सूत्र १३ (पाद १, अधिकरण ५) — ब्रह्म के विरुद्ध धर्माश्रय होने का निर्णय
इस भाग में वक्ता ने 'प्रकृतैतावत्त्वं हि प्रतिषेधति ततो ब्रवीति च भूयः' सूत्र की चर्चा करते हुए समझाया कि श्रुति ब्रह्म के लौकिक धर्मों का निषेध क्यों करती है। ब्रह्म के स्वरूप में जो संशय शास्त्र के परस्पर विरुद्ध वचनों से उत्पन्न होता है, उसका समाधान यह है कि ब्रह्म विरुद्ध धर्माश्रय है। वक्ता ने स्पष्ट किया कि ब्रह्म का ज्ञान विषय बनना और उसका ज्ञेय न होना, दोनों ही स्थितियाँ श्रुति में एक साथ विद्यमान हैं और ये परस्पर विरोधी नहीं हैं, बल्कि ब्रह्म की अलौकिकता को सिद्ध करती हैं।
सूत्र १४-१५ (पाद १, अधिकरण ५) — अवतार लीला और युक्ति का समन्वय
इस खंड में 'दर्शनात च' सूत्र के आधार पर वक्ता ने समझाया कि कैसे ठाकुरजी के अवतार चरित्र, जैसे उलूखल बंधन या मृत्भक्षण लीला, शास्त्र के सिद्धांतों को पुष्ट करते हैं। वक्ता ने 'युक्ति' शब्द की परिभाषा दी कि यहाँ इसका तात्पर्य लौकिक तर्क नहीं, अपितु श्रुति वाक्यों के तात्पर्य वृत्ति से निकला हुआ सिद्धांत है। अंत में, यह चर्चा की गई कि कैसे भगवान की माया और उनका प्रकट स्वरूप सामान्य जीव के लिए संशय का विषय बनता है, जिसे केवल भगवद अनुग्रह और शास्त्र के समन्वय से समझा जा सकता है।