मंगलाचरण
यह खण्ड सत्र के प्रारम्भ में हुए मंगलाचरण और कीर्तन के लिए है। मंगलाचरण के रूप में श्रीवल्लभनंदनम् और गुरुदेव को नमन करते हुए भजन का गायन किया गया। इसका उद्देश्य भगवत्स्मरण और भगवत्कृपा की याचना है।
दिनकर दास मुकुंद दास वार्ता का विवेचन
सत्र का प्रारम्भ दिनकर दास मुकुंद दास वार्ता के विवेचन से हुआ, जहाँ दिनकर दास की भगवत्कथा के प्रति गहरी आसक्ति को दर्शाया गया। जब उन्हें ज्ञात हुआ कि श्रीआचार्यजी महाप्रभु कथा कहने वाले हैं, तो वे अपनी अधपकी रसोई छोड़कर कथामृत श्रवण के लिए तुरंत उपस्थित हुए।
श्रीआचार्यजी महाप्रभु के पूछने पर दिनकर दास ने कहा कि नित्य की अंगारी तो रोज मिलेगी, परंतु आप के मुख से कथामृत कब मिलेगा। इससे प्रसन्न होकर श्रीआचार्यजी ने उन्हें मुख्य कथा श्रोता घोषित किया।
इस वार्ता से शिक्षा मिलती है कि ठाकुरजी की सेवा में सावधानी और भगवत्कथा में दिनकर सेठ जैसी गंभीरता और आतुरता आवश्यक है। 'आसक्ति' का अर्थ अच्छी तरह चिपकना और 'व्यसन' का अर्थ उसके बिना रह ना पाना है। 'महाप्रसाद' केवल खाद्य वस्तु नहीं, बल्कि ठाकुरजी को प्रेम और प्रशंसा से अर्पित कोई भी वस्तु हो सकती है।
सन्यास निर्णय का पारायण
इस खण्ड में श्रीमद वल्लभाचार्यजी विरचित 'सन्यास निर्णय' ग्रन्थ का पारायण किया गया। इसमें सन्यास के विभिन्न पहलुओं पर विचार किया गया है, जहाँ भक्ति मार्ग में ज्ञान विशेष की अपेक्षा नहीं है।
कर्म मार्ग का निषेध करते हुए भगवत्सेवा को मुख्य कर्तव्य बताया गया है। ग्रन्थ में कहा गया है कि भगवदीय गुणों का ज्ञान आसक्ति से होता है, और यह आसक्ति ही अभिमान और अहंकार को दूर करती है।
यदि किसी को विषयों में आसक्ति हो, तो उसे त्यागने का विचार करना चाहिए। कृष्ण प्रसाद से ही सभी बंधों का नाश होता है। इस ग्रन्थ में भक्ति मार्ग में सन्यास का स्वरूप और भगवत्कृपा से उसकी सिद्धि को स्पष्ट किया गया है, ताकि भक्त पतित न हो।
निरोध लक्षणम् का पारायण
सत्र के अंतिम भाग में श्रीमद वल्लभाचार्यजी विरचित 'निरोध लक्षणम्' ग्रन्थ का पारायण किया गया। यह ग्रन्थ भगवत्प्राप्ति के लिए प्रपंच विस्मृति और भगवत् में आसक्ति के महत्व को निरूपित करता है।
इसमें श्रीयशोदाजी और नंदादि गोकुलवासियों के दुःख का वर्णन है, जो श्रीकृष्ण से वियोग के कारण उत्पन्न होता है। यह पद 'यत् दुःखं यशोदाया नंदादीनां च गोकुले' और 'गोपिकानां तु यत् दुःखं तत् दुःखं स्यान् मम क्वचित' इन पंक्तियों का पुनः पुनः पाठ किया गया।
यह पद गोपीकाओं के दुःख को विशेष रूप से प्रकाशित करता है, जहाँ भक्त भगवान् के विरह में जो दुःख अनुभव करते हैं, वही वास्तविक प्रेम का लक्षण है।