कारिका १३-१५ : विप्रयोगाग्नि का भावन और दोषनिवृत्ति
वक्ता ने पूर्व सत्र का स्मरण कराते हुए बताया कि कारिका १२ तक आत्मनिवेदन धर्म एवं गोपीजनों के भाव की निरोधात्मक अवस्था का निरूपण हो चुका था। कारिका १३ में श्रीहरिरायजी आज्ञा करते हैं कि विप्रयोगाग्नि का भावन करने से हमारे समस्त दोष — जो हमें भगवान से दूर रखते हैं — निवृत्त होते हैं। टीका के अनुसार हृदय में रंचक भी भाव-रूप अग्नि प्रकट हो जाए तो एक क्षण में ही सर्व दोषों का सर्वथा नाश होता है। इसी कारण पुष्टिमार्ग सर्वोपरि है, क्योंकि वह ऐसे निषादन भाव को जीव को प्रदान करता है। जो भाग्यहीन हैं या आसुरावेश के कारण जिन्हें विश्वास नहीं होता, उन्हें इस मार्ग के फल की सिद्धि नहीं होती।
कारिका १५-१६ : अविश्वास के पाँच प्रकार
वक्ता ने अविश्वास के पाँच प्रकारों का विस्तृत निरूपण किया। प्रथम — स्वकल्पित विचार कि पुष्टिमार्ग से फलसिद्धि नहीं होगी। द्वितीय — ज्ञानमार्ग-कर्ममार्ग आदि के प्रतिनिधियों के संग में आकर इस मार्ग से भटक जाना। तृतीय — प्रवाही या मर्यादामार्गी जीव का इस मार्ग में आ जाना किन्तु दीर्घकाल तक रुचि न बने रहना। चतुर्थ — लौकिक एवं वैदिक सकाम प्रवृत्तियों में अत्यधिक आसक्ति। पञ्चम — नास्तिकों, बहिर्मुखों एवं म्लेच्छों के संसर्ग के कारण अविश्वास उत्पन्न होना। वक्ता ने स्पष्ट किया कि इन पाँचों में से कोई एक भी कारण उपस्थित हो तो साधन-निष्ठा नहीं बनती और फल-सिद्धि भी नहीं होती।
कारिका १७ : सत्संग की सर्वोपरिता और दुःसंग का त्याग
वक्ता ने बताया कि जैसे जल अग्नि को बुझा देता है, वैसे ही दुःसंग का दोष विप्रयोग की भावाग्नि को बुझा देता है। श्रीभागवत के एकादश स्कन्ध के भगवद्वाक्य को उद्धृत करते हुए वक्ता ने निरूपण किया कि योग, सांख्य, स्वाध्याय, तप, त्याग, इष्टापूर्त, दक्षिणा, व्रत, यज्ञ, वेद, तीर्थ, नियम, यम — इनमें से कोई भी भगवान को उस प्रकार वश नहीं कर सकता जैसे सर्वसंग को मिटाने वाला सत्संग करता है। श्रीभागवत प्रथम स्कन्ध में शौनकजी के वाक्य को भी प्रमाण रूप में प्रस्तुत किया गया। वक्ता ने कहा कि पुष्टिमार्ग से विपरीत कृति वाले व्यक्ति का संग — चाहे वह पुष्टिमार्गी कंठी पहने हो — अतिशय दोषरूप है।
प्रश्नोत्तर : विप्रयोगानुभूति और संयोगभाव का सम्बन्ध
प्रतिभागियों ने प्रश्न किया कि विप्रयोगाग्नि के साथ संयोग का भाव भी रहे तो क्या दोष दूर हो जाते हैं, तथा रुचि अवस्था में विरहभावन कितना सम्भव है। वक्ता ने स्पष्ट किया कि संयोगसुख का अनुभव तब होता है जब भक्ति फलित हो जाती है या जीव अत्यधिक उत्तम अवस्था पर पहुँच जाता है; तब तक संयोगसुख की योग्यता नहीं होती। विप्रयोगानुभूति का अर्थ है — इसी जन्म में मार्ग फलित होना चाहिए, भगवत्साक्षात्कार शीघ्र होना चाहिए — ऐसी तीव्र आकांक्षा। यह 'भावन' शब्द का तात्पर्य है कि जैसे ब्रजभक्तों के भाव का भावन हम सेवा में करते हैं, वैसे ही विरह-भावन को भी निरन्तर उद्बुद्ध करते रहना चाहिए।