॥ ब्रह्मसूत्राणुभाष्य-१/७/१६-१९ ॥

श्रीवल्लभाचार्य विद्यापीठ, हालोल — नित्य पुष्टिस्वाध्याय
📅 24 September 2026
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परिचय एवं सन्दर्भ

यह सत्र ब्रह्मसूत्राणुभाष्य के प्रथम पाद, सप्तम अधिकरण (आनंदमयाधिकरण) के सूत्र १६ से १९ तक के विषय का पुनरावर्तन और विवेचन करता है। सत्र का मुख्य विषय `गुणोपसंहार न्याय` के संदर्भ में जीवात्मा और परमात्मा के मध्य आनंदमयता के धर्म के निरूपण की भिन्न-भिन्न पद्धतियों पर केंद्रित है। वक्ता ने विशेष रूप से आनंदमय पद के परमात्मा परक अर्थ को स्पष्ट किया।

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सत्र परिचय
पाठ
(कोई विशेष सूत्र नहीं)
प्रतिभागी वाचन
वक्ता ने सत्र की शुरुआत में बताया कि पिछले सत्र का विषय थोड़ा कठिन था, इसलिए पहले उसका पुनरावर्तन किया जाएगा, फिर आगे का सूत्र देखेंगे। श्याम काका जी के पिछले प्रवचन का संदर्भ भी दिया, जिसमें जीवात्मा और ब्रह्म के बीच व्यापकता के धर्म, गुणों के संहार और ब्रह्म-जीव के भेद-अभेद पर चर्चा हुई थी।
वक्ता विवेचन
  • वक्ता का स्पष्टीकरण: वक्ता ने बताया कि शास्त्र जीवात्मा और परमात्मा के बीच समन्वय साधित करता है, इसलिए आत्मा शब्द का प्रयोग दोनों के लिए होता है। इससे संशय उत्पन्न होता है कि कहाँ जीवात्मा के धर्मों का और कहाँ ब्रह्म के धर्मों का निरूपण हो रहा है। महाप्रभुजी ने `शास्त्रार्थ प्रकरण` के `जीव प्रकरण` और `सर्वनिर्णय` के `प्रमेय प्रकरण` में इस विषय का विस्तृत निरूपण किया है। वामदेव जी के चरित्र का उदाहरण देते हुए बताया कि वामदेव जी ने ब्रह्म के समान जो व्यापकता के धर्म बोले थे, वे उनके अपने धर्म नहीं, बल्कि आगंतुक धर्म थे जो ब्रह्म के आवेश से प्रकट हुए थे।
२
`गुणोपसंहार न्याय` और आत्मा शब्द का प्रयोग
००:३१ – ०५:१६ — `गुणोपसंहार न्याय` और आत्मा शब्द का प्रयोग
`गुणोपसंहार न्याय` और आत्मा शब्द का प्रयोग
पाठ
(कोई विशेष सूत्र नहीं)
प्रतिभागी वाचन
वक्ता ने `गुणोपसंहार न्याय` के विषय को समझाते हुए बताया कि ब्रह्म और जीवात्मा दोनों के लिए आत्मा शब्द का प्रयोग होने से यह निर्णय नहीं हो पाता कि आत्मा शब्द से किसका अभिप्राय है। यह विचारकों में संशय उत्पन्न करता है कि ब्रह्म के किन धर्मों का निरूपण हो रहा है।
वक्ता विवेचन
  • वक्ता का अतिरिक्त स्पष्टीकरण: वक्ता ने बताया कि शास्त्र में परमात्मा का वर्णन शारीर आत्मा के रूप में होता है, क्योंकि अन्नमय आदि भी ब्रह्म के शरीर की तरह हैं। शास्त्र यह देखता है कि हम ब्रह्म को किस प्रक्रिया से समझ सकते हैं। मनुष्य होने के नाते हम अपने शरीर और आत्मा के संबंध से समझते हैं, जैसे शरीर के अंदर दूसरा शरीर, और उसके अंदर जीवात्मा। इसी तरह ब्रह्म भी जगत को उत्पन्न करते हैं और अपने धर्मों को धारण करते हैं। रामानुज संप्रदाय में भी देहात्म संबंध से विशिष्टाद्वैत को बताया गया है कि जड़ और चेतन दोनों नारायण के शरीर हैं, और नारायण आत्मा के रूप में उनमें स्थित रहते हैं, जिससे जगत की उत्पत्ति होती है। पुरुष सूक्त में भी पुरुष शरीर के द्वारा ही जगत के विस्तार का उदाहरण दिया गया है। पक्षी के उदाहरण से भी बताया गया कि ब्रह्म ब्रह्मांड का निर्माण करते हैं और फिर उसमें प्रविष्ट होकर उसका संचालन करते हैं, जिसे अंतर्यामी कहते हैं।
३
आनंदमयता में ब्रह्म और जीव का संबंध
०५:१६ – २६:३३ — आनंदमयता में ब्रह्म और जीव का संबंध
आनंदमयता में ब्रह्म और जीव का संबंध
पाठ
(कोई विशेष सूत्र नहीं, `ब्रह्मसूत्राणुभाष्य-१/७/१६` का संदर्भ)
प्रतिभागी वाचन
वक्ता ने `ब्रह्मसूत्राणुभाष्य-१/७/१६` का संदर्भ देते हुए बताया कि `आनंद आत्मा` इस वाक्य से रसात्मक वस्तुओं का आत्मा आनंद बताया गया है, और `रसो वै सः` से उसी आनंद को रस रूप में बताया गया है। हम सभी उस रस की मात्रा का उपजीवन करते हैं, और जितना आनंद या सुख का अनुभव करते हैं वह ब्रह्म का रस है।
वक्ता विवेचन
  • वक्ता का अतिरिक्त स्पष्टीकरण: वक्ता ने कहा कि ब्रह्म व्यापक और पूर्ण हैं, इसलिए उनके सभी धर्मों को भी पूर्ण होना चाहिए। परंतु अक्षर, अंतर्यामी आदि रूपों में आनंद के धर्म में परिवर्तन दिखता है, वह पूर्ण रूप में प्रकट नहीं होता, बल्कि गणितानंद के रूप में प्रतीत होता है। `मोद` और `प्रमोद उत्तर पक्षह दक्षिण पक्षह` कहकर श्रुति ने आनंद की मात्राओं का निरूपण किया है। वक्ता ने कहा कि अक्षर या अंतर्यामी का आनंद भी ब्रह्म का ही आनंद है, ऐसा कहकर हम आनंद की मात्रा की गणना करते हैं, जिसमें ब्रह्म के आनंद की पूर्णता और अपूर्णता दोनों का वर्णन होता है। `आविर्भाव-तिरोभाव` के सिद्धांत से इसका समन्वय किया जाता है कि वह तिरोहित है। वक्ता ने पुनः `तैत्तिरीय उपनिषद` में अन्नमय आदि का निरूपण शारीर आत्मा के रूप में होने पर `शारीर आत्मा` को जीवात्मा मानने के पूर्वपक्षी के तर्क को समझाया, जो आनंदमय को ब्रह्म मानने पर संशय उत्पन्न करता है। पूर्वपक्षी का तर्क है कि आनंदमय का ब्रह्मत्व संशयित नहीं है, क्योंकि भार्गवी विद्या में उल्लेखित को ब्रह्म जानना चाहिए, और आनंदमयता की गणना करते-करते आनंद ब्रह्म है ऐसा बोलकर ब्रह्मत्व सिद्ध किया जाता है।
  • गोसाईं जी का मत: श्री गोसाईं जी ने भाष्य में इस दुविधा का निराकरण किया कि परमात्मा को भी आत्मा शब्द से बोला जाता है। आनंदमय पहले, मध्य में और प्रकट होने पर भी आनंदमय ही है, क्योंकि वह आनंदमय ही है। अन्नमय, प्राणमय, विज्ञानमय, मनोमय ये चार कोष शरीर रूप कहे गए हैं, जिनमें ब्रह्म अंतः प्रविष्ट भी होते हैं और बाहर भी होते हैं। ये सभी ब्रह्म के शरीर हैं, जैसे जीवात्मा के स्थूल और सूक्ष्म शरीर होते हैं। इसलिए अंतः प्रविष्ट तत्व को भी आनंदमय कहा गया है। `अन्न्योरात्मा` जैसे श्रुति वचनों में अन्नमयता को छोड़ा गया है, यह बताने के लिए कि ब्रह्म इन देहों को धारण करने से पूर्व भी है और बाद में भी, और `पूर्व स्थित` व `उत्तर स्थित` दोनों ही ब्रह्म हैं, इसलिए यह वर्णन परमात्मा का है, जीवात्मा का नहीं।
  • अद्वैत मत का संदर्भ: पूर्व पक्षी के लिए यह बात समस्याजनक है, क्योंकि उनके मत में ब्रह्म ही आत्मा है और जीवात्मा व परमात्मा में कोई भेद नहीं है। `गुणोपसंहार` की एक प्रक्रिया इतनी अभेद युक्त है कि भेद को मिथ्या और अभेद को सत्य कह सकते हैं। दूसरी प्रक्रिया यह है कि ब्रह्म ही जीवात्मा रूप हुआ है, इसलिए जीवात्मा में आनंदमयता का निरूपण समस्याजनक नहीं, क्योंकि दोनों में एकता है। यदि दोनों एक तत्व नहीं हैं, तो इन वाक्यों का समन्वय कैसे किया जाए, यह उनकी समस्या है।
  • महाप्रभुजी का समाधान: महाप्रभुजी का जवाब है कि वह ब्रह्म ही इस रूप में बनते हैं।
  • प्रश्न: एक प्रतिभागी ने पूछा कि आनंद में भी, अपने मत के अनुसार, जैसे ब्रह्म एक भी और अनेक भी है, वैसे ही आनंद को भी सब्सटेंशियली एक लेकिन फंक्शनली अलग-अलग देखेंगे।
  • उत्तर: वक्ता ने पुष्टि की कि हाँ, तभी तो `गुणोपसंहार` हो सकता है। ब्रह्म अनेक बन भी जा रहा है और अपने धर्मों को कुछ-कुछ मात्राओं में सभी पदार्थों के अंदर स्थापित भी कर दे रहा है, जिससे हमें उन धर्मों का अनुभव वहां-वहां हो रहा है। जैसे मुझे अपने अंदर चैतन्य का अनुभव हो रहा है, यह चैतन्य भी ब्रह्म का धर्म है जो अंश होने के नाते मेरे अंदर आया है और मुझे पार्शियली उसकी प्रतीति हो रही है। अंशांशी संबंध में पार्शियल प्रतीति को आराम से बताया जा सकता है।
४
`बिंब प्रतिबिंब भाव` बनाम `अंशांशी संबंध`
२६:३३ – ३०:२७ — `बिंब प्रतिबिंब भाव` बनाम `अंशांशी संबंध`
`बिंब प्रतिबिंब भाव` बनाम `अंशांशी संबंध`
पाठ
(कोई विशेष सूत्र नहीं)
प्रतिभागी वाचन
एक प्रतिभागी ने शंकराचार्य जी के मत को स्पष्ट करते हुए कहा कि उनके अनुसार सब्सटेंस ही क्वालिटी नहीं है, और जो क्वालिटी दिख रही है वह अज्ञान में मिरर भाव के कारण उत्पन्न हुआ झांसा है। मूल में सब्सटेंस ही है, इसलिए आनंद में भी बिंब प्रतिबिंब से ही गुणोपसंहार मान रहे हैं, मतलब `एस सच` गुण है नहीं। वक्ता ने इस बात की पुष्टि की।
वक्ता विवेचन
  • वक्ता का अतिरिक्त स्पष्टीकरण: वक्ता ने बताया कि शंकराचार्य जी उस पार्शियल प्रतीति को `बिंब प्रतिबिंब भाव` से बताते हैं कि चंद्रमा आकाश में होता है, पर उसका प्रतिबिंब पानी में दिखता है। विज्ञान इसमें यह समस्या उठा सकता है कि प्रतिबिंब बिंब की वास्तविक प्रतिकृति नहीं होता। हालांकि, हमारी प्राकृत अनुभूति के आधार पर, शंकराचार्य जी कहते हैं कि ब्रह्म के स्वरूप का अनुभव उसके प्रतिबिंब में होता है, और जीवात्मा उसका प्रतिबिंब है। सगुण ब्रह्म का प्रतिबिंब होने के कारण हम अपने गुणों में ब्रह्म के गुणों को देखते हैं।
  • गुणोपसंहार की प्रक्रियाएं: वक्ता ने `गुणोपसंहार` की दो प्रक्रियाओं को समझाया: एक, अंश होने के नाते ब्रह्म के गुणों को `इन्हेरिट` करना (`अंशांशी संबंध`), जिससे गुणों का संहार होता है। दूसरी, `बिंब प्रतिबिंब भाव` के द्वारा, जिसमें बिंब में जो है वही प्रतिबिंब में भी है। शंकराचार्य जी के लिए `बिंब प्रतिबिंब` न्याय से संहार होता है, जिसमें एक मिथ्या और एक सत्य है। `विकृत परिणामवाद` के सिद्धांत में भी `गुणोपसंहार` की अलग प्रक्रिया होती है (जैसे दूध से दही)। सभी मतानुयियों के लिए `गुणोपसंहार` की प्रक्रिया अपनी-अपनी है।
  • आनंद धर्म की प्रतीति: वक्ता ने कहा कि जब जीवात्मा में आनंद धर्म या ब्रह्म के धर्मों का वर्णन होता है, तो जीव के अंदर होने वाली धर्मों की प्रतीति `गुणोपसंहार न्याय` से हो रही है। ब्रह्मवादी `अंशांशी भाव` से प्रतीति मानेंगे, जबकि शंकराचार्य जी `बिंब प्रतिबिंब भाव` से प्रतीति मानेंगे। इसलिए वेद वाक्यों का तात्पर्य दोनों आचार्यों के मत से अलग-अलग हो जाता है।
  • प्रश्न: एक प्रतिभागी ने पूछा कि आनंद को गुण और क्वालिटी समझेंगे, तो पांचवीं सब्सटेंस में फिर एक क्वालिटी तो हुई, जबकि शंकराचार्य जी निर्गुण मानते हैं।
  • उत्तर: वक्ता ने स्पष्ट किया कि शंकराचार्य जी `ब्रह्म में आनंद है` ऐसा नहीं बोलते, बल्कि `ब्रह्म ही आनंद है` ऐसा बोलते हैं। निर्गुणता ही आनंद है, आनंद ही निर्गुणता है। इसलिए वे एक दूसरे के साथ समस्या नहीं उत्पन्न करते। ब्रह्म अधिकरण बनके अधिकरणता को धारण करना भी ब्रह्म के लिए गुण बन जाता है, पर `इक्विवेलेंस` गुण रूप नहीं होता है। जैसे मिट्टी मिट्टी को धारण करती है ऐसा नहीं बोलते, मिट्टी ही है, वह उसका स्वरूप लक्षण है। वैसे ही आनंद रूप होना ब्रह्म का स्वरूप लक्षण है, इसलिए ब्रह्म में आनंद है ऐसा बोलने की आवश्यकता नहीं।
  • प्रश्न: एक प्रतिभागी ने पूछा कि प्रतिबिंब रियल तो है ना, यद्यपि वो रिफ्लेक्शन है।
  • उत्तर: वक्ता ने स्पष्ट किया कि शंकराचार्य जी के सिद्धांत में प्रतिबिंब को मिथ्या माना जाता है, हमारे सिद्धांत में `रियल`।
  • प्रश्न: एक प्रतिभागी ने पूछा कि कल की नोट्स मिलेंगी।
  • उत्तर: वक्ता ने सकारात्मक जवाब दिया।
५
सूत्र १९ (पाद १, अधिकरण ७) — `अन्वयात अवधारणात` का विवेचन
३०:२७ – ४९:३२ — सूत्र १९ (पाद १, अधिकरण ७) — `अन्वयात अवधारणात` का विवेचन
सूत्र १९ (पाद १, अधिकरण ७) — `अन्वयात अवधारणात` का विवेचन
पाठ
ब्रह्मसूत्राणुभाष्य सूत्र १.१.१९
प्रतिभागी वाचन
वक्ता ने `ब्रह्मसूत्राणुभाष्य-१/७/१९` सूत्र `अन्वयात अवधारणात` का परिचय देते हुए बताया कि यह इस अधिकरण का अंतिम सूत्र है। संशय यह है कि अन्नमय से लेकर आनंदमय पर्यंत हर जगह `अन्य उत्तर आत्मा` है इत्यादि श्रुति से यही ज्ञात होता है कि अन्नमय आदि सभी भिन्न हैं, और शरीर पद से शरीराभिमानी भिन्न-भिन्न जीव ही आत्मा है। आनंदमय में भी वैसी ही उक्ति है। इससे ब्रह्मत्व रूप से व्यापक आनंदमय का सब जगह अन्वय करते हैं, और सब शरीरों में जीव का संबंध ही प्रतीत होता है। इस संशय के निरास के लिए उक्ति के अर्थ की उपपत्ति करते हैं। आनंदमय ही सब शरीरों का अभिमानी आत्मा हो सकता है। प्रकरण में `एष एव` ऐसा निर्धारणात्मक प्रयोग किया गया है, जिससे दूसरे का निषेध और आनंदमय का ही आत्मा होना निश्चित होता है।
वक्ता विवेचन
  • वक्ता का अतिरिक्त स्पष्टीकरण: वक्ता ने समझाया कि आनंदमय ही सभी शरीरों का अभिमानी आत्मा है। जहां आनंदमय कोष का वर्णन किया जा रहा है, उसमें `एष एव` (इसी के द्वारा) ऐसा `एवकार` के द्वारा निर्धारणात्मक प्रयोग है, जिससे यह समझ में आता है कि प्राणमय, अन्नमय, विज्ञानमय, मनोमय ये सभी आत्मरूप नहीं हैं, परंतु आनंदमय ही आत्मा है। आनंदमय की ही आत्मरूपता वहां सिद्ध की गई है। तात्पर्य यह है कि अन्नमय आदि सभी उसके बाह्य आवरण हैं, और वह उन सभी से भिन्न आनंदमय आत्मा है। यह कहना चाहते हैं कि आनंदमय कोष आत्मा की तरह है, जैसे हमारी आत्मा हमारे दोनों शरीर की चेष्टा करवाती है, उसी प्रकार आनंदमय इन चारों कोषों का संचालक तत्व है। आनंदमय को उन चारों की आत्मा के रूप में बताया जा रहा है, जिसका अर्थ है कि आनंदमयता ब्रह्म का धर्म है। पांचों कोषों का वर्णन इस प्रक्रिया से आता है कि ब्रह्म को जब जगत की उत्पत्ति का संकल्प होता है, तो वह अपने बाहर इन सभी आवरणों को बनाते हैं। कपिल गीता में निरूपण है कि उन आवरणों को बनाने के बाद, `अन्वय` और `व्यतिरेक` के संबंध से ब्रह्म उनमें अनवित भी होते हैं और व्यतिरिक्त भी होते हैं। ब्रह्म देखते हैं कि ये क्रियान्वित नहीं हो पा रहे, इसलिए पक्षी जैसे घोंसले में घुसता है, वैसे ब्रह्म पहले घोंसला बनाता है, फिर उसमें रहता है। उसी प्रकार ब्रह्म बाहर भी है और अंदर भी। इसलिए उसका अन्वय और व्यतिरेक दोनों इन चारों कोषों के साथ होता है। आनंदमय के रूप में उसे अंदर प्रविष्ट तत्व के रूप में बोला जा रहा है, और जब हम ब्रह्म को अंतः प्रविष्ट तत्व के रूप में बोलते हैं, तब ब्रह्म का उन धर्मों के साथ समन्वय किया जाता है। इससे यह बात सिद्ध होती है कि आनंदमय पद के द्वारा केवल ब्रह्म का निरूपण हो रहा है, जीव का नहीं।
  • बिंब प्रतिबिंब भाव पर दोष: महाप्रभुजी ने `चित्र प्रकरण` में `बिंब प्रतिबिंब भाव` पर दोष प्रकट किए हैं, यह कहते हुए कि प्रतिबिंबित होने वाला स्थान माया शबलित होने के कारण मलिन सत प्रधान माना गया है, और मलिन पदार्थ में प्रतिबिंब नहीं होता। `द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया` श्रुति में एक ही वृक्ष पर दो पक्षियों को बताया गया है, जो अंतर्यामी और जीवात्मा की सहज स्थिति है। यदि ब्रह्म ही जीव है, तो इसे समझा पाना संभव नहीं, क्योंकि बिंब और प्रतिबिंब के अधिकरण दो होने चाहिए, वे समान अधिकरण में नहीं होते। इसलिए महाप्रभुजी ने `सह अंतर यमयति`, `सह यंत्रोत्त्वा यमयति` और `आत्मानं अंतर` से नियमन करने वाली आत्मरूपता का वर्णन किया है। इसलिए आनंदमय पद का अर्थ जीवात्मा नहीं है, परंतु केवल और केवल परमात्मा परब्रह्म ही है। आनंदमयता आनंद के प्राचुर्य से केवल और केवल ब्रह्म का स्वाभाविक धर्म है। अन्य सभी के अंदर वो आगंतुक धर्म है, इस बात को इस अधिकरण से `गुणोपसंहार` से महाप्रभुजी सिद्ध करना चाहते हैं।
  • प्रश्न: राजेश भाई ने पूछा कि क्या इसका निष्कर्ष यह है कि आनंदमय आत्मा जो प्रभु है, उसकी अंशात्मक जीवात्मा में वो आनंद एट्रीब्यूट है और वही जीव का अभिमानी है।
  • उत्तर: वक्ता ने पुष्टि की कि हाँ, जीवात्मा के साथ ब्रह्म का अंशांशी संबंध है, तो यहां वो अंशांशी संबंध से उसकी प्रतीति हो रही है। विभूतियों के साथ विभूति रूपता का संबंध होगा, तो वहां `गुणोपसंहार` कार्य करेगा। जहां ब्रह्म की आंतरिक शक्तियां हैं, वहां उस तरह से `गुणोपसंहार` होगा। परंतु वह सर्वत्र इस प्रकार से होगा। वक्ता ने कहा कि `ब्रह्म` और `जीव` दोनों ही आत्मा शब्द से लक्षित किए गए हैं, ऐसा नहीं है। अर्थात जीवात्मा को ही यहां आनंद रूप बोला जा रहा है, ऐसा नहीं। आत्मा शब्द ब्रह्म के लिए ही है।
  • प्रश्न: एक प्रतिभागी ने पूछा कि ऊपर जो जीव का संबंध प्रतीत होता है वह सब में हम `गुणोपसंहार` करेंगे, जैसे विभूति में विभूति और अंशात्मक जीव में जीव।
  • उत्तर: वक्ता ने हाँ कहा, इसलिए `बिंब प्रतिबिंब भाव` से या `शाखा अरुंधति न्याय` से शंकराचार्य जी की जो प्रक्रिया है अवच्छेद की, उन सभी प्रक्रियाओं से `गुणोपसंहार` इन श्रुति वचनों के द्वारा सिद्ध हो रहा है यह हमारा मत नहीं। हम उस तरह से `गुणोपसंहार` नहीं कर रहे, लेकिन अंशांशी अंश से `गुणोपसंहार` कर रहे। वहां `100%` या `लेवल` है, यहां `पीपीएम लेवल` पर है, मतलब आ तो वहीं से रहा है।
  • वक्ता का अतिरिक्त स्पष्टीकरण: वक्ता ने कहा कि `गुणोपसंहार` सभी तरह से हो ही सकता है। शंकराचार्य जी इन्हीं श्रुति वचनों को `बिंब प्रतिबिंब भाव` से `गुणोपसंहार` के लिए उपयोग कर सकते हैं, और हम `अंशांशी संबंध` से कर सकते हैं। इसलिए सभी आचार्यों को अपने-अपने मतों को स्थापित करने के लिए कोई न कोई श्रुति वचन को डिफाइन करने का मार्ग मिल ही जाता है। पर सभी का `गुणोपसंहार` एक जैसा नहीं हो सकता है, इसलिए हमें सभी को अपने-अपने `गुणोपसंहार` की प्रक्रियाओं को समझ लेना चाहिए। बिंब प्रतिबिंब को लोग कैसे `इंटरप्रेट` कर रहे हैं, वही फर्क होगा। हम `बिंब प्रतिबिंब भाव` को नहीं `गुणोपसंहार` प्रक्रिया मानते। `बिम प्रतिबिंब` वाली श्रुति मिल रही है उसका भी `इंटरप्रिटेशन` आचार्य अपने-अपने हिसाब से ही करेंगे। उसी से हम `एक्सटेंड` करके `गुणोपसंहार` फिर इसी तरह से वही प्रोसेस `एक्स्ट्रा पोलेट` करके करेंगे। जो मूल है उसको तो हम `ड्रॉप` कर देंगे और फिर वहां से नीचे-नीचे आते जाएंगे, और ऐसे ही गुणों के अंदर वो तारतम्य भी `बाय डिफॉल्ट` आता जाएगा।
  • संगोष्ठी का परिचय: वक्ता ने बताया कि संगोष्ठी में पार्टिसिपेंट्स षोडशग्रन्थ और निबंध पढ़ चुके हैं। महाप्रभुजी के वचन सिद्धांत वाक्य हैं और उन्हें समझने के लिए गीता और भागवत के वचनों का प्रयोग किया जा रहा है। इसका उद्देश्य यह है कि पार्टिसिपेंट्स विषयों को केवल ग्रंथों के `ऑर्डर` में नहीं, बल्कि `आश्रय`, `निवेदन`, `समर्पण` जैसे `टॉपिक्स` को वाइडर रेंज में देखना सीखें। साथ ही, प्राइमरी ग्रंथों से सिद्धांतों को `डिराइव` करने की `एबिलिटी` का आत्मनिरीक्षण भी हो जाए, और आगे वे लोग `बाहर के विषयों` को भी सोचने-समझने के लिए तैयारी करें। यह `एनुअल सीरीज` के रूप में करने का सोचा है। बच्चों की तैयारी अच्छी चल रही है।
  • अधिकरण समापन: वक्ता ने कहा कि दूसरा अधिकरण यहां संपन्न होता है, और तीसरा अधिकरण दोनों अध्ययन सत्र के संपन्न होने के बाद प्रारंभ करेंगे।