शिक्षापत्र २१: पृष्ठभूमि एवं भाव की शिथिलता
इस खंड में शिक्षापत्र २१ के विषय का प्रारंभ होता है, जिसमें कलयुग में सत्पुरुषों का संग दुर्लभ होने से भाव में शिथिलता आने और भक्ति मार्ग में सब कुछ व्यर्थ होने की बात कही गई है। गृहस्थाश्रमी होकर भगवत्सेवा करते समय लौकिक व्यवहारों के विक्षेप से चित्त की स्थिरता नहीं रहती। इसके समाधान हेतु आत्मनिवेदन का चिंतन निरंतर करने का निर्देश है, जैसा कि श्रीमहाप्रभुजी ने नवरत्न में आज्ञा दी है। वक्ता बताते हैं कि भगवदीय गुणों का चिंतन, श्रीमहाप्रभुजी में निष्ठ भगवतीय के संग में करना चाहिए।
श्लोक ६: पोषक के अभाव में भाव का क्षीण होना
छठे श्लोक में श्रीहरिरायजी कहते हैं कि पोषक के अभाव में हृदय में स्थित भाव दिन-दिन घटता जाता है। भगवतीय का मिलाप न होने से भाव का पोषण नहीं होता और सत्संग के बिना भाव शिथिल हो जाता है। लौकिक मनुष्यों के संग से लौकिक वार्ताएँ करनी पड़ती हैं, जिससे चित्त में खेद उत्पन्न होता है। वक्ता इस बात पर बल देते हैं कि भाव को उत्तम पोषक न मिलने पर उसकी रक्षा न होने से वह क्षीण होता जाता है। व्यावृत्त लोगों को लौकिक वार्ताएँ सुनकर मन में खेद होता है कि वे अपने भगवत्भाव को रक्षित नहीं कर पा रहे।
श्लोक ७: लौकिक प्रतिष्ठा का भक्ति में बाधक होना
सातवें श्लोक में बताया गया है कि उत्तम भगवत् मन वाले लोग भी लौकिक प्रतिष्ठा मात्र सिद्ध करते हैं और चित्त तथा देह को व्यर्थ विषयों में लगाते हैं, क्योंकि भगवन्मार्ग की निष्ठा लौकिक निष्ठा के विरुद्ध है। लोग हमारी उत्तमता की प्रशंसा करते हैं, पर इससे भक्ति मार्गीय उत्कर्ष नहीं होता। वक्ता स्पष्ट करते हैं कि ऐसी लोक प्रतिष्ठा, जैसे 'यह बहुत बड़ा भक्त है', भक्ति में बाधक सिद्ध होती है। एकादश स्कन्ध में राजा जनक और सप्तम स्कन्ध में प्रह्लादजी के वचन उद्धृत किए गए हैं, जो मनुष्य देह की दुर्लभता और क्षणभंगुरता पर बल देते हैं, इसे भगवत्सेवा में विनियुक्त न करने पर व्यर्थ बताते हैं। यौवन अवस्था को भगवद्धर्म करने के योग्य कहा गया है। वक्ता कहते हैं कि लोक प्रशंसा से अहंकार बढ़ता है और भगवान् हृदय से चले जाते हैं।
श्लोक ८: भगवान का संसार वैरी स्वरूप
आठवें श्लोक में कहा गया है कि अहंता-ममतात्मक संसार के वैरी श्रीकृष्ण ऐसे मूढ़ संसारासक्तों की उपेक्षा करते हैं और यह काल सत्पुरुषों की सुंदर मति को भी हर लेता है। वक्ता गोपेश्वरजी के माध्यम से समझाते हैं कि भगवान् का नाम 'संसार वैरी' है, इसलिए भगवान् और संसार विरुद्ध हैं। भक्त में अभिमान उत्पन्न होने पर भगवान् अंतःकरण से पधार जाते हैं, क्योंकि अभिमानी अंतःकरण में भगवान् विराजमान नहीं होते। कलयुग के प्रभाव से साधु-संत भी प्रसिद्धि के प्रेमी बन जाते हैं, जिससे विपरीत बुद्धि प्रकट होती है और मन संसार में लग जाता है। ऐसी प्रसिद्धि को भक्त के लिए खतरे की घंटी बताया गया है, जो उसे पुनः सांसारिक अवस्था में ले जाती है। पुरुषोत्तमदास की वार्ता का दृष्टांत भी दिया गया है।
श्लोक ९: काल दोष से सावधान रहने का उपदेश
नौवें श्लोक में श्रीहरिरायजी समस्त पुष्टिमार्गीय वैष्णवों को सावधान रहने का उपदेश देते हैं, क्योंकि काल दोष को मिटाने वाले सत्पुरुषों का संग भी दुर्लभ है। वक्ता इस बात पर बल देते हैं कि काल इतना प्रबल है कि सावधानी बरतने पर भी कलयुग का प्रभाव हमें भ्रमित कर सकता है। सत्संग की दुर्लभता के कारण काल दोष बाधा डालता है। पुष्टिमार्ग सर्वोपरि है, अतः वैष्णवों को दुःसंग से बचे रहना चाहिए, भगवदीय का संग करना चाहिए और श्रीआचार्यजी महाप्रभुजी के चरणकमलों को चित्त में धारण करना चाहिए। ऐसी लोक प्रतिष्ठा से दूर रहने का आग्रह किया गया है, जो भक्त को पुनः संसार की दिशा में धकेल सकती है।
प्रश्नोत्तर: संसार वैरी नाम तथा संग की कठिनाई
एक प्रतिभागी 'संसार वैरी' नाम पर प्रश्न करते हैं कि श्रीमहाप्रभुजी तो संसार को जोड़ने की बात करते हैं, फिर यह नाम थोड़ा अलग क्यों लग रहा है। वक्ता स्पष्ट करते हैं कि जो संसार भगवद्भाव साधक होता है, वह जुड़ जाता है, परंतु जो नहीं जुड़ता वह बाधक सिद्ध होता है। शास्त्र वचन में भगवान् को संसार से विरुद्ध धर्म वाला बताया गया है। दूसरे प्रश्न में, अन्य लौकिक वार्ता सुनकर मन में खेद होने पर एकांतवास की इच्छा पर चर्चा हुई। वक्ता बताते हैं कि भक्ति की फलित अवस्था में ही निसंग रहा जा सकता है, परंतु वर्तमान अवस्था में निसंग रहने पर भी भक्ति को पोषण नहीं मिलता। इस काल में तादृश भगवदीय मिलना और उनके साथ रह पाना भी कठिन है।