0:00 — मंगलाचरण एवं कीर्तन
सत्र का प्रारम्भ मंगलाचरण के श्लोकों और श्रीठाकुरजी के गुणगान करते हुए कीर्तन से होता है। भक्तजन प्रभु के स्वरूप और लीलाओं का स्मरण कर अपने हृदय को प्रसन्न करते हैं। कीर्तन के माध्यम से भक्तजन वृंदावन की सुंदर भूमि, नाचते मोर और आनंदमयी गोकिला की महिमा का अनुभव करते हैं।
8:37 — भगवद्वार्ता एवं पारिभाषिक शब्दों का स्पष्टीकरण
इस खंड में श्री आचार्यजी गज्जन और श्री नवनीत प्रियाजी को संग लेकर श्रीगोकुल पधारे, जहाँ जन्माष्टमी का उत्सव मनाया गया, इसका वृत्तांत बताया गया है। दामोदरदास हरसानी और कृष्णदास भी इस उत्सव में सम्मिलित थे। श्री आचार्यजी ने साक्षात नंदराय, यशोदाजी और ब्रजभक्त गोप-गोपी के साथ नंदालय की लीला को प्रकट किया, जिससे सेवकों को अनुभव कराया। वक्ता ने 'नवनीत प्रिया', 'श्री गोकुल', 'दामोदर दास', 'लीला', 'सेवा', और 'परिक्रमा' जैसे पारिभाषिक शब्दों का अर्थ स्पष्ट किया, जिससे श्रोताओं को पुष्टिमार्गीय शब्दावली की गहराई समझ में आई। यह समझाया गया कि ठाकुरजी की सेवा सहज होनी चाहिए और उसमें कोई नियम-बंधन नहीं होता। भाव ही मुख्य है, जिससे ठाकुरजी प्रसन्न होते हैं।
21:49 — गोपीजन वल्लभाय श्लोकों का पाठ
इस भाग में 'नमो गोपीजन वल्लभाय' श्लोकों का पाठ किया गया। इन श्लोकों में श्रीठाकुरजी के विभिन्न स्वरूपों और लीलाओं का वर्णन किया गया है। वेणुध्वनि, मनोहर सुंदर स्वरूप, रत्नमंडित आभूषणों, श्रीवत्समावली से सुशोभित वक्षस्थल और मयूर पिच्छ से विभूषित होने का उल्लेख किया गया है। ये श्लोक गोकुलाय के धर्मा साधकाय स्वरूप को नमन करते हुए श्रीठाकुरजी की सर्वशक्तिमत्ता और भक्तों के प्रति उनकी चिंतामणि के समान कृपालुता को दर्शाते हैं। पाठ के माध्यम से उच्चार शुद्धि पर भी बल दिया गया।
27:20 — सन्यास निर्णय : श्लोक १७-२८ — कलि में सन्यास की निवृत्तता
'प्रमेयरत्नसंग्रह' के 'सन्यास निर्णय' प्रकरण के श्लोक १७ से २८ तक की चर्चा की गई। इसमें बताया गया है कि कलि में सन्यास पश्चात्ताप का कारण बनता है। श्लोक १७-१८ के अनुसार, कर्ममार्ग से कर्तव्य का विचार और भक्तिमार्ग में कर्तव्यत्व की विचारणा बताई गई है। श्लोक १९-२० में अभिमान योग के विरोध और गृहदैवत की सेवा का महत्व समझाया गया है। श्लोक २१-२२ में विषयों से आक्रांत देह वाले जीवों के लिए त्याग की प्रशस्तता और प्राकृत ज्ञान के बाधकत्व पर विचार किया गया है। श्लोक २३-२४ में सत्यलोक की स्थिति, सन्यास की विशेषता, और साधन-फल में भावना का महत्व समझाया गया है। श्लोक २५-२८ में दुर्लभ त्याग प्रेम से सिद्धि और कलि में सन्यास के पश्चात्ताप स्वरूप होने का कारण वर्णित है।
36:47 — सन्यास निर्णय : श्लोक २९-३३ — भक्तिमार्ग में दोष और उनका समाधान
इस खंड में 'सन्यास निर्णय' के श्लोक २९ से ३३ पर विवेचन किया गया है। श्लोक २९ में भक्तिमार्ग में दोषों की प्रबलता और उसके समाधान का प्रश्न उठाया गया है। श्लोक ३०-३२ में यह समझाया गया कि अत्रारंभ में नाश हो सकता है और दृष्टांत का अभाव भी हो सकता है। स्वास्थ्य के कारण त्याग होने पर कोई बाधा नहीं आती है। वक्ता ने अटल बीज के दृष्टांत के अभाव की बात कही। श्लोक ३३ में यह बताया गया कि अज्ञान से कोई बाधा नहीं होती, जिस प्रकार माता का दूध बालक के लिए अमृत होता है और शिशु को उससे कोई हानि नहीं होती।
44:05 — सन्यास निर्णय : श्लोक ३४ — ज्ञानी का भी मोह भगवद्भक्त को मोहित नहीं करता
अंतिम खंड में 'सन्यास निर्णय' के श्लोक ३४ 'ज्ञानीनामप्यवाक्येन न भक्तं मोहयिष्यति। आत्मप्रदप्रियश्चापि किमर्थं मोहयिष्यति॥' पर विस्तार से चर्चा की गई। वक्ता ने इस श्लोक को बार-बार दोहराकर इसके महत्व पर बल दिया। इसका अर्थ है कि ज्ञानी के वचन भी भक्त को मोहित नहीं कर सकते, क्योंकि आत्मप्रद प्रियतम श्रीकृष्ण ही हैं। जब स्वयं भगवान ही अपनी आत्मा को अर्पित करने वाले प्रिय हों, तो उन्हें और कोई क्यों मोहित कर सकता है? इस श्लोक के माध्यम से भक्तिमार्ग की श्रेष्ठता और भक्त की अनन्याश्रय निष्ठा को उजागर किया गया है।