निरोध का स्वरूप और उसकी अवस्थाएँ
वक्ता निरोध को एक प्रभाव या परिणाम के रूप में बताते हैं, जिसे आसक्ति के समान समझा जा सकता है। भक्त जब ईश्वर में लीन हो जाते हैं और संसार का विस्मरण होता है, तब निरोध की स्थिति उत्पन्न होती है। भगवद् गीता में भगवान के व्रज आगमन पर संयोग और वियोग की स्थितियों का उल्लेख है, जहाँ व्रज के भक्तों में भगवान के प्रति तीव्र आसक्ति थी। निरोध के भीतर भी स्नेह, आसक्ति और व्यसन जैसे अलग-अलग चरण होते हैं, जो तीव्रता के विभिन्न स्तरों को दर्शाते हैं।
प्रश्नोत्तर — अन्य वैष्णव सम्प्रदायों की मुक्ति और पुष्टिमार्ग का भेद
एक प्रतिभागी अन्य वैष्णव आचार्यों जैसे श्रीरामानुजाचार्यजी, श्रीमाधवाचार्यजी और श्रीनिम्बार्काचार्यजी के सम्प्रदायों में निरोध की स्थिति और उनके फल के विषय में प्रश्न करते हैं। वक्ता स्पष्ट करते हैं कि ये आचार्य प्रभु के आदेश और इच्छा से पृथ्वी पर अवतरित हुए हैं और उन्होंने अपने सिद्धांत प्रस्तुत किए हैं। वे बुद्ध अवतार का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि उन आचार्यों पर टिप्पणी करना उचित नहीं है। पुष्टिमार्ग में जीव गुणों से रहित होता है, जिसे सर्वोच्च कृपा प्राप्त होती है, और वह केवल प्रभु की सेवा और स्मरण में तृप्त होता है।
साधन निरोध, अवतार काल में लीला और स्तुति
सेवाफल ग्रंथ के अनुसार, निरोध का उद्देश्य सिद्धि, सायुज्य और वैकुंठ आदि की प्राप्ति है। वक्ता बताते हैं कि अवतार काल में, जब ईश्वर स्वयं प्रकट होते हैं, तो वे अपनी लीलाओं के माध्यम से भक्तों को सर्वआत्माभाव का आशीर्वाद देते हैं। संयोग की स्थिति में भगवत् लीलाएँ और वियोग की स्थिति में ईश्वर की स्तुति साधन निरोध का रूप बन जाती हैं। अनावतार काल में तनुवित्जा सेवा (शरीर, मन, धन से सेवा) को निरोध का साधन माना जाता है। वक्ता स्पष्ट करते हैं कि ये साधन जीव को संसार से विरक्त कर ईश्वर से आसक्त करते हैं।
संसार विस्मृति और भ्रम का अन्तर
निरोध के लक्षण के रूप में संसार की विस्मृति या भ्रम की चर्चा की जाती है। वक्ता बताते हैं कि 'भ्रम' अज्ञान और अहंकार के कारण मनुष्य द्वारा निर्मित संसार है, जबकि 'संसार' पंचमहाभूतों से बना वह जगत है जिसे ईश्वर ने रचा है। निरोध की उच्चतम अवस्था वह है जब भक्त को संसार की किसी भी वस्तु की स्मृति नहीं रहती, और उसका मन केवल ईश्वर में लीन रहता है। यह संसार विस्मृति, विषयों की स्मृति का भी लोप कर देती है, जो निरोध का सर्वोच्च परिणाम है।