 2026
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परिचय एवं सन्दर्भ

यह सत्र ब्रह्मसूत्राणुभाष्य के तृतीय अध्याय के समन्वयाधिकरण पर आधारित है। इसमें १२वें, १३वें और १४वें सूत्र पर गहन विवेचन किया गया। वक्ता ने ज्ञान, कर्म और उपासना मार्गों में ब्रह्म के गुणों के समन्वय को समझाते हुए शंकराचार्य जी के मत और पुष्टिमार्गीय सिद्धान्तों के बीच के भेदों को स्पष्ट किया। इस सत्र में आनंदमयता, गुणोपसंहार की आवश्यकता, विरुद्ध धर्मों का समन्वय और आनंदमय परमात्मा के निरूपण पर विस्तृत चर्चा हुई।

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१
समन्वयाधिकरण - ज्ञान, कर्म और उपासना मार्ग में ब्रह्म के गुणों का समन्वय
००:०० – ०४:३० — समन्वयाधिकरण - ज्ञान, कर्म और उपासना मार्ग में ब्रह्म के गुणों का समन्वय
समन्वयाधिकरण - ज्ञान, कर्म और उपासना मार्ग में ब्रह्म के गुणों का समन्वय
पाठ
(कोई विशेष पाठ नहीं)
वक्ता विवेचन
  • अधिकरण का परिचय: तृतीय अध्याय का समन्वयाधिकरण हम देख रहे हैं। अब तक ज्ञान मार्ग, कर्म मार्ग और उपासना भक्ति मार्ग में ब्रह्म के गुणों का जो समन्वय है, वह साधनाओं के अंदर या उपास्य रूपों के अंदर किस प्रकार से होता है, उसका विचार किया गया। इसके बाद एकांतिक और अनेकांतिक उपासना की दो विधाओं की दृष्टि से भी विचार किया गया।
  • ब्रह्म के धर्मों की पूर्णता: ब्रह्म के जितने भी धर्म हैं, वो भी ब्रह्म के ही समान पूर्ण हैं और उनकी पूर्णता होने के कारण उन धर्मों के अंदर कोई भी प्रकार के अप एंड डाउन्स नहीं आ सकते। अर्थात कभी कोई धर्म या कोई गुण ज्यादा है, कभी कोई धर्म या कोई गुण कम है, इस प्रकार की विकृति जैसे हमारे अंदर देखने मिलती है, ऐसे ब्रह्म के स्वरूप में नहीं देखी जा सकती है।
  • आनंद रूपता का निरूपण: इसके उत्तर के रूप में आनंद आनंद रूपता का जो निरूपण बृहधारण्य उपनिषद के अंदर किया गया है, वहां तक उसका निरूपण आया। श्रीगोसाईं जी ने उसके संदर्भ को लेते हुए ब्रह्म का जो मुखारविंद है, वही ब्रह्म की प्रियता है। मोद और प्रमोद ये दोनों जैसे पक्षी के दो पंख होते हैं, ऐसे ब्रह्म के मोद और प्रमोद ये दोनों दक्षिण पक्ष और उत्तर पक्ष हैं। अंततः तात्पर्य यह है कि ब्रह्म नखशिक आनंद रूप है। आनंद मायाधिकरण में जैसे मयंट प्रत्यय का अर्थ हमने आनंद के प्राचुर्य में लिया था, ऐसे यह आनंद के प्राचुर्य के संदर्भ में समझना है।
  • लीला का स्वरूप: इसलिए वह आनंद रूप है और जगत या ब्रह्म की जितनी भी क्रियाएं हैं, वह लीला प्रकट की जाती हैं, इस प्रकार से एक सामान्य निर्देश किया गया।
  • शंकराचार्य जी का संशय: शंकराचार्य जी की तरफ से यह संशय १२वें सूत्र में उपस्थित हुआ कि ब्रह्म का जो धर्म है, उसके अंदर हमें क्योंकि जीवात्मा और ब्रह्म के बीच में क्या संबंध है, उसका विचार करने पर ही इस विषय का निर्णय लिया जा सकता है। ब्रह्म और जीव इन दोनों के बीच में यदि हम ऐक्य का स्वीकार करते हैं, तब आनंद से प्रचुर मैं खुद ही हूं, इसलिए मुझसे अलग ब्रह्म के अंदर आनंद गुणधर्म ज्यादा है और अंश होने के नाते मेरे अंदर कम है, ऐसे वहां तो किया नहीं गया है। तो ब्रह्म ही जीव रूप है और जीव जो है वो स्वयं अपने गुणधर्मों का रिमाइंडर चाहिए कि हां तुम आनंद से युक्त हो या तुम स्वयं ही आनंद रूप हो। तो इतना रिमाइंडर देने मात्र से ही उसे अपने अंदर आनंद के प्राचुर्य का बोध हो जाता है। उसे प्राप्त करने की किसी कोई प्रक्रिया का वहां औचित्य नहीं है। इसलिए चित्त शुद्धि के कारण के लिए ही वहां प्रियत्व आदि के ज्ञान की जरूरत पड़ती है और जीवात्मा को जो है वह स्वयं ही अपने धर्मों को जानना है। इसलिए ब्रह्म के धर्मों का ज्ञान प्राप्त करने से मैं मेरे अंदर कुछ होना है या मेरे धर्म घट जाएंगे या बढ़ जाएंगे, इस प्रकार का कांसेप्ट श्री शंकराचार्य जी का नहीं है।
२
सूत्र १२ - प्रियशिरस्त्वादीनामप्रत्यूत्तरासां चैवोपचयापचयौ हि भेदे
०४:३० – १०:५० — सूत्र १२ - प्रियशिरस्त्वादीनामप्रत्यूत्तरासां चैवोपचयापचयौ हि भेदे
सूत्र १२ - प्रियशिरस्त्वादीनामप्रत्यूत्तरासां चैवोपचयापचयौ हि भेदे
पाठ
प्रिय शिरसवाद्य प्राप्ति ही प्राप्ति ही उपचया पचौ ही भेदे
वक्ता विवेचन
  • शंकराचार्य जी के मत का पुनरावलोकन: उपासक के प्रियत्व आदि ज्ञान प्रकार के आधार पर तो मैं उपासक हूं और मैं ब्रह्म के किसी एक पर्टिकुलर रूप की उपासना चित्त शुद्धि के लिए कर रही हूं। इसमें प्रियत्व आदि ज्ञान प्रकार के आधार पर प्रियत्व आदि धर्मों का स्थिरत्व आदि रूपों में आनंदमय अधिकरण में निरूपण किया गया है।
  • लीला में गुणों का उपसंहार: मैं जिसकी उपासना कर रही हूं, उसे मैं आनंद से युक्त तत्व के रूप में समझती हूं, जिसका निरूपण आनंदमय अधिकरण में हुआ है। लीला में भी इनकी स्थिति है। अतः प्रियत्व आदि ज्ञान की सत्ता वहां भी है। इसलिए लीला में भी स्वरूपोपासक के प्रियत्व आदि धर्मों का उपसंहार करना चाहिए।
  • गुणोपसंहार का स्वरूप: मैं उपासक होने के नाते ब्रह्म के जितने भी अर्थात निर्गुण ब्रह्म के जितने भी धर्म हैं, उनका उपसंहार करती हूं। अर्थात कृष्ण परब्रह्म है, ऐसा जब मैं बोलूंगी तो ये गुणोपसंहार है कि निर्गुण ब्रह्म के ही धर्मों का उपसंहार मैं परब्रह्म में अवतरित कृष्ण के अंदर कर रही हूं।
  • प्रारंभिक निराकरण: इस संशयित मत का निराकरण करते हैं: प्रिय शिरस्तवाद्य प्राप्ति ही इत्यादि। चित्त शुद्धि तारतम्य के हेतु का प्रियत्व आदि ज्ञान की लीलास्थ धर्मों में चित्त शुद्धि अपेक्षित नहीं है। इसलिए भी संभावना नहीं है, अतः उसके उपसंहार का प्रश्न ही नहीं उठता। यह संशय का प्रारंभिक निराकरण है।
  • ११वें सूत्र से समस्या: प्रॉब्लम ११वें सूत्र से उपस्थित की गई थी, जहां हमने यह कहा कि पूर्णानंद ऐश्वर्य आदि प्रधान जो धर्मी हैं, वह ब्रह्म के अपने धर्म हैं और लीला पदार्थ तो ब्रह्म खुद भी बनता है, जब वो अवतरित होकर कोई रूप धारण करता है और भक्त भी वहां प्रकट होता है। मायावाद के सिद्धांत के हिसाब से दोनों में कोई भेद नहीं है। वस्तुतः दोनों के अंदर सगुणता ही है, परंतु ब्रह्म के धर्म जो है वो व्यापक होते हैं। इसलिए यह प्रॉब्लम है कि वो आगंतुक धर्म नहीं हो सकते। उसके अंदर वह स्वाभाविक धर्म ही होने चाहिए।
  • धर्मी और धर्म में भेद: इसलिए लीला धर्मों में पूर्णत्व की गणना नहीं करनी है, क्योंकि ऐसा करने पर धर्मी और धर्म के बीच में कोई भेद नहीं बचेगा। यहां से यह प्रॉब्लम उपस्थित हुई कि जो अवतरित कृष्ण की सगुणता है, उस सगुणता की तो मैं उपासना करूंगी, क्योंकि जो अनवतरित परब्रह्म है, जिसका जो निर्गुण स्वरूप है, उसकी उपासना तो मैं कर नहीं सकती हूं, क्योंकि उसकी तो मेरे अंदर अभी सागुण या प्राकृत अवस्था के अंदर मेरी उतनी योग्यता या उतना सामर्थ्य मेरे अंदर नहीं है। अब इस स्थिति के अंदर जो जीवात्मा है, वह जीवात्मा के अंदर तो वह धर्म प्रकट नहीं है।
३
प्रश्नोत्तर - शंकराचार्य जी के मत में गुणोपसंहार की प्रक्रिया
१०:५० – १८:१३ — प्रश्नोत्तर - शंकराचार्य जी के मत में गुणोपसंहार की प्रक्रिया
प्रश्नोत्तर - शंकराचार्य जी के मत में गुणोपसंहार की प्रक्रिया
पाठ
(कोई विशेष पाठ नहीं)
प्रतिभागी वाचन
दंडवत प्रणाम, राजा। ये जो आपने समझाया कि राम में यदि राम की कोई उपासना करता है तो उसमें हमारी प्रक्रिया में कृष्ण के गुणों का पूर्ण ब्रह्म रूप का उनका गुणों का उपसंहार नहीं कर सकते क्योंकि वो शांत में शाखा अरुंधति न्याय से करते हैं तो नहीं।
वक्ता विवेचन
  • गुणोपसंहार की पुष्टिमार्गीय प्रक्रिया: जैसे ब्रह्म `तादृशयसात् सर्वात्मक निर्दोष पूर्ण गुणता तत शास्त्र तयोक्ता` यह गुणोपसंहार की प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में हम वैष्णव होकर शिव को और विष्णु को परब्रह्म नहीं मान रहे हैं, परंतु जब यह प्रश्न आया कि उन पुराणों के अंदर शिव की परब्रह्मता और विष्णु की परब्रह्मता का निरूपण कैसे हुआ? तो महाप्रभु जी कहते हैं कि क्योंकि ब्रह्म ही उन रूपों में हुआ है, इसलिए हुआ। तो यह गुणों पर संहार है।
  • परब्रह्म के गुण: जगत कर्ता होना, जगत पालक होना या जगत संहर्ता होना, निर्गुण होना, गुणातीत होना, यह सब परब्रह्म श्रीकृष्ण के गुण हैं, जिनका जगत कार्यार्थ उपसंहार शिव, ब्रह्मा और विष्णु के अंदर किया जा रहा है। हम यह नहीं कहेंगे कि शिव मिथ्या है।
  • शंकराचार्य जी का दृष्टिकोण: शंकराचार्य जी के क्या होता है कि आप जिस ग्राउंड में गुणोपसंहार कर रहे हो, वो ग्राउंड की व्यावहारिक सत्ता है, पारमार्थिक की नहीं है। परम ब्रह्म श्रीकृष्ण और शंकराचार्य जी का सिद्धांत अगर हम लेते हैं, तो कृष्ण के अतिरिक्त पूरा ब्रह्मांड। अब हमने अपने चित्त शुद्धि के लिए जब गुणों पर संहार की प्रक्रिया को यूज करना चाहा, तो शिव के स्थान पर अगर हम कोई पत्थर भी ले लेते हैं या कोई बॉल पेन या पेंसिल या पुस्तक भी ले लेते हैं, तब भी टेक्निकली डजंट मेक एनी डिफरेंस। अब मैंने जब परब्रह्म श्रीकृष्ण के गुणों का उपसंहार कोई भी ऐसी सगुण वस्तु में किया, तो वह सगुण वस्तु का ग्राउंड तो मिथ्या है ना। सगुण वस्तु मिथ्या है, इट डजंट एक्सिस्ट।
  • पुष्टिमार्ग का दृष्टिकोण: हम शिव को परब्रह्म नहीं कह रहे हैं। शिव के अंदर उन अप्राकृत गुणों को या जो भी आदिविक धर्म प्रकट हो रहे हैं, उनका उपसंहार तो हम कृष्ण से ही कर रहे हैं। पर हम शिव को मिथ्या नहीं कह रहे हैं। ये फर्क पड़ रहा है।
  • विभिन्न अवतारों में गुणोपसंहार: अवतारी कृष्ण हैं और कृष्ण के २४ अवतार हैं। अब गुणों के संहार की प्रक्रिया में वराह रूप रामानुज और मधु सिद्धांत को साइड पर रख दें। हम अपनी संप्रदाय की बात कर रहे हैं, तो हमारे सिद्धांत के हिसाब से केवल कृष्ण और राम ही पूर्णवतार हैं, अन्य कोई भी पूर्ण अवतार नहीं है। अब इस स्थिति में जब वराह रूप से भगवान ने सृष्टि की स्थिति की या परशुराम जी के रूप से कुछ संहार कार्य किया या मत्स्य रूप से भगवान ने सर्ग किया, सर्ग का पालन किया, यह सभी कार्यों में हम कृष्ण के गुणों का उपसंहार मत्स्य में, कृष्ण के गुणों का उपसंहार वराह में और कृष्ण के ही गुणों का उपसंहार परशुराम में करेंगे। हम यह नहीं कहेंगे कि यह परशुराम जी का अपना गुण है, क्योंकि वो आगंतुक धर्म है।
  • आविर्भाव-तिरोभाव का सिद्धांत: यद्यपि आविर्भाव तिरोभाव के सिद्धांत के हिसाब से आगंतुक अनागंतुक यह शब्द ज्यादा प्रसक्त नहीं होते हैं, फिर भी परब्रह्मता की दृष्टि से ११वें सूत्र में हमने यह कहा कि धर्मी और धर्म के बीच में भेद करना जरूरी है। तो कृष्ण धर्मी है और अन्य सभी अवतार या अन्य सभी रूप या देवता आदि जितने भी हैं, वो सभी धर्म रूप हैं। तो धर्मी के गुणों का उपसंहार हम धर्म में करेंगे। अगर धर्म में वह गुण पहले से विद्यमान है ही, ऐसा अगर हम बोल देते हैं तो धर्मी और धर्म के बीच का डिफरेंस खत्म हो जाता है। इस स्थिति में यह प्रॉब्लम है कि धर्मी परब्रह्म श्रीकृष्ण आनंद रूप होने के कारण उनके सभी धर्म व्यापक हैं। तो कहीं से भी वो उन गुणों को हटा नहीं, विड्रॉ नहीं कर सकते। अब ये विड्रॉ पॉसिबल नहीं होने के कारण हमारे पास आविर्भाव तिरोभाव का जवाब है कि विड्रॉ हो भी नहीं रहा है, केवल इनक्टिव हो रहा है। परंतु उस पर पूर्व पक्षी ने यह बात उपस्थित की कि उसकी जो आनंद रूपता है, उसके लिए वो लोग अपनी तरफ से यह प्रपोजल दे रहे हैं, ऐसा समझ लो। एग्जैक्टली संशय नहीं है, वो इस टोन में है कि इस तरह से भी इस प्रॉब्लम को सॉल्व किया जा सकता है।
  • पुष्टिमार्ग का जवाब: हम ये कहेंगे आपकी व्यावहारिक सत्ता अर्थात लीला के जितने भी पदार्थ हैं, उन सभी की व्यावहारिक ही सत्ता है और व्यावहारिक ही सत्ता होने के कारण उनका जो भी गुणों पर संहार किया जा रहा है, वो धर्मी की धर्मी रूपता को बाधित नहीं करेगा और धर्म और धर्मी के बीच का भेद भी बना रहेगा। इस तरह से अगर आप बोलना चाहोगे, तो यह नहीं हो सकता है, ऐसा अपना जवाब है।
४
शंका - आनंदमयोपासना में पक्षी रूप और पुरुष रूप का समन्वय
१८:१३ – २२:०४ — शंका - आनंदमयोपासना में पक्षी रूप और पुरुष रूप का समन्वय
शंका - आनंदमयोपासना में पक्षी रूप और पुरुष रूप का समन्वय
पाठ
(कोई विशेष पाठ नहीं)
वक्ता विवेचन
  • अथर्वणोपनिषद और पाञ्चरात्र आगम में भेद: अथर्वणोपनिषद आनंदमयोपासना को पांच रात्र आदि आगम में कहे गए प्रकार से करने पर पुरुष रूप में पक्ष आदि रूपों का उपसंहार असंगत होगा। आनंदमयाधिकरण में उपास्य का पक्षी रूप ही बतलाया गया है। इसलिए पुरुष रूप कैसे आनंदमय हो सकता है? आनंदमय उपासना का जो निरूपण है, उसमें पक्षी रूप से ब्रह्म के स्वरूप का वर्णन किया गया है और पांच आदि आगम में जहां उपास्थ्य स्वरूप का वर्णन है, वहां पुरुषावतार है अर्थात कोई फॉर्म है, पक्षी रूप नहीं है, तो वो राम हो, चाहे कृष्ण हो, परशुराम हो, वराह हो, मत्स्य हो, कच्छप हो वगैरह-वगैरह, उन सभी के रूपों में वह कहा गया है।
  • पक्षी रूप और पुरुष रूप का विरोध: इसलिए पुरुष रूप में हम `मोद उत्तर पक्षह प्रमोद दक्षिण पक्षह` इन वचनों का उपसंहार कैसे करेंगे? उपसंहार को आप समन्वय के कॉन्टेक्स्ट में ही ले रहे हैं, हम तो उनका समन्वय पुरुष रूप में कैसे हो सकता है? तो यह बात असंगत हो जाती है, क्योंकि आनंदमय अधिकरण में पुरुष रूप की आनंदमयता का निरूपण नहीं किया गया है, पक्षी रूप की आनंदमयता का निरूपण हुआ है। इसलिए पुरुष रूप कैसे आनंदमय हो सकता है? यदि उपास्य का वैसा रूप स्वीकार ले तो उपसंहार करने में क्या आपत्ति है?
  • मोद और प्रमोद में उपचय-अपचय: पक्षी रूप में दो पक्षों के रूप में मोद और प्रमोद रूपी उपचित और अनुपचित दोनों आनंदों की एक साथ स्थिति दिखलाई गई है। देशभेद से भी दोनों भिन्न वस्तुएं हैं। नित्य आनंद रस ब्रह्म में ऐसे रूप की कल्पना ठीक नहीं है। ब्रह्म के अंदर जो पक्षी रूप ब्रह्म का जो वर्णन किया गया है, उसमें मोद जो है वो एक पक्ष है और प्रमोद जो है वह दूसरा पक्ष है और यह जो दोनों ही पक्ष हैं, वो दोनों के अंदर मतलब ऊपर नीचे होता है। तो उपचित और अनुपचित अर्थात कि एक में कोई भी प्रकार का वेरिएशन नहीं आता और दूसरे के अंदर कोई प्रकार का वेरिएशन आता है। इस प्रकार से निरूपण आनंदमय अधिकरण में हुआ है। पर यह दोनों ही प्रकार के आनंद अर्थात मोद और प्रमोद तो मोद नीचा है और प्रमोद प्रकृष्ट मोद प्रमोद इस दृष्टि से वह ऊंचा है। इसलिए मोद उपचित है और प्रमोद अनुपचित है।
  • ब्रह्म में आनंद के व्यत्यय का खंडन: पर यह दोनों ही आनंद एक ही जगह हैं, दो जगह पर नहीं हैं। अर्थात कि एक आनंद ये दो आनंद के स्वरूपों में भेद है, परंतु उनके अधिकरण में भेद नहीं है। हैं दोनों ही एक ही पक्षी की दो पंख। ऐसी स्थिति में देशभेद से भी दोनों अलग-अलग वस्तुएं हैं, क्योंकि अलग-अलग स्थान होने के कारण क्योंकि ब्रह्म जो है वह नित्य आनंद का रस है। इसलिए ब्रह्म के अंदर ऐसे उपचित और अनुपचित होने वाले आनंद रूप की कल्पना ठीक नहीं है। अर्थात कि वो यह जो निरूपण है, पक्षी रूप से वो किसी और का निरूपण है, निर्गुण ब्रह्म का निरूपण नहीं है।
५
समाधान - प्रिय शिरसत्व आदि भेदों का निराकरण
२२:०४ – २९:४२ — समाधान - प्रिय शिरसत्व आदि भेदों का निराकरण
समाधान - प्रिय शिरसत्व आदि भेदों का निराकरण
पाठ
(कोई विशेष पाठ नहीं)
वक्ता विवेचन
  • शंका का परिहार: उक्त शंका का परिहार करते हैं। शिरस्त आदि तो मूल में जो `प्रिय शिरस्त आदि अप्राप्ति ही उपचयोपचयो ही भेदे` उसका उत्तर दे रहे हैं कि यदि अथर्वणोपनिषद के उपास्य का आश्रय लेते हैं तो प्रिय शिरसत्व आदि विशिष्ट प्रकार के भेद हैं। उसके विषय में किसी प्रकार के संशय का स्थान नहीं है। वह ब्रह्म के अतिरिक्त कोई और है।
  • उपासक और गुणोपसंहार: प्रिय से आदि के रूप की उपासना करने वालों को भी आरवणिक उक्त धर्मों का उपसंहार करने में कोई अड़चन नहीं है, वे कर सकते हैं। और जो लोग पक्षी रूप से उपासना करते हो या पुरुष रूप से उपासना करते हो, वे सभी लोग अथर्वणोपनिषद में बताए गए इन सभी धर्मों का उपसंहार कर सकते हैं। उसमें उन्हें कोई समस्या नहीं होती है।
  • अभेद की सिद्धि: प्रियत्वा ज्ञान को चाहे चित्त शुद्धि के तारतम्य का हेतु माने या परोक्ष वाद माने, उस स्थिति में भी अभेद ही सिद्ध होगा। आपके कल्पित मोद प्रमोद का रूप नहीं सिद्ध होगा। अब यह प्रियत्व आदि क्योंकि वो यही इसका प्रिय होना प्रियत्व इसका शेर है मोद और प्रमोद ये दोनों उसके उत्तर पक्ष और दक्षिण पक्ष हैं। इस प्रकार के ब्रह्म के स्वरूप का जो ज्ञान है, उसे अगर हम चित्त शुद्धि के तारतम्य का हेतु मान लें अर्थात कि शंकराचार्य जी जिस तरह से इस प्रक्रिया को यूज करते हैं कि मुझे मेरे अंदर कोई प्रियता या मोद और प्रमोद आदि का आदि धर्मों का बोध नहीं होता है। ब्रह्म के अंदर जो है वो इन धर्मों का बोध हमें होता है। इसलिए जब हम चित्त शुद्धि के प्रोसेस के अंदर हैं, उस समय में हम ब्रह्म के अंदर उन गुणों का समन्वय करते हैं या ब्रह्म के उपास्य रूप के अंदर उन धर्मों का हम समन्वय करते हैं, तो उस प्रक्रिया में अगर कहते हैं तो भी या परोक्ष वाद मानते हैं अर्थात कि हमें ब्रह्म का प्रत्यक्ष तो हो नहीं रहा। हमें केवल परोक्ष रूप से ब्रह्म के सगुण रूप की अनुभूति हो रही है। उस स्थिति में भी अभेद की सिद्धि होती है कि वह एक ही तत्व है।
  • उपचय और अपचय का निराकरण: इसलिए मोद और प्रमोद में जो उपचय और अपचय की आर्गुमेंट देकर जब आप यह कहना चाहते हो कि वह पक्षी रूप का वर्णन निर्गुण ब्रह्म का वर्णन है ही नहीं, यह बात सिद्ध नहीं होती है। ब्रह्म धर्म ही भिन्न है। अगर शंकराचार्य जी भी यह कहेंगे कि मोद और प्रमोद यह दोनों शब्द उपचय और अपचय वाची हैं। अर्थात कि मोद जो है वह निचली कक्षा का है और प्रमोद जो है वह उत्तम कक्षा का है। ऐसा अगर हम बोलते भी हैं, तब भी शंकराचार्य जी का वस्तुतः ग्राउंड तो यही है, क्योंकि निर्गुण ब्रह्म और सगुण ब्रह्म के बीच में भेद तो उन्होंने भी एक्सेप्ट नहीं किया है। वह भी दोनों समान अधिकरण में ही रहते हैं। अर्थात एक ही ब्रह्म की प्रतीति जो है, वो हमें सगुण ब्रह्म के रूप में और निर्गुण ब्रह्म के रूप में होती है।
  • अद्वैतियों का मत: तो निर्गुण ब्रह्म ही हमें सगुण ब्रह्म के रूप में प्रतीत होने लगता है और सगुण ब्रह्म की ही निर्गुण ब्रह्मतया प्रतीति होती है, तो उन दोनों के अंदर कोई प्रकार का भेद तो है नहीं। तो जब उन दोनों में कोई प्रकार का भेद नहीं है, तो यह पक्षी का जो वर्णन किया गया है और उस पक्षी के वर्णन में उपचय और अपचय का जो निरूपण किया गया है, उसे स्वीकारने में तो शंकराचार्य जी को भी कोई समस्या नहीं होगी, क्योंकि अगर यह पक्षी का वर्णन किसी और का वर्णन है, ऐसा भी कहते हैं, तब भी जहां प्रमोद का वर्णन है, प्रमोद एक पक्ष का वर्णन है, वह भी परब्रह्म का निर्गुण ब्रह्म का होना चाहिए। और जहां मोद जो निचली कक्षा का है, उसका वर्णन हो रहा है, उसे आपको सगुण ब्रह्म का वर्णन कहना होगा। तो अगर आप ऐसा कहते भी हो, तब भी एक ही पक्षी के दो पंख के रूप में बोला जा रहा है, तो अद्वैतियों को भी यह बात तो ब्रह्म का ही निरूपण किया जा रहा है, इसी रूप में स्वीकार करनी पड़ेगी। क्योंकि अगर यह सगुण ब्रह्म का वर्णन है, ऐसा कह देते हैं, तो वहां प्रमोद नहीं हो सकता और अगर यह निर्गुण ब्रह्म का वर्णन है, ऐसा कह देते हैं, तो वहां मोद नहीं हो सकता है, यह प्रॉब्लम हो रही है। इसलिए पुरुषोत्तम जी इस बात को कह रहे हैं कि अगर आप चित्त शुद्धि के लिए ही केवल यह पक्षी रूप से ब्रह्म का वर्णन किया गया है, ऐसा अगर आप मानेंगे, तब भी इसी बात को आपको इसी तरह से अभेद में ही स्वीकारना पड़ेगा। यह सगुण ब्रह्म का वर्णन हो रहा है, ऐसा तो आप भी नहीं बोल सकते।
  • आचार्य जी का निष्कर्ष: ब्रह्म धर्म ही भिन्न हैं। उपासना की दृष्टि से उनका सिर हाथ आदि के रूप में निरूपण किया गया है। ब्रह्म के धर्म अलग हैं, भिन्न हैं। केवल उपासना के लिए ही एक मस्तक है, एक हाथ है, एक पंख है, दूसरा पंख है, ऐसे सब वर्णन किए गए। वस्तुत तो ब्रह्म में वो आनंद होमोजनियस होकर रहता है। उसमें ऐसे स्वगत का स्वीकार तो हम नहीं करते। हम में भी वैसा ही निरूपण करना चाहिए। यद्यपि आनंदमयाधिकरण के अनुसार ही अर्थ करने पर उक्त शंका उठ ही नहीं सकती। फिर भी गुणों संहार के प्रसंग में मिथ्यावादियों के मत से यह शंका पूरी तौर से उठ सकती है, ऐसा आचार्य पहले ही बताकर निराकरण कर चुके हैं।
  • मायावादियों का मत: मायावादी लोग जिस तरह के मत का स्वीकार कर सकते हैं, वहां यह संशय उपस्थित होता है, क्योंकि वहां ब्रह्म के अंदर आविर्भाव के सिद्धांत के अनुसार या कारण कार्य संबंध के अनुसार भी कोई भी प्रकार का व्यत्यय स्वीकारा नहीं जा सकता है उनके सिद्धांत में। इसीलिए यह संशय को गुणोपसंहार के प्रसंग में उपस्थित करके और उसका निराकरण किया गया है।
६
शंका - उपास्य रूप में विरुद्ध गुणों का उपसंहार करना चाहिए?
२९:४२ – ३२:२७ — शंका - उपास्य रूप में विरुद्ध गुणों का उपसंहार करना चाहिए?
शंका - उपास्य रूप में विरुद्ध गुणों का उपसंहार करना चाहिए?
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(कोई विशेष पाठ नहीं)
वक्ता विवेचन
  • विरुद्ध गुणों का उपसंहार: उपास्य रूप से जो गुण अविरुद्ध हैं, उन्हें उपसंहार कर सकते हैं। विरुद्ध गुणों को भले ही ना करें। अब आगे नया संशय उपस्थित हो रहा है कि जो ब्रह्म का उपास्य रूप है, उसमें जो भी अविरुद्ध गुण हैं, उनका तो हम उपसंहार कर सकते हैं, पर कोई गुण अगर विरुद्ध है, तो उनका उपसंहार तो हम उपास्य रूप में नहीं कर सकते। पुरुष रूप में पक्ष आदि रूप विरुद्ध है।
  • विरुद्ध गुणों के उदाहरण: यहां विरुद्ध क्या है? जैसे शेर है तो सिर तो ठीक है। पक्षी का भी होता है, पुरुष का भी होता है। पर पुरुष के पंख नहीं होते हैं। तो पंखा आदि रूपों में पक्षी रूप से जो वर्णन किया गया है, वह तो पुरुष रूप से विरुद्ध है। उसका उपसंहार नहीं करना चाहिए, ऐसा मत प्रस्तुत करते हुए समाधान करते हैं। ऐसे ही ब्रह्म के अंदर बहुत से ऐसे धर्म जो है, वह हमें प्रतीत होते रहते हैं। तो कुछ धर्मों को पढ़कर हमें ऐसा लगता है कि नहीं-नहीं भगवान ऐसा थोड़ी कर सकते हैं। जिसके लिए हमने बहुत से उदाहरण देखे हैं।
  • भक्तों और देवताओं की असमर्थता: गरुड़ जी को भी रामचंद्र जी को नागपाश में देखकर ऐसा लगा कि नहीं, यह तो भगवान के साथ ऐसा नहीं हो सकता है। या उखल बंधन के प्रसंग में देखकर हमें भी ऐसा लगा नहीं, भगवान नहीं बंध सकते हैं। या भगवान तो ऐसे प्राकृत शिशु नहीं हो सकते हैं। इंद्र ने भी जैसे भगवान को नहीं पहचाना कि ग्वालियर के रूप में तो परब्रह्म नहीं हो सकते। ब्रह्मा जी ने भी नहीं पहचाना कि ये जंगल में घूमने वाले गाय चरायने वाले ये तो परब्रह्म नहीं हो सकते। तो ऐसे जहां भगवान कोई अविरुद्ध धर्म प्रकट करते हैं, तो उनका उपसंहार करने में तो सरलता होती है, परंतु कोई विरुद्ध धर्म भगवान अपने अंदर प्रकट करते हैं, तो हम उन्हें भगवान के धर्मों के रूप में स्वीकार नहीं पाते या उन्हें हम भगवान के धर्मों के रूप में समझ नहीं पाते हैं। इसलिए यह संशय यहां अब उपस्थित करके आगे उसका निराकरण कर रहे हैं।
७
सूत्र १३ - अध्यानाय प्रयोजनाभावात् - विरुद्ध धर्मों का भी उपसंहार
३२:२७ – ३९:४८ — सूत्र १३ - अध्यानाय प्रयोजनाभावात् - विरुद्ध धर्मों का भी उपसंहार
सूत्र १३ - अध्यानाय प्रयोजनाभावात् - विरुद्ध धर्मों का भी उपसंहार
पाठ
अध्यानाय प्रयोजन भावात
वक्ता विवेचन
  • विरुद्ध धर्मों का उपसंहार: इत्थ सामान्यात आनंदमय से भिन्न पुरुष रूप में विरुद्ध रूप से प्रतीत होने वाले जो धर्म हैं, उनका उपसंहार करना चाहिए। सूत्रस्थ `तू` शब्द विरोध निरास का ज्ञापक है। आनंदमय लक्षण वाला पदार्थ और पुरुष पदार्थ एक ही है। आनंदमयाधिकरण में पक्षी रूप से जिसका वर्णन किया गया है, वह और पांचत्र आगम आदि में जो उसकी उपास्य रूपता में पुरुष रूपता का निरूपण किया गया है, वो या पुरुष सूक्त वगैरह में भी गीता जी में भी जो पुरुष रूप से विराट पुरुष के दर्शन हुए, ऐसा या पुरुष सूक्त में भी सहस्त्र शीर्षा पुरुष करके जिसका निरूपण किया गया है, वो सब कुछ जो है वो एक ही तत्व है।
  • ध्यानादि हेतु उपयोगी धर्म: इसलिए, आनंद मयाधिकरण में जो निरूपण किया गया है, उसका उपसंहार पुरुष रूप में हो सकता है। यह आज्ञा यहां पर। आनंद मयाधिकरण के प्रियत्व आदि जो धर्म हैं, उन्हीं का उपसंहार करना चाहिए। पुरुष रूप में पक्ष आदि रूप का उपसंहार नहीं करना चाहिए। इसे अग्रिम सूत्र में कहते हैं।
  • प्रयोजन आधारित उपसंहार: आनंदमयाधिकरण में प्रियत्व आदि जो धर्म कहे गए हैं, उनका उपसंहार तो करना चाहिए, पर पुरुष रूप में पंखों वाले वो हैं, इस प्रकार के पक्ष आदि रूप का उपसंहार नहीं करना चाहिए। अब इसे आगे के सूत्र से बता रहे हैं। आनंद स्वरूप के जितने धर्म भक्ति मार्ग के लिए परोक्षवाद से कहे गए हैं, उनमें प्रियत्व आदि ही प्रधान है। ध्यान के लिए वे ही उपयोगी हैं। उन्हीं का उपसंहार करना चाहिए। ध्यान में उतने मात्र से ही प्रयोजन है, अधिक से नहीं। इसलिए उससे अधिक उपसंहार की आवश्यकता नहीं है।
  • पुष्टिमार्ग में अवतारों का भावन: अब यहां आनंद स्वरूप का जो हमें चिंतन करना है, ब्रह्म के आनंद गुणधर्मों से युक्त ब्रह्म के स्वरूप का हमें चिंतन करना है। चित्त शुद्धि के लिए नहीं, पर वही पुनः हम निरोध के लिए या जो भी व्यक्ति का अपना प्रयोजन हो, उसके लिए। तो इसमें हम जब ब्रह्म के धर्मों का उपसंहार करेंगे, तो हमें उन्हीं धर्मों का उपसंहार करना चाहिए, जिनकी हमें अपनी प्रयोजन सिद्धि के लिए आवश्यकता है। अन्य धर्मों के उपसंहार की वहां आवश्यकता नहीं है।
  • वामन-नरसिंह जयंती का उदाहरण: कल वामन जयंती है। नरसिम जयंती भी आती है। दोनों जयंतियों के विषय में अपने यहां की भी परंपरा इस प्रकार की है कि हमें अगर अपने सेव्य में वो गुण गुणों का उपसंहार कर पाना आता हो। कि मुझे कृष्ण ही नरसिम लगते हो, अर्थात मेरे सेवे ही नरसिंह लगते हो या मेरे सेवे ही मुझे वामन के रूप में प्रतीत होते हो, तब ही महाप्रभु जी आज्ञा करते हैं कि उनका उन उत्सवों को हमें सेवा में मनाना चाहिए। यदि किसी भी व्यक्ति को इस प्रकार का गुणों पर संहार करने में क्लेश होता हो या उनके चित्त में इस बात की स्वीकृति ना आती हो कि नहीं-नहीं मेरे सेव्य का स्वरूप नरसिम जी के जैसा ऐसा घोर नहीं हो सकता है या मेरे जो सेव्य हैं, उनका स्वरूप ये वामन जी के जैसा नहीं हो सकता है, ऐसी अगर उसके चित्त में प्रतीति होती हो, तो महाप्रभु जी आज्ञा करते हैं कि केवल जयंती व्रत देहाभिमानी होने के नाते हमें करना चाहिए। परंतु हमें वहां सेवा के अंदर उन उत्सवों को मनाने की आवश्यकता नहीं है।
  • सिद्धान्त और आवश्यकता में भेद: अब यह जो प्रक्रिया है, उसमें हम गुणोपसंहार को वहां योजित नहीं कर रहे। अर्थात कि हम वहां सेवा के अंदर इस बात का भावन नहीं कर रहे कि कृष्ण ही नरसिम हुए हैं या इस बात का भावन नहीं कर रहे कि कृष्ण ही वामन हुए हैं। परंतु उससे सिद्धांत नहीं बदलता है। परंतु जो सेवक है, वो सेवक तो जब आनंद का अनुभव कर रहा है या सेवा कर रहा है और उसे सेवा करते समय जो अनुभूति होनी है, उस अनुभूति के अंदर यदि यह बाधा रूप प्रतीत होता हो या उसे ऐसा लगता हो कि यहां यह बीच में अड़चन रूप हो रहा है, ऐसी अगर उसकी प्रतीति होती हो या उसके भाव से वह समन्वित ना होते हो, तो जैसे महाप्रभु जी आज्ञा कर रहे हैं कि उस गुणों पर संहार की आवश्यकता नहीं है। बस उसी प्रकार से यहां भी तत्व सिद्धांत गुणों पर संहार नहीं है, इस बात का निरूपण नहीं करना चाहते, परंतु उन धर्मों के उपसंहार की आवश्यकता नहीं है, इतना ही कहना चाहते हैं।
८
सूत्र १४ - आत्मशब्दाच्च - आनंदमय परमात्मा का निरूपण
३९:४८ – ५०:१९ — सूत्र १४ - आत्मशब्दाच्च - आनंदमय परमात्मा का निरूपण
सूत्र १४ - आत्मशब्दाच्च - आनंदमय परमात्मा का निरूपण
पाठ
आत्म शब्दात च
वक्ता विवेचन
  • आत्म शब्द का तात्पर्य: आत्म शब्दात च आत्म शब्द से भी यह सूत्र का तात्पर्य है। प्रियव इत्यादि में जो परोक्षवाद से प्रिय प्राधान्य की भावना है, उन्हीं का आश्रय लेना चाहिए। चिर पक्ष आदि की भावना नहीं करनी चाहिए। उनका कोई प्रयोजन नहीं है।
  • ब्रह्म में आनंद का प्राचुर्य: प्रियव सिर मोद उत्तर पक्ष प्रमोद दक्षिण पक्ष ऐसे निरूपण में जो एक पक्षी का स्वरूप वहां सोचा जा रहा है कि ब्रह्म का यह स्वरूप है और इस स्वरूप में प्रियता उसका मस्तक है और मोद और प्रमोद ये दोनों उसके पंख हैं। ऐसा जो निरूपण किया जा रहा है, उसकी प्रधानता नहीं है। प्रधानता इस बात की है कि ब्रह्म जो है वह आनंद से प्रचुर है। आनंद धर्म का ब्रह्म में प्राचुर्य है, इस विषय इतनी प्रधानता है।
  • रस की आत्मा आनंद: इसलिए जो स्वरूप निरूपित किया जा रहा है, उसका वहां प्राधान्य नहीं है। आनंद आत्मा इस वाक्यांश से पूर्वोक्त प्रिय प्राधान्य आदि रसात्मक वस्तुओं का आत्मा आनंद को कहा गया है। जितने भी रस रूप पदार्थ वह सभी रसात्मक पदार्थों की आत्मा क्या है? कहां से वह रस प्रकट हो रहा है? उसका उद्गम कहां है? उसका उपादान कहां है? तो वो आनंद है। उसके आगे `रसो वैसह` इत्यादि से रस के स्थाई भावात्मक उसी आनंद की व्याख्या है और फिर वही आनंद जो है, वो रस रूप है, ऐसा बताते हुए उसकी व्याख्या की गई है।
  • लीला और उत्तम अधिकारी: प्रिय विषयक लीला के मध्य में डूबते उतराते भक्त को रसात्मक अनुभूतियां भी आनंद रूप ही हैं। ऐसी अनुभूतियां उत्तम अधिकारियों को ही होती हैं। इसी भाव को श्रुति ने ध्येय के स्थिरपक्ष आदि रूपों से निरूपण किया है। जो भी व्यक्ति लीला का ब्रह्म की लीला का आनंद ले रहा है, ऐसे व्यक्ति को जब भी कोई वो ब्रह्म उस रस में डूबता है या उस रस में से बाहर निकलता है, तो सर्वत्र उस भक्त को रसात्मक अनुभूतियां आनंद रूपता की ही होती हैं। पर यह उत्तमाधिकारियों को होती है। इसी भाव को श्रुति बताना चाहती है कि वह ब्रह्म का मस्तक, ब्रह्म के पंख अर्थात जिसे हम किसी को उठाएं, किसी को डुबो दें, किसी को रख दें, यह सभी कार्य आनंद के द्वारा होते हैं।
  • उपासना मार्ग में विभूति रूप: उक्त प्रकरण से भी ज्ञापन होता है कि उक्त रूप की जो क्रमिक उपास्यता है, उसका अल्पकालीन ही महत्व होता है। अतः उपासना मार्गीय उपास्य विभूति रूप है, मूल रूप नहीं है। य योगेन इत्यादि वाक्य से यही स्पष्ट होता है। आनंदमयाधिकरण का जो पूरा प्रकरण है और फिर पांच रात्र में जो पुरुष रूप से निरूपित किया गया, वहां ये जो उक्त ये जो रूप है, उसकी जो क्रमिक उपासना बताई है, वो अल्पकालीन ही है अर्थात थोड़े समय के लिए ही वह बताई गई है। क्योंकि उपासना मार्ग के अंदर जो उपास्य होते हैं, वह विभूति होते हैं। विभूति इसलिए होते हैं, क्योंकि जो व्यक्ति है, वह रूपनिष्ठ नहीं है, फलनिष्ठ है। तो वो जो भी एक्स व जेड उपास्य रूप है, उसकी उपासना मोक्ष के लिए कर रहा है। तो वो स्टेपिंग स्टोन की तरह यूज करने के लिए केवल है। इसलिए वह विभूति रूप से ही होते हैं, मूल रूप से नहीं होते। इसीलिए उनकी उपासना भी अल्पकालीन होती है।
  • आनंदमय: जीव या ब्रह्म?: तैतरीय उपनिषद में जहां अन्नमय आदि का निरूपण किया गया है, वहां उन्हें पुरुष रूप से बतलाकर इसका `वही शरीर आत्म है जो पूर्व का है` इत्यादि सब जगह कहा गया आनंदमय के वर्णन तक उत्तर उक्त प्रकार से दो शरीर आत्मा की बात दोहराई गई है। तैतरीय उपनिषद में अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय इस तरह जो पांच कोषों का वर्णन प्राप्त होता है। वहां भी पुरुष रूप से उस आनंदमयता को बता के ये जो अन्नमय पर्यंत जो उसका शरीर है, उसकी आत्मा आनंदमय है, इस प्रकार से कहा गया है। वहां आनंदमय का वर्णन दो तरह से प्राप्त होता है और वहां वह शरीर आत्मा अर्थात जैसे हमारा एक शरीर होता है और शरीर के अंदर आत्मा रहती है, उस तरह से अन्नमय से लेकर विज्ञानमय पर्यंत के चार शरीर और उन चारों शरीर की आत्मा के रूप में आनंदमयता का निरूपण किया गया है। तो पुरुष रूप से या पक्षी रूप से नहीं किया गया, पर आत्मा रूप से किया गया है। इससे संशय होता है कि शरीराभिमानी जीव है या ब्रह्म है। शारीर पद से तो जीव होने की ही संभावना अधिक है, क्योंकि शरीर का अभिमानी आत्मा तो जीवात्मा होता है, परमात्मा नहीं होता है। तो यह वचन को पढ़ने पर तो ऐसा लगता है कि वहां जीव की बात कही गई है, क्योंकि उसे ही इस नाम से कहा जाता है। तो शारीर पद अर्थात शरीर में रहने वाला तो वो तो जीवात्मा होता है।
  • भार्गवी विद्या का प्रमाण: यदि शारीर जीव है तो आनंदमय का ब्रह्मत्व भी संशय नहीं है, ऐसी भी श्रुति है और अगर वह शारीर पद के द्वारा वहां जीवात्मा को कहा जा रहा है, तो आनंदमय का ब्रह्मत्व भी संशयित नहीं है। भार्गव्य विद्या में उल्लेख को `ब्रह्म ही जानो` इत्यादि से प्रारंभ करके आनंदमय तक कहते हुए अंत में कहते हैं `आनंद ब्रह्म है` ऐसा जानो। इससे तो ब्रह्मत्व की ही सिद्धि होती है।
९
सूत्र १४ - आत्मशब्दाच्च - पूर्वस्थ और उत्तरस्थ ब्रह्म की एकरूपता
५०:१९ – ५९:०९ — सूत्र १४ - आत्मशब्दाच्च - पूर्वस्थ और उत्तरस्थ ब्रह्म की एकरूपता
सूत्र १४ - आत्मशब्दाच्च - पूर्वस्थ और उत्तरस्थ ब्रह्म की एकरूपता
पाठ
(कोई विशेष पाठ नहीं)
वक्ता विवेचन
  • ब्रह्म की एकरूपता: अन्योनंतरात्मा ऐसा भी सब जगह कहा गया है। अन्नमय को छोड़ दिया गया है। पूर्व निरूपित वस्तु को ही `यह स इत` ऐसा कहा गया है। अन्य भी जो भी वाक्य हैं, अन्योनंतरात्मा सभी के अंदर रहने वाली ये आत्मा अन्य है। अन्नमय को हटाकर और आनंदमयता का भी निरूपण है। `यह स इत` अर्थात कि जो अन्नमय से अलग है, ऐसा भी है। तथा `यह पूर्वस्य` जो पहले से है, पहले भी निरूपित है, इत्यादि श्रुति `इत` की तरह अर्थात पूर्व निरूपित की तरह प्रकृत वस्तु को आत्मा बतला रही है। जिससे भी यह निर्णय होता है कि जो उत्तरस्थ है, वही पूर्व की तरह है।
  • कपिल गीता का संदर्भ: जो उत्तरस्थ अर्थात जो बाद में आत्मा रूप से दिखाई दे रहा है, वही पूर्व भी है। पहले भी वही है और बाद में भी वही है। अर्थात कि जो यह प्रोसेस कपिल गीता के अंदर बताई जा रही है कि ब्रह्म जो है, वह पहले तो अपने अंदर ही इस जगत का निर्माण करता है। अपने गर्भ में उस गर्भ में जगत का निर्माण करने के बाद जब वो ये देखता है कि ये पांचों तत्व एक दूसरे के साथ सिंक नहीं हो रहे, तब उसे यह लगता है कि मुझे अंतः प्रविष्ट होकर और इसको चलाना है। जिसे हम यह कहते हैं कि ब्रह्म ने अपनी रज रजोगुण के द्वारा उन्हें क्रियान्वित किया। तो उसे जो क्रियान्वित करने की जो प्रक्रिया है, वह क्रियान्वितता भी ब्रह्म ही करते हैं। इसलिए अपने अंदर बनाए हुए में पुनः अंदर प्रविष्ट होते हैं। इसलिए जगत के बाहर भी ब्रह्म है और जगत के अंदर भी ब्रह्म है। इस प्रकार से ब्रह्म का निरूपण वहां प्राप्त होता है।
  • आनंदमय परमात्मा है: जिससे यहां यह समन्वय कर रहे हैं कि वो ब्रह्म ही बाहर भी है और वह ब्रह्म भी अंदर ही है। इसलिए जो उत्तरस्थ है, वही पूर्व की तरह है। इसलिए वो आनंदमय शब्द से वाची परमात्मा है। आगे के सूत्र में और इसको स्पष्ट करेंगे। पर वह जीवात्मा नहीं है, पर परमात्मा है, ऐसा कहकर आगे के सूत्र से यह अधिकरण संपन्न होगा।
  • प्रश्न: `नीलेश भाई` ने `कपिल गीता` के उदाहरण को `पूर्वस्थ-उत्तरस्थ` की अवधारणा से जोड़कर समझने पर संतुष्टि व्यक्त की।
  • उत्तर: वक्ता ने पुष्टि की कि `कपिल गीता` में भी जो पूरा निरूपण किया गया है, वह इसी पूरा प्रविष्ट पक्षी के रूप में जो ब्रह्म का निरूपण है, उसी के संदर्भ से है।
  • अल्पकालीन उपासना का महत्व: यहां अल्पकालीन क्यों कहा है इनको? क्योंकि उत्तमाधिकारी मतलब मध्यम और उसके लिए अल्पकालीन कहा। जिन्हें गणितानंद का अनुभव विभूति उपासना को अल्पकालीन करें। तो जो उत्तम उत्तम अधिकारी की जो बात है, वो आगे जो कहा ना कि प्रिय विषयक लीला वाला जो पोर्शन है, वो उत्तम अधिकारी के लिए और बाकी की जो बात की वो मध्यम या गणितानंद की बात ही ऐसे दो डिफरेंट लेना है। क्योंकि मोद और प्रमोद में उपचय और अपचय है, इस बात को तो कोई नकार नहीं सकता है ना। हम भी उसे डिनाई नहीं करते। गणितानंद और पूर्णानंद दो एंटिटीज है, ऐसा तो हम बोल नहीं सकते, क्योंकि अल्टीमेटली तो ब्रह्म एक ही होता है, दो नहीं होता है। और जो गणितानंद है, वह मिथ्या है, ऐसा भी हम शंकराचार्य की तरह नहीं बोल सकते हैं। तो गणितानंद भी सत्य है और पूर्णानंद भी सत्य है, हमें तो दोनों ही बात को मानना पड़ेगा। अब ऐसी स्थिति में जिन्हें उत्तमाधिकारी हैं, जो उन्हें पूर्ण का अनुभव हो रहा है और जो मध्यमाधिकारी या हिनाधिकारी हैं, उन्हें गणितानंद का अनुभव हो रहा है, तो वहां एक ही रूप में अर्थात ब्रह्म ही विभूति रूप भी बन रहे हैं और ब्रह्म ही पूर्ण रूप भी बन रहे हैं। ऐसा ही हमें कहना पड़ेगा। वो दो एंटिटीज हैं और दो में अलग-अलग धर्म प्रकट हो रहे हैं, ऐसा तो हम ब्रह्मवादी होकर नहीं बोल सकते। इसलिए उसका यह निराकरण है कि वह विभूति रूप से होता है।
  • सगुण-निर्गुण का समन्वय: माने जो सगुण और निर्गुण है, हम ऐसा तो कहेंगे नहीं जैसा आपने बताया कि वो जो श्रीपुरुषोत्तम जी ने आज्ञा करी कि भाई वो तो भी पक्षी तो एक ही रहेगा, तो अब हम ऐसा तो कह नहीं सक रहे। और शंकर भी यदि ऐसा मान रहे हैं, तो भी उनको यह स्वीकार करना पड़ेगा कि पक्षी तो एक ही है। तो हम यह उसका सशन हमारे पास ये आ रहा है कि वो क्रमिक रूप से उपासित है यहां पर। यह जो जैसा आपने बताया ना कपिल गीता की प्रक्रिया वाली और वो जैसे ही माने जो उत्तर है, वही पूर्व यानी जो पहले वह आत्मा था आनंदमय, वही पश्चात में भी वही आनंदम में आत्मा है।
📖 सार
📌 सार
- ब्रह्मसूत्राणुभाष्य के तृतीय अध्याय में समन्वयाधिकरण के सूत्रों पर विवेचन हुआ।
- वक्ता ने ज्ञान, कर्म, और उपासना मार्गों में ब्रह्म के गुणों के समन्वय को स्पष्ट किया।
- शंकराचार्य जी के गुणोपसंहार के सिद्धांत और पुष्टिमार्गीय मत के भेद पर चर्चा हुई, जहां मिथ्यावाद का खंडन किया गया।
- आनंदमयोपासना में पक्षी रूप और पुरुष रूप के समन्वय संबंधी शंकाओं का निराकरण करते हुए ब्रह्म की आनंदमयता में उपचय-अपचय का भेद अस्वीकृत किया गया।
- विरुद्ध प्रतीत होने वाले धर्मों के उपसंहार की आवश्यकता को `अध्यानाय प्रयोजनाभावात्` सूत्र से समझाते हुए बताया गया कि उपासना में प्रयोजन ही मुख्य है।
- `आत्मशब्दाच्च` सूत्र के माध्यम से आनंदमय को जीवात्मा न मानकर परमात्मा ही सिद्ध किया गया, जिसे कपिल गीता के पूर्वस्थ-उत्तरस्थ सिद्धांत से समझाया गया।
- उत्तमाधिकारी को पूर्णानंद का अनुभव होता है, जबकि मध्यम अधिकारी के लिए विभूति उपासना अल्पकालीन होती है, परंतु गणितानंद भी सत्य है।