दिनकर सेठ का वार्ता प्रसंग और कथा आसक्ति का महत्व
इस खंड में दिनकर सेठ की कथा के माध्यम से भगवत्कथा के प्रति गहन आसक्ति का निरूपण किया गया है। दिनकर सेठ ने श्रीआचार्यजी महाप्रभु के मुख से कथामृत श्रवण करने की प्रबल इच्छा के कारण कच्ची अंगा करी रसोई का त्याग कर दिया। उन्होंने यह विचार किया कि `आप के मुख सो कथामृत सब कब सुनो जो अंगा करी से तो तो यह अमृत कैसे मिल`। इस आतुरता को देखकर श्रीआचार्यजी महाप्रभु अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले `तेरे आए बिना कथा ना कहूंगा आदित्य तू मुख्य कथा को श्रोता`। यह प्रसंग हमें भगवत्कथा के प्रति गहरी `आतुरता रावी जोइए` (आतुरता रखनी चाहिए) का संदेश देता है और यह भी सिखाता है कि `ठाकुर जी से मानवी जो अपने ठाकुर जी सेवा में जल्दी ना करवी जो सावधानी पूर्वक करवा`।
पारिभाषिक शब्दों का विवेचन: आसक्ति, स्नेह, व्यसन और महाप्रसाद
वक्ता ने `आसक्ति`, `स्नेह` और `व्यसन` जैसे महत्वपूर्ण पुष्टिमार्गीय पारिभाषिक शब्दों की व्याख्या की। `आसक्ति` को `एक से एक आगे बनने वाली प्रेम की अवस्था` के रूप में समझाया गया है, जबकि `स्नेह` को `स्मृति` से जोड़ा गया है। `व्यसन` को `उसके बिना रह ना पाना` की स्थिति के रूप में परिभाषित किया गया। इसके अतिरिक्त, `महाप्रसाद` शब्द का भी विवेचन किया गया, जिसमें बताया गया कि `महाप्रसाद खाली खावानी वस्तु ना हो वस्तु के कपड़ा के कहीं भी हो सके छे वस्तु भूषण पात्र कहीं भी हो सके महाप्रसाद`। यह समझने योग्य है कि महाप्रसाद केवल भोज्य पदार्थ नहीं, अपितु श्रीठाकुरजी से संबंधित कोई भी वस्तु हो सकती है।
सन्यास निर्णय का पारायण
इस खंड में `श्रीमहाप्रभुजी` विरचित `सन्यास निर्णय` नामक षोडश ग्रन्थ का संस्कृत में पारायण किया गया। यह ग्रन्थ भक्तिमार्ग में सन्यास के स्वरूप, उसके महत्व, और `ज्ञानमार्ग` से उसके भेद का विवेचन करता है। ग्रन्थ के श्लोकों में यह विचार किया गया है कि `कर्ममार्ग` का त्याग कर `भक्तिमार्ग` में प्रवेश क्यों आवश्यक है, और `अभिमान` का त्याग कर `साधुत्व` प्राप्त करने की प्रेरणा दी गई है। ग्रन्थ के अंत में `श्रीमद वल्लभाचार्य विचितम सन्यास पूर्ण` कहकर पारायण की समाप्ति हुई, जो इस ग्रन्थ में वर्णित सन्यास के समग्र विवेचन को दर्शाता है।
निरोधाष्टक का पाठ एवं सत्र की समाप्ति
`सन्यास निर्णय` के पारायण के उपरान्त, `निरोधाष्टक` का पाठ किया गया। यह अष्टक श्रीठाकुरजी से विरह-जनित दुःख की याचना का भाव व्यक्त करता है। इसमें श्रीनंदबाबा, यशोदा माता, और गोकुल के समस्त `गोपिका` जनों के दुःख को अपने दुःख के रूप में स्वीकारने की कामना की गई है: `नंदादी नाच गोकुल कुले य दुखम यशोदाया नंदा दी गोकुले गोपिका नाम तू य दुखम त दुखम स्यान मम क्वचित`। यह पाठ भक्त की भगवद्विरह में अनन्यता और लीला-अनुभूति की तीव्र अभिलाषा को दर्शाता है। सत्र का समापन इस विरह-भावना के साथ होता है।