कीर्तन
• पाठ: —
• चर्चा: इस भाग में श्रीठाकुरजी के बधाई कीर्तन का गायन हुआ, जिसमें भक्तजन आनंदपूर्वक सम्मिलित हुए।
• वक्ता: —
भगवद्वार्ता: प्रभुदास की सेवा
• पाठ: —
• चर्चा: श्रीठाकुरजी ने श्रीआचार्यजी से प्रभुदास की अनूठी भगवद्सेवा की बात कही, जिसमें रसोई बिगड़ने पर भी प्रभुदास ने उसे ठाकुरजी को समर्पित नहीं किया, बल्कि चरणामृत में मिलाकर स्वयं ही ले लिया।
• वक्ता: श्रीआचार्यजी ने प्रभुदास से सावधानीपूर्वक रसोई बनाने और भोग धरकर ही प्रसाद लेने का निर्देश दिया, जिससे प्रभुदास ने अपनी सेवा में और अधिक एकाग्रता लाई।
भगवद्सेवा में सावधानी और समर्पण का महत्व
• पाठ: —
• चर्चा: वक्ता ने भगवद्सेवा के महत्त्व पर बल दिया, जहाँ सेवक को कोई भी वस्तु ठाकुरजी को समर्पित किए बिना उपयोग नहीं करनी चाहिए। सभी क्रियाएं भगवत्-अर्थ होनी चाहिए।
• वक्ता: सेवक को अपनी सेवा स्वयं, अपने हाथ से, तन-मन-धन से करनी चाहिए, क्योंकि कोई भी सेवा छोटी नहीं होती। यह प्रभुदास की वार्ता से सिद्ध होता है। सिद्धांत रहस्य और सिद्धांत मुक्तावली ग्रंथों से समर्पण के महत्व को समझाया गया।
पारिभाषिक शब्दों का विवेचन
• पाठ: —
• चर्चा: इस खंड में पुष्टिमार्गीय पारिभाषिक शब्दों जैसे 'श्रीठाकुरजी', 'चरणामृत', 'आचार्यजी' और 'समर्पण' का अर्थ समझाया गया।
• वक्ता: श्रीठाकुरजी को सम्मान से पुकारा जाता है, चरणामृत भगवच्चरणों के जल या रज का स्पर्श है, आचार्यजी शास्त्र समझाने वाले गुरु हैं, और समर्पण का अर्थ वस्तु को भगवान् के उपयोग में लाना है।
श्रीगोपीजनवल्लभाष्टकम् का पाठ
• पाठ: श्रीगोपीजनवल्लभाष्टकम् के श्लोक
• चर्चा: सत्र में श्रीगोपीजनवल्लभाष्टकम् के कई श्लोकों का पाठ किया गया, जिसमें सहभागी शुद्ध उच्चारण का अभ्यास कर रहे थे।
• वक्ता: —
निरोधलक्षणम् श्लोक का पाठ
• पाठ: निरोधलक्षणम् के श्लोक
• चर्चा: निरोधलक्षणम् के श्लोकों का पाठ किया गया, जिसमें 'भगवान् किं विधास्यति' और 'उद्धवागमने जात उत्सवः सुमहान् यथा' जैसे अंश सम्मिलित थे।
• वक्ता: 'सु' उपसर्ग का अर्थ 'अच्छी तरह' या 'सारो' समझाया गया, जो 'सुमहान्' शब्द में प्रयुक्त होता है।
'महता कृपया' श्लोक का पाठ
• पाठ: 'महता कृपया यावद् भगवान् दयश्यति तावदानन्दसन्दोहः कीर्त्यमानः सुखाय च' श्लोक
• चर्चा: इस खंड में निरोधलक्षणम् के एक अन्य महत्वपूर्ण श्लोक का पाठ किया गया, जिसमें 'महता कृपया यावद् भगवान् दयश्यति' पंक्ति मुख्य थी।
• वक्ता: सहभागी शुद्ध उच्चारण के साथ श्लोक का बार-बार अभ्यास कर रहे थे।
'महता कृपया' श्लोक पर विवेचन
• पाठ: 'महता कृपया यावद् भगवान् दयश्यति तावदानन्दसन्दोहः कीर्त्यमानः सुखाय च' श्लोक
• चर्चा: 'महताम् कृपया' पद का अर्थ स्पष्ट किया गया, जो 'मोटे लोगों की कृपा' को दर्शाता है।
• वक्ता: वक्ता ने समझाया कि 'महताम्' का अर्थ 'महान्' या 'मोटे' होता है, अतः 'महताम् कृपया' का अर्थ 'महान् लोगों की कृपा जहाँ तक है' या 'मोटे लोगों की कृपा से' होता है।