मंगलाचरण और कीर्तन
सत्र का प्रारम्भ मंगलाचरण से होता है, जिसके उपरान्त एक कीर्तन का गायन किया जाता है। वक्ता बाद में कथा के संदर्भ में 'डर एक सांप की तरह होता है' जैसे कीर्तन के अंशों को संदर्भित करते हैं। यह भाग मुख्यतया प्रार्थना और संकीर्तन पर केंद्रित है।
नारायणदास की कथा: वैष्णव महिमा और महाप्रसाद
वक्ता नारायणदास की कथा के माध्यम से यह समझाते हैं कि ठाकुरजी की प्रसन्नता को कैसे जानना चाहिए। यदि वैष्णव अचानक आकर महाप्रसाद ग्रहण करें तो समझना चाहिए कि ठाकुरजी प्रसन्न हैं। नारायणदासजी के प्रसंग से यह स्पष्ट किया जाता है कि सभी वैष्णव पूजनीय हैं और उनका सम्मान करना ठाकुरजी की कृपा प्राप्त करने का सूचक है। वक्ता बताते हैं कि ठाकुरजी स्वयं हृदय कमल में निवास करते हैं और वैष्णवों का अनादर नहीं करना चाहिए।
ठाकुरजी की कृपा और सेवक का स्वरूप
वक्ता 'नारायणदास' शब्द का अर्थ बताते हुए कहते हैं कि नारायण का अर्थ जल में निवास करने वाले ईश्वर है और उनका सेवक नारायणदास है। राजभोग का अर्थ समझाते हुए, वे मंदिर और गृहीय मंदिर में सब कुछ भगवान को समर्पित करने का महत्व बताते हैं। 'स्वार्थ' और 'परार्थ' की व्याख्या करते हुए कहा गया है कि ठाकुरजी भक्तों के हित के लिए और स्वयं के लिए विराजमान रहते हैं। सेवक वह है जो प्रभु के सुख के बारे में सोचता है और उनकी इच्छा को बिना कहे ही समझ लेता है।
पंचपद्य का संदर्भ: त्याग, निवृत्ति और प्रेम
वक्ता श्रीवल्लभाचार्य विरचित 'पंचपद्य' के श्लोक 'देशकाल द्रव्य कर्ता मन्त्र कर्म प्रकराता' का उल्लेख करते हैं। निवृत्ति का अर्थ सोच-समझकर त्याग करना बताया गया है। भक्ति मार्ग को कर्तव्य और द्वैत का मार्ग कहा गया है। यह स्पष्ट किया जाता है कि प्रेम ही न्याय की प्राप्ति है और त्याग के मार्ग से ही भिक्षु बना जाता है। वक्ता बताते हैं कि पुष्टिमार्ग में ज्ञान से त्याग आवश्यक नहीं, बल्कि प्रेम से त्याग आवश्यक है। अंत में, 'ज्ञान के माध्यम से त्याग' पर जोर दिया जाता है।