मंगलाचरण
परम्परागत मंगलाचरण का पाठ किया गया।
कीर्तन: बधाई को देना
सत्र की शुरुआत में 'बधाई को देना' कीर्तन का भावपूर्ण गायन हुआ, जिसमें नन्द गनी, जसुमति और ब्रज सुन्दरियों के आनंद का वर्णन है। इस कीर्तन में घर-घर मंगल कलश लिए ब्रज सुन्दरियों द्वारा आनंदोत्सव मनाने का उल्लेख है।
भगवद्वार्ता: प्रभुदास की सेवा भावना
वक्ता ने प्रभुदास की कथा सुनाई, जहाँ प्रभुदास अपनी रसोई स्वयं बनाते थे। एक दिन रसोई खराब होने पर उन्होंने उसे ठाकुरजी को समर्पित नहीं किया और चरणामृत मिलाकर स्वयं ले लिया। इस पर श्रीठाकुरजी ने श्रीआचार्यजी से कहा कि उन्हें भोग नहीं मिला। आचार्यजी ने प्रभुदास को सावधानी से रसोई बनाने और भोग धरने के पश्चात् ही ग्रहण करने का निर्देश दिया।
पारिभाषिक शब्दों का विवेचन
इस खंड में पुष्टिमार्ग के कुछ पारिभाषिक शब्दों पर चर्चा की गई। 'श्रीठाकुरजी' शब्द के अर्थ पर वक्ता ने बताया कि यह सम्मानसूचक संबोधन है। 'चरणामृत' से तात्पर्य ठाकुरजी के चरणों के स्पर्श से पवित्र हुए जल या रस से है, जो अमृततुल्य हो जाता है। 'आचार्यजी' वह हैं जो शास्त्रों को स्वयं ग्रहण करते हैं, अपने जीवन में उतारते हैं और शिष्यों को समझाते हैं। 'समर्पण' का अर्थ वस्तु या व्यवहार को प्रभु के उपयोग में लाना है।
उच्चार शुद्धि: श्री गोपीजन वल्लभाष्टकम
सत्र में 'श्री गोपीजन वल्लभाष्टकम' के श्लोकों के शुद्ध उच्चारण का अभ्यास कराया गया। प्रतिभागियों ने वक्ता के मार्गदर्शन में 'सरोज नेत्राय कृपाय मंदारमाला परिभिताय उदार हासायनुखाय', 'आनंद नंदा दायकाय बकी बक प्राण विनाशकाय मृगेंद्र हस्ताय ब्रजभूषणाय नमोस्तु गोपीजन वल्लभाय' इत्यादि श्लोकों का पाठ किया।
प्रमेयरत्नसंग्रह: निरोधलक्षणम् श्लोक १५
वक्ता ने 'निरोधलक्षणम्' ग्रन्थ के पन्द्रहवें श्लोक, 'यच दुखम यशोदाया नंदादी च गोकुले गोपिका नामंतु दुखम त दुखम श मचित' और उसके अग्रभाग 'उद्धवागमने जात उत्सव सुम्यथा वृंदावने गोकुले वा तथा में मनसी क्वचित' का शुद्ध उच्चारण कराया। यह श्लोक यशोदाजी, नन्दादि गोकुलवासियों और गोपिकाओं के दुःख का वर्णन करता है।
प्रमेयरत्नसंग्रह: निरोधलक्षणम् श्लोक १६
सत्र के अंतिम भाग में 'निरोधलक्षणम्' के सोलहवें श्लोक, 'महताम कृपया यावत भगवान दयशति तावदानंद संोह कीर्तिमान सुखाय' का उच्चारण अभ्यास किया गया। वक्ता ने 'महताम कृपया' का अर्थ 'मोटा लोकोनी कृपा' (बड़े लोगों की कृपा) के रूप में समझाया और श्लोक के भाव पर संक्षिप्त चर्चा की। यह श्लोक भगवत्कृपा से प्राप्त होने वाले आनंद का सूचक है।