॥ ब्रह्मसूत्राणुभाष्य : पाद २, अधिकरण ६ (अंबुवदग्रहणात्) — सूत्र ६ से ७ तक ॥

श्रीवल्लभाचार्य विद्यापीठ, हालोल — नित्य पुष्टिस्वाध्याय
📅 17 June 2026
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परिचय एवं सन्दर्भ

यह सत्र श्रीब्रह्मसूत्राणुभाष्य के द्वितीय पाद के छठे अधिकरण, अंबुवदग्रहणात्, पर आधारित है। इस प्रवचन में अधिकरण के प्रथम सूत्र (६) और द्वितीय सूत्र (७) पर विस्तृत चर्चा की गई है। वक्ता एकदेशी मतों का दूषण करते हुए ब्रह्म के गुणधर्मों के समन्वय तथा उभयलिंगत्व विरोध के परिहार पर प्रकाश डाल रहे हैं।

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सूत्र ६ (पाद २, अधिकरण ६) — एकदेशी मत का दूषण
००:०० – ११:५८ — सूत्र ६ (पाद २, अधिकरण ६) — एकदेशी मत का दूषण
सूत्र ६ (पाद २, अधिकरण ६) — एकदेशी मत का दूषण
वक्ता ने पिछले सत्र के संपन्न हुए अधिकरण का स्मरण कराया, जहाँ श्रीमहाप्रभुजी ने ब्रह्म के गुणधर्मों के समन्वय पर विभिन्न विचारकों के मतों का संग्रह किया था। श्रीमहाप्रभुजी ने यह आज्ञा दी थी कि कुछ विषय एकदेशी होने पर स्वीकृत हो सकते हैं परंतु पूर्ण रूप से स्वीकृत नहीं। पुरुषोत्तमजी ने 'इति एकदेश मतेन समाधानम' कहकर उस विषय का उपसंहार किया था। अब द्वितीय पाद का छठा अधिकरण, 'अंबुवदग्रहणात्' आरम्भ हो रहा है, जिसमें एकदेशी मत में दोष दिखाकर अपने मत द्वारा विरोध का समाधान किया जाएगा। पूर्वपक्षी का मत था कि ब्रह्म में समवाय के अतिरिक्त समवेत जड़-जीव का संबंध है, जिससे सर्वकामत्वादयः गुण बिम्ब-प्रतिबिम्ब धर्मवत् प्रतीत होते हैं, अतः वे औपचारिक हैं। पुरुषोत्तमजी इस मत को अयुक्त बताते हैं क्योंकि ब्रह्म व्यापक होने के कारण बिम्ब-प्रतिबिम्ब भाव संभव नहीं है।
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प्रश्नोत्तर — समवाय एवं असमवाय संबंध
११:५८ – २८:४३ — प्रश्नोत्तर — समवाय एवं असमवाय संबंध
प्रश्नोत्तर — समवाय एवं असमवाय संबंध
एक प्रतिभागी ने पूछा कि न्याय दर्शन में स्वरूप संबंध, कायिक संबंध, कालिक अभाव आदि समवाय संबंध की कैटेगरी में आते हैं या स्वतंत्र हैं, जिस पर वक्ता ने उत्तर दिया कि ये समवाय संबंध के प्रकार हैं। ब्रह्म के व्यापक होने पर बिंब-प्रतिबिंब भाव क्यों नहीं आ सकता, इस प्रश्न के उत्तर में वक्ता ने स्पष्ट किया कि तत्व भेद नहीं हो रहा है, एक ही ब्रह्म अवस्था भेद से सगुण-निर्गुण होते हैं, अतः स्व-प्रतिबिंबित होना नहीं कहा जा सकता क्योंकि बिम्ब-प्रतिबिम्ब के लिए दो वस्तुएँ चाहिए। असमवाय संबंध पर चर्चा करते हुए वक्ता ने बताया कि जो वस्तु किसी में कृत्रिम रूप से डाली गई हो, उसका स्वाभाविक गुण न हो, जैसे स्प्रे की सुगंध। उन्होंने रामानुजाचार्यजी के उपादान कारण के मत का भी उल्लेख किया कि जड़-जीव अपने अस्तित्व के लिए नारायण पर निर्भर हैं।
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प्रश्नोत्तर — सगुण ब्रह्म और मायावाद
२८:४३ – ४१:३६ — प्रश्नोत्तर — सगुण ब्रह्म और मायावाद
प्रश्नोत्तर — सगुण ब्रह्म और मायावाद
न्याय और शंकराचार्य के एकदेशी मत के संबंध में प्रश्नोत्तर हुए, जिसमें स्पष्ट किया गया कि न्याय द्वैतवादी होने के कारण यहाँ पूर्वपक्ष में नहीं है। शंकराचार्य मत में जगत के लिए जल-प्रतिबिंब के उदाहरण पर वक्ता ने बताया कि ब्रह्म का माया पर पड़ने वाला प्रतिबिंब ही जगत कहलाता है, जिससे ब्रह्म को स्वयं जगत होने की भ्रांति होती है और माया दर्पण का कार्य करती है। 'कार्य में समवाय कारण का प्रतिबिंब नहीं देखा जाता' इस महाप्रभुजी के कथन पर स्पष्ट किया गया कि ब्रह्म माया को इनवाइट करके जगत कर्तृत्व का अभिमान धारण करते हैं, जो आविद्यक है। वक्ता ने समझाया कि जीव और जगत की व्यावहारिक सत्ता है, अतः उनके गुण ब्रह्म में प्रतिबिंबित होकर औपाधिक धर्म कैसे बन सकते हैं, क्योंकि वे वस्तुतः ब्रह्म के ही गुण हैं। महाप्रभुजी ने चित्त प्रकरण में यह तर्क भी दिया कि बिम्ब-प्रतिबिम्ब एक-दूसरे से विपरीत धर्मों को धारण नहीं कर सकते।
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सूत्र ७ (पाद २, अधिकरण ६) — ब्रह्म में गुणों का सामंजस्य
४१:३६ – ५८:५४ — सूत्र ७ (पाद २, अधिकरण ६) — ब्रह्म में गुणों का सामंजस्य
सूत्र ७ (पाद २, अधिकरण ६) — ब्रह्म में गुणों का सामंजस्य
वक्ता ने दूसरे सूत्र 'वृद्धिह्रासभक्त्वमन्तर्भावात् उभयसामञ्जस्यादेवम्' का विषय प्रस्तुत किया। जैसे व्यापक आकाश में भी कर्क आदि (ट्रॉपिक ऑफ कैंसर) प्रवेश के कारण वृद्धि-रास (बड़ा-छोटा) का व्यवहार किया जाता है, वह अभ्रम प्रतीति है, केवल हमारे समझने के लिए औपाधिक है, क्योंकि करक आदि आकाश के व्यंजकत्व हैं, जनकत्व नहीं। उसी प्रकार ब्रह्म में भी निर्धर्मकत्व और सधर्मकत्व का सामंजस्य है। ब्रह्मगत सर्वकामत्वादयः गुण जड़ और जीवों द्वारा अभिव्यंजित होते हैं, अतः वे ब्रह्मगत ही हैं, आकाश धर्मवत्। यह उभयलिंगत्व विरोध का परिहार है। महाप्रभुजी ने लोक और वेद दोनों के अनुसार विरोध का परिहार करने का आग्रह किया। महान आकाश, अल्पावकाश जैसे लौकिक व्यवहार और वैदिक व्यवहार 'दश चमसान' भी वस्तु धर्म से विरुद्ध देखे जाते हैं, पर ये वस्तु का वास्तविक स्वरूप नहीं, बल्कि औपचारिक मात्र हैं। ब्रह्म भी विभिन्न स्थलों में प्रविष्ट होकर विभिन्न नाम वाला होता है, जैसे देशों के अनुसार आकाश का परिमाण बदलता है। ब्रह्म और जागतिक पदार्थों की एकता जपा कुसुम की लालिमा के समान वास्तविक है, औपाधिक नहीं। जगत में ब्रह्म के ही धर्म हैं, किसी अन्य के नहीं। सर्वकाम आदि गुणों का प्रयोग औरों के लिए किया जाता हो, फिर भी वे परमात्मा के ही गुण हैं, क्योंकि वे सबके कारण हैं। वक्ता ने राजा के विष्णु रूप होने का दृष्टांत दिया। इन धर्मों को आगंतुक नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इन्हें परमात्मा के अतिरिक्त किसी अन्य का माना गया हो ऐसा प्रमाण नहीं मिलता। ये गुण परमात्मागत प्रतीति में भी आते हैं और प्रत्यक्ष देखा भी जाता है कि ये विशेषताएँ हरेक में नहीं होतीं, बल्कि विरक्त जीव या बड़े राजा आदि में ही अंशतः दिखाई देती हैं। महाप्रभुजी ने सर्व निर्णय प्रमेय प्रकरण में 'शक्ति संकोच' शब्द का प्रयोग किया है, जिसके अनुसार कमल शब्द का शक्ति संकोच करके केवल फूल के लिए समर्पित हो जाता है, इसी प्रकार ब्रह्म में भी गुणों का सामंजस्य समझना चाहिए।
📋 विस्तृत सारांश — Detailed Chronological Summary

००:०० – ११:५८ (ब्रह्मसूत्राणुभाष्य - एकदेशी मत का दूषण)


११:५८ – २८:४३ (प्रश्नोत्तर - समवाय एवं असमवाय संबंध)


२८:४३ – ४१:३६ (प्रश्नोत्तर - सगुण ब्रह्म और मायावाद)


४१:३६ – ५८:५४ (ब्रह्मसूत्राणुभाष्य - ब्रह्म में गुणों का सामंजस्य)


📖 सार
📌 सार
• इस सत्र में श्रीब्रह्मसूत्राणुभाष्य के द्वितीय पाद के छठे अधिकरण के प्रथम दो सूत्रों की विवेचना की गई।
• वक्ता ने एकदेशी मतों द्वारा ब्रह्म के गुणधर्मों को औपचारिक या बिम्ब-प्रतिबिम्ब भाव से समझने का खंडन किया।
• यह स्पष्ट किया गया कि जड़-जीव अस्वच्छ हैं और ब्रह्म व्यापक है, अतः उनमें बिम्ब-प्रतिबिम्ब भाव संभव नहीं।
• शंकराचार्यजी के सगुण-निर्गुण ब्रह्म के अवस्था भेद और माया के अघटित घटना पटीयसी स्वरूप पर भी प्रश्नोत्तर हुए।
• दूसरे सूत्र के माध्यम से आकाश के दृष्टांत द्वारा समझाया गया कि जैसे आकाश में व्यापकत्व और अल्पत्व का सामंजस्य होता है, वैसे ही ब्रह्म में निर्धर्मकत्व और सधर्मकत्व का भी सामंजस्य होता है।
• ब्रह्म के गुण जड़-जीवों में अभिव्यंजित होते हैं, वे ब्रह्मगत ही हैं, जिससे उभयलिंगत्व विरोध का परिहार होता है।
• जगत और ब्रह्म की एकता जपाकुसुम की लालिमा के समान वास्तविक है, औपाधिक नहीं; सारे गुण वस्तुतः ब्रह्म के ही हैं।