शकटासुर लीला — सांसारिक आसक्ति का विनाश
वक्ता इस खण्ड में निसक्रामन संस्कार के दिन घटित शकटासुर लीला का वर्णन करते हैं। यशोदाजी का ध्यान सांसारिक कार्यों में व्यस्त होने के कारण भगवान से हट गया था। भक्त स्वयं को भूलकर संसार से आसक्त हो जाता है, तब भगवान लीला करके उनकी आसक्ति दूर करते हैं। इस लीला में भगवान ने गाड़ी के नीचे जाकर दूध, दही आदि से भरे घर को नष्ट कर दिया, जिससे यशोदाजी का ध्यान पुनः भगवान की ओर आकर्षित हुआ। यह लीला आधुनिक पुष्टि भक्तों को भी सांसारिक वस्तुओं के प्रति आसक्ति का त्याग कर भगवदीय कार्य में मन लगाने की प्रेरणा देती है।
तृणावर्त लीला — रजोगुण और आसक्ति का दमन
कंस द्वारा भेजे गए अत्यंत शक्तिशाली राक्षस तृणावर्त के गोकुल में आगमन और उसके वध की लीला का विवेचन किया गया है। तृणावर्त ने बवंडर का रूप धारण कर व्रज के भक्तों की दृष्टि धूल से बाधित कर दी थी, जिससे वे भगवान के दर्शन नहीं कर पा रहे थे। भगवान ने तृणावर्त के भार को बढ़ाकर उसका वध किया, जो रजोगुण रूपी आसक्ति का प्रतीक है। वक्ता बताते हैं कि जिस प्रकार भगवान ने तृणावर्त को दूर किया, उसी प्रकार वे भक्तों के और अपने बीच आने वाली रजोगुण-जनित बाधाओं और बेचैनियों को अपनी कृपा से नष्ट कर देते हैं, जिससे भक्त का मन पुनः ठाकुरजी में लग जाता है। गीता में वर्णित 'राग' को 'आसक्ति' के रूप में समझाकर, सांसारिक संगति से उत्पन्न वासना को भी रजोगुण का ही प्रभाव बताया गया है।
महात्म्य बोध लीला — भक्ति और महात्म्य ज्ञान
यह खण्ड यशोदाजी द्वारा श्री कृष्ण के मुख में संपूर्ण ब्रह्मांड के दर्शन (महात्म्य बोध) की लीला पर केंद्रित है। वक्ता बताते हैं कि भगवान ने यशोदाजी पर दया करके उन्हें अपने अलौकिक रूप का अनुभव कराया। भक्ति में महात्म्य ज्ञान का महत्व है, क्योंकि जब तक भगवान के प्रति ऐसा स्नेह उत्पन्न नहीं होता, तब तक व्यवधान आ सकते हैं। पुष्टि भक्ति में भक्तों को अपने ईश्वरीय स्वरूप का अनुभव स्वप्नादि के माध्यम से भी होता है। वक्ता यह समझाते हैं कि सर्वोच्च प्रेम (स्नेह) के साथ-साथ परम आत्मा के व्यापक ज्ञान की भी आवश्यकता होती है। जब भक्ति प्रबल होती है, तो भगवान का महात्म्य ज्ञान स्वतः जागृत होता है।